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की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

अद्भुत व्यक्तित्व के धनी : डॉ.अब्दुल कलाम - डॉ.रश्मि

डॉ. अवुल पकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम, इन्हें हम सभी डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम से जानते हैं । डॉ.

डॉ कलाम जी के साथ रश्मि जी
डॉ कलाम जी के साथ रश्मि जी
कलाम भारत के पूर्व राष्ट्रपति, प्रसिद्ध वैज्ञानिक और कुशल अभियंता के रूप में विश्वविख्यात हैं । रक्षा-शोध एवं विकास संगठन के पूर्व निदेशक, पृथ्वी, त्रिशूल, नाग, आकाश और अग्नि मिसाइलें विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉ. कलाम को ‘भारत का मिसाइलमैन’ भी कहा जाता है । ये देश के पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जिनका राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं था । प्रतिभा के धनी डॉ. कलाम का व्यक्तित्व इतना उन्नत है कि ये सभी धर्म, जाति एवं सम्प्रदायों के व्यक्ति नज़र आते हैं । यह एक ऐसे भारतीय हैं, जो सभी के अपने बन गए हैं । इनका जीवन एक ”एक महान आदर्श” बन चुका है ।
डॉ. कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम, जिला रामनाथपुरम, तमिलनाडु के एक तमिल मुस्लिम परिवार में हुआ । द्वीप जैसा यह छोटा-सा शहर अपनी प्राकृतिक छटा से भरपूर है । रामेश्वरम अपने पौराणिक महत्त्व के लिए भी जाना जाता है । श्रीराम ने लंकाधीश के साथ युद्ध करने से पूर्व रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना करके शिवजी की आराधना की थी । रामेश्वरम का शिव मंदिर विश्वप्रसिद्ध है । यही धार्मिक नगरी रामेश्वरम डॉ. कलाम की जन्मभूमि है । डॉ. कलाम के पिता का नाम जैनुलाब्दीन तथा माता का नाम आशी अम्मा था । इनके माता-पिता अधिक पढ़े-लिखे और आर्थिक दृष्टि से अधिक समृद्ध नहीं थे । डॉ. कलाम के पिता मछुआरों को नाव किराए पर दिया करते थे । रामेश्वरम में एक बड़ी मस्जिद भी है । ये उसी मस्जिद मोहल्ले के रहने वाले हैं । इनके पिता पांच वक्त की नमाज़ पढ़ने वाले अत्यंत स्नेही व्यक्ति थे । सभी लोग उनका बेहद आदर करते थे ।
डॉ. कलाम अपनी माँ से अपार स्नेह करते थे । वे उन्हें याद करते हुए कहते थे- “माँ मुझे अपने पास बिठाकर साफ किए हुए केले के पत्ते पर चावल, सांभर और नारियल की चटनी आदि रखकर स्वयं भोजन करवातीं थीं । मेरे पिता ब्राह्म मुहूर्त में उठकर अपनी उस छोटी-सी बगिया में जाते जहाँ उन्होंने कुछ नारियल के पेड़ लगा रखे थे और आते समय 10-12 नारियल अपने कंधे पर लादकर घर लौटते ।” डॉ. कलाम अपनी जीवनी में लिखते हैं- “जन्म के साथ ही प्रत्येक बालक को विरासत के रूप में कुछ चीज़ें अपने माता-पिता और आस-पास के वातावरण से मिलतीं हैं । मुझे भी ईमानदारी व आत्मनियंत्रण अपने पिता से प्राप्त हुआ और मैने अपनी माँ से अच्छे कामों में विश्वास तथा दयालुता की भावना प्राप्त की ।”
अब्दुल कलाम जब आठ-नौ साल के थ े, तब से सुबह चार बजे उठते थे और स्नान करने के बाद गणित के अध्यापक स्वामीअय्यर के पास गणित पढ़ने जाते थे । स्वामीअय्यर की यह विशेषता थी कि जो विद्यार्थी स्नान करके नहीं आता था, वह उसे नहीं पढ़ाते थे । डॉ. कलाम की माँ इन्हें तड़के उठाकर स्नान कराती थीं और नाश्ता करवाकर ट्यूशन पढ़ने भेज देती थीं । अब्दुल कलाम ट्यू्शन पढ़कर साढ़े पाँच बजे वापस घर आते और उसके बाद अपने पिता के साथ नमाज़ पढ़ते । फिर क़ुरान शरीफ़ का अध्ययन करने के लिए मदरसे चले जाते थे । तत्पश्चात अब्दुल कलाम रेलवे स्टेशन जाते । उन दिनों धनुषकोड़ी से मेल ट्रेन गुजरती थी, लेकिन वहाँ उसका स्टेशन नहीं होता था अतः चलती ट्रेन से ही अख़बार के बण्डल रेलवे स्टेशन पर फेंक दिए जाते थे । अब्दुल कलाम वहाँ से अख़बार के बण्डल उठाते और रामेश्वरम शहर की सड़कों पर दौड़-दौड़कर सबसे पहले उसका वितरण करते । इसके बाद ये अपने विद्यालय जाते । इनकी प्रारम्भिक शिक्षा रामनाथपुरम के प्राथमिक विद्यालय में हुई । इसके बाद तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ़ कॉलेज से विज्ञान स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की । इनके शिक्षक इयादुराई सोलोमन इनसे कहा करते थे कि, “जीवन मे सफलता तथा अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था, अपेक्षा इन तीन शक्तियो को भली-भाँति समझकर उन पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहिए ।”
अब्दुल कलाम ”एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी” में आए, तो इसके पीछे वे अपने पाँचवीं कक्षा के अध्यापक ”सुब्रहमण्यम अय्यर”की प्रेरणा बताते हैं । इनके अनुसार- “वे हमारे स्कूल के अच्छे शिक्षकों में से एक थे । एक बार उन्होंने कक्षा में बताया कि पक्षी कैसे उड़ता है? मैं यह नहीं समझ पाया था, इस कारण मैंने इंकार कर दिया था । तब उन्होंने कक्षा के अन्य बच्चों से पूछा तो उनमे से अधिकांशत: ने भी इंकार ही किया । लेकिन इस उत्तर से अय्यर जी विचलित नहीं हुए बल्कि अगले दिन वे हमें हमें समुद्र के किनारे ले गए । उस प्राकृतिक दृश्य में कई प्रकार के पक्षी थे, जो सागर के किनारे उतर रहे थे और उड़ रहे थे । तत्पश्चात उन्होंने समुद्री पक्षियों को दिखाया, जो 10-20 के झुण्ड में उड़ रहे थे । उन्होंने पक्षियों के उड़ने के सम्बन्ध में प्रत्येक क्रिया को साक्षात अनुभव के आधार पर समझाया । हमने भी बड़ी बारीकी से पक्षियों के शरीर की बनावट के साथ उनके उड़ने का ढंग देखा । इस प्रकार हमने व्यावहारिक प्रयोग के माध्यम से यह सीखा कि पक्षी किस प्रकार उड़ पाने में सफल होता है । हमारे वे अध्यापक महान थे । चाहते तो हमें मौखिक रूप से समझाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर सकते थे लेकिन उन्होंने हमें व्यावहारिक उदाहरण के माध्यम से समझाया और कक्षा के हम सभी बच्चे समझ भी गए । मेरे लिए यह बात मात्र पक्षी की उड़ान तक की ही सीमित नहीं थी बल्कि पक्षियों की वह उड़ान मुझमें समा गई थी और मुझे महसूस होता था कि मैं रामेश्वरम के समुद्र तट पर हूँ । उस दिन के बाद मैंने सोच लिया था कि मेरी शिक्षा किसी न किसी प्रकार के उड़ान से संबंधित होगी । उस घटना ने मुझे प्रेरणा दी थी कि मैं अपनी ज़िंदगी का कोई लक्ष्य निर्धारित करूँ और उसी समय मैंने तय कर लिया था कि उड़ान में करियर बनाऊँगा।”
डॉ. कलाम अपने स्कूली जीवन की एक घटना साझा करते हैं कि, “जब मैं पाँचवी कक्षा में था तब मैं और मेरा मित्र रामनाथ शास्त्री हमेशा साथ-साथ और आगे की कुर्सी में ही बैठा करते थे । रामनाथ रामेश्वरम मंदिर के मुख्य पुजारी का बेटा था और मैं अपने सर पर एक विशेष प्रकार की टोपी पहना करता था जिससे स्पष्ट प्रतीत होता था कि मैं एक मुसलमान हूँ । ऐसे ही एक बार हम दोनों आगे बैठे हुए थे । हमारे विद्यालय में एक नए अध्यापक आए । नए अध्यापक जब कक्षा में आए तो उन्होंने मुझे आगे की सीट से हटाकर सबसे पीछे बैठने को कहा । मैं पीछे जाकर बैठ गया किन्तु रामनाथ शास्त्री रोने लगा । उसका रोना मैं आज तक नहीं भूल पाया । घर लौटने के बाद हमने यह बात अपने-अपने घरवालों को बताई । जब रामेश्वरम् के मुख्य पुजारी अर्थात् रामनाथ के पिता को यह बात पता चली तो उन्होंने उन अध्यापक को बुलाकर कहा कि इन छोटे भोले बालकों के मन में विषमता का विष न फैलाएँ ।” कलाम साहब के जीवन की हर छोटी-बड़ी घटना हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है । हर आयुवर्ग कलाम साहब के प्रति अपार श्रद्धा और स्नेह का भाव रखता है । कलाम देश के राष्ट्रपति नहीं बल्कि आम जनता के राष्ट्रपति थे ।
विज्ञान स्नातक (बी.एस.सी.) करने के उपरांत कलाम साहब एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढाई करना चाहते थे किन्तु आर्थिक स्थिति ठीक न थी । इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अख़बारों में विज्ञान संबंधी लेख लिखकर अपना खर्च निकालने लगे । इनकी बहन जोहरा ने अपने आभूषण बेचकर इन्हें एम.आई.टी. में प्रवेश दिलवाया । इस प्रकार डॉ. कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की । इसके बाद इन्होंने हावरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने के लिये भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया । डॉ. कलाम अपने अध्यापक श्री सिवा सुब्रहमण्यम अय्यर को याद करते हुए कहते हैं कि, “उन्होंने मुझे समझाया कि मैं पहले आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करूँ, फिर हाई स्कूल । तत्पश्चात कॉलेज में मुझे उड़ान से सम्बन्ध ित शिक्षा का अवसर प्राप्त हो सकता है । उनकी बातों ने मुझे जीवन के लिए एक मंज़िल और उद्देश्य प्रदान किया । जब मैं कॉलेज गया तो मैंने भौतिक विज्ञान विषय लिया । जब मैं अभियांत्रिकी की शिक्षा के लिए ”मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी” में गया तो मैंने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग का चुनाव किया । इस प्रकार मेरी ज़िन्दगी एक ”रॉकेट इंजीनियर”, ”एयरोस्पेस इंजीनियर” और ”तकनीकी कर्मी” की ओर उन्मुख हुई । मेरे गणित के अध्यापक ‘प्रोफेसर दोदात्री आयंगर’ के रूप में मुझे ‘सेंट जोसेफ कॉलेज’ में देवता के समान व्यक्ति को देखने का अवसर प्राप्त हुआ । मुझे उनसे गणित पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ । उन्होंने मेरी प्रतिभा को बहुत हद तक निखारा । मैंने उनकी कक्षा में आधुनिक बीजगणित, सांख्यिकी और कॉंम्पलेक्स वेरिएबल्स का अध्ययन किया ।”
सन 1952 में डॉ. कलाम ने एक अद्वितीय व्याख्यान दिया, जो भारत के प्राचीन गणितज्ञों एवं खगोलविज्ञों के सम्बन्ध में था । इस व्याख्यान में इन्होंने भारत के चार गणितज्ञों एवं खगोलविज्ञों के बारे में बताया, जो इस प्रकार थे– आर्यभट्ट, श्रीनिवास रामानुजन, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य । इसके अलावा एम.आई.टी. के ‘प्रोफेसर श्रीनिवास’ (जो डायरेक्टर भी थे) के योगदान को भी वे अपनी प्रतिभा निखारने में काफ़ी मददगार मानते रहे हैं । उनके विषय में अब्दुल कलाम ने कहा था – “शिक्षक को एक प्रशिक्षक भी होना चाहिए, प्रोफेसर श्रीनिवासन की भाँति ।”
डॉ. अब्दुल कलाम जब एच.ए.एल. से एक वैमानिकी इंजीनियर बनकर निकले तो इनके पास नौकरी के दो बड़े अवसर थे । ये दोनों ही अवसर बेजोड़ थे जो इनके बरसों पुराने उड़ान के सपने को पूरा करने वाले थे । एक अवसर भारतीय वायुसेना का था और दूसरा रक्षा मंत्रालय के अधीन तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय का था । इन्होंने दोनों जगहों पर साक्षात्कार दिया । तदुपरांत रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय में चुन लिए गए । सन् 1958 में इन्होंने 250 रूपए के वेतन पर निदेशालय के तकनीकी केंद्र (उड्डयन) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद पर काम संभाल लिया । निदेशालय में नौकरी के पहले साल के दौरान इन्होंने आफिसर-इंचार्ज आर. वरदराजन की मदद से एक अल्ट्रासोनिक लक्ष्यभेदी विमान का डिजाइन तैयार करने में सफलता हासिल की । विमानों के रख-रखाव का अनुभव प्राप्त करने के लिए इन्हें एयरक्रॉफ्ट एण्ड आर्मामेंट टेस्टिंग यूनिट, कानपुर भेजा गया । उस समय वहाँ एम.के.-1 विमान के परीक्षण का काम चल रहा था । उसकी कार्यप्रणालियों के मूल्यांकन को पूरा करने के काम में इन्होंने भी हिस्सा लिया । वापस आने पर इन्हें बैंगलौर में स्थापित वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान में भेज दिया गया । यहाँ ग्राउंड इक्विपमेंट मशीन के रूप में स्वदेशी होवरक्रॉफ्ट का डिजाइन तथा विकास करने के लिए एक टीम बनाई गई । इस टीम में वैज्ञानिक सहायक के स्तर पर चार लोग शामिल थे । इसका नेतृत्व करने का कार्यभार निदेशक डॉ. ओ. पी. मेदीरत्ता ने डॉ. कलाम को सौंपा । उड़ान में इंजीनियरिंग मॉडल शुरू करने के लिए इन्हें तीन साल का वक्त दिया गया । भगवान् शिव के वाहन के प्रतीक रूप में इस होवरक्राफ्ट को ‘नंदी’ नाम दिया गया ।
1962 में वे ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ में आए । डॉक्टर अब्दुल कलाम को प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह एस.वी.एल. तृतीय प्रक्षेपास्त्र बनाने का श्रेय प्राप्त है । जुलाई 1980 में इन्होंने रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के निकट स्थापित किया था । इस प्रकार इनके कार्यों से भारत भी ‘अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब’ का सदस्य बन गया । ‘इसरो लॉन्च व्हीकल प्रोग्राम’ को परवान चढ़ाने का श्रेय भी इन्हें ही जाता है । डॉक्टर कलाम ने स्वदेशी लक्ष्य भेदी मिसाइल्स गाइडेड का डिज़ाइन किया था । इन्होंने अग्नि एवं पृथ्वी जैसी शक्तिशाली मिसाइलों को स्वदेशी तकनीक से बनाया था । डॉक्टर कलाम जुलाई 1992 से दिसम्बर 1999 तक रक्षा मंत्री के ‘विज्ञान सलाहकार’ तथा ‘सुरक्षा शोध और विकास विभाग’ के सचिव के पद पर रहे । इन्होंने स्ट्रेटेजिक मिसाइल्स सिस्टम का उपयोग आग्नेयास्त्रों के रूप में किया । इसी प्रकार पोखरण में दूसरी बार न्यूक्लियर विस्फोट भी परमाणु ऊर्जा के साथ मिलाकर किया । इस तरह इनके सफल प्रयासों के फलस्वरूप भारत ने भी परमाणु हथियार के निर्माण की क्षमता प्राप्त करने में सफलता अर्जित की । डॉक्टर कलाम ने भारत के विकास स्तर को 2020 तक विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए एक विशिष्ट सोच प्रदान की । राष्ट्रपति बनने से पूर्व ये भारत सरकार के ‘मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार’ भी रहे । इनकी देखरेख में भारत ने 1998 में पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया और परमाणु शक्ति से संपन्न राष्ट्रों की सूची में स्वयं को शामिल किया ।
राष्ट्रपति के पद पर
सक्रिय राजनीति से सदा दूर रहने वाले डॉक्टर अब्दुल कलाम भारत के ग्यारवें राष्ट्रपति निर्वाचित हुए । इन्हें भारतीय जनता पार्टी समर्थित एन॰डी॰ए॰ घटक दलों ने अपना उम्मीदवार बनाया था जिसका वामदलों के अलावा समस्त दलों ने समर्थन किया था । 18 जुलाई 2002 को डॉक्टर कलाम को नब्बे प्रतिशत बहुमत द्वारा ‘भारत का राष्ट्रपति’ चुना गया था । इस पद के लिए इनकी प्रतिद्वंद्वी डॉ. लक्ष्मी सहगल थीं । 25 जुलाई 2002 को संसद भवन के अशोक कक्ष में डॉ. कलाम को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई । इस संक्षिप्त समारोह में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य तथा अधिकारीगण उपस्थित थे । डॉ. कलाम का कार्याकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ । डॉक्टर अब्दुल कलाम राजनीतिक क्षेत्र के व्यक्ति नहीं हैं लेकिन राष्ट्रवादी सोच और राष्ट्रपति बनने के बाद भारत की कल्याण संबंधी नीतियों के कारण इन्हें राजनीतिक दृष्टि से सम्पन्न माना जा सकता है । ये भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया का सिरमौर राष्ट्र बनते देखना चाहते हैं और इसके लिए इनके पास एक कार्य योजना भी है । परमाणु हथियारों के क्षेत्र में डॉ. कलाम भारत को सुपर पॉवर बनाने की बात सोचते रहे हैं । ये विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भी तकनीकी विकास चाहते हैं । डॉक्टर कलाम का कहना है कि ‘सॉफ़्टवेयर’ का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए ताकि अधिकाधिक लोग इसकी उपयोगिता से लाभांवित हो सकें । ऐसे में ही सूचना तकनीक का तीव्र गति से विकास हो सकेगा ।
राजनीतिक स्तर पर डॉ. कलाम की इच्छा है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका का विस्तार हो । ये भारत को महाशक्ति बनने की दिशा में कदम बढाते देखना चाहते हैं । डॉ. कलाम नई तकनीक को भारत के जनसाधारण तक पहुँचाना चाहते हैं । बच्चों और युवाओं के बीच डाक्टर क़लाम अत्यधिक लोकप्रिय हैं । आजकल ये भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के कुलपति के पद पर हैं ।
व्यक्तित्व
डॉक्टर अब्दुल कलाम व्यक्तिगत ज़िन्दगी में बेहद अनुशासनप्रिय हैं । ये पूर्णतः शाकाहारी हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं । ये क़ुरान और भगवद्गीता दोनों का अध्ययन करते हैं । इनकी साधारण वेशभूषा, सादगीपूर्ण जीवन और सहज स्वाभाव सभी को प्रभावित करती है । डॉ. अब्दुल कलाम बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं । ये विज्ञान, तकनीक के साथ-साथ साहित्य और संगीत में भी रूचि रखते हैं । डॉ. कलाम कविता भी लिखते हैं और वीणा भी बजाते हैं । इनकी अध्यात्म में बहुत रूचि है । ये अपने काम के प्रति समर्पित और कर्तव्यनिष्ठ हैं ।
डॉ. कलाम सर्वधर्म समभाव में विश्वास रखते हैं । स्वयं इस्लाम धर्म से जुड़े होने के बाद भी ये सभी धर्मों का सामान रूप से आदर करते हैं । इनके लिए कोई एक धर्म, वर्ग, जाति या समुदाय कोई मायने नहीं रखता । ये सभी को समान दृष्टि से देखते हैं और मानवता को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं । डॉ. कलाम विनोदप्रिय और साफ़ ह्रदय के हैं । ये अपनी बात बड़ी ही सरलता व सच्चाई से व्यक्त कर देते हैं । यही कारण है कि हर धर्म, हर वर्ग का व्यक्ति इनका मन से आदर करता है । इनका मानवतावाद मनुष्यों की समानता के आधारभूत सिद्धांत पर आधारित है । 25 जुलाई 2002 की शाम को भारत के राष्ट्रपति का सर्वोच्च पद सँभालने के दिन घटित एक बात से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है । उस दिन राष्ट्रपति भवन में एक प्रार्थना सभा आयोजित की गई थी जिसमें रामेश्वरम् मसजिद के मौलवी, रामेश्वरम् मंदिर के पुजारी, सेंट जोसेफ कॉलेज के फादर रेक्टर तथा अन्य लोगों ने भाग लिया था ।
इनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें बहुत लोकप्रिय रही हैं । डॉ. कलाम अपनी किताबों की रॉयल्टी का अधिकांश स्वयंसेवी संस्थाओं को दान में दे देते हैं । मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘सिस्टर्स ऑफ़ चैरिटी’ भी उनमें से एक है । विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इनके योगदान के लिए इन्हें कई पुरस्कार मिले हैं । इनमें से कुछ पुरस्कारों के साथ नकद राशियां भी थी । ये पुरस्कार में मिली इन राशियों को परोपकार के कार्यों के लिए अलग रख देते हैं । जब-जब देश में प्राकृतिक आपदाएँ आई हैं, तब-तब डॉ. कलाम ने बढ़-चढ़ कर मदद की है ।
डॉक्टर अब्दुल कलाम ने साहित्यिक रूप से अपने शोध को चार उत्कृष्ट पुस्तकों में समाहित किया है, जो इस प्रकार हैं – ‘विंग्स ऑफ़ फायर’, ‘इण्डिया 2020 – ए विज़न फ़ॉर द न्यू मिलेनियम’, ‘माई जर्नी’ तथा ‘इग्नाटिड माइंड्स – अनलीशिंग द पॉवर विदिन इंडिया’ । इन पुस्तकों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है । इस प्रकार यह भारत के एक विशिष्ट वैज्ञानिक हैं, जिन्हें 30 विश्वविद्यालयों और संस्थानों से डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्राप्त हो चुकी है । इन्होंने अपनी जीवनी ‘विंग्स ऑफ़ फायर’ भारतीय युवाओं को मार्गदर्शन प्रदान करने वाले अंदाज में लिखी है । इनकी दूसरी पुस्तक ‘गाइडिंग सोल्स- डायलॉग्स ऑफ़ द पर्पज ऑफ़ लाइफ’ आत्मिक विचारों को उद्घाटित करती है इन्होंने तमिल भाषा में कविताऐं भी लिखी हैं ।
डॉ. कलाम को पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया । सन 1997 में भारत के सर्वोच्च, नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया । 18 जुलाई 2002 को डॉक्टर कलाम को नब्बे प्रतिशत बहुमत द्वारा भारत का राष्ट्रपति चुना गया और उन्होंने 25 जुलाई को अपना पदभार ग्रहण किया । इन्हें अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमे से प्रमुख हैं – राष्ट्रीय डिज़ाइन पुरस्कार, डॉ. बीरेन राय स्पेस अवॉर्ड, नेशनल नेहरु अवॉर्ड, आर्यभट्ट अवॉर्ड (एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ़ इंडिया, 1994), प्रोफ़ेसर वाई. नायूडम्मा मेमोरियल स्वर्ण पदक, गुजरमल मोदी अवॉर्ड फॉर साइंस, विज्ञानं और प्राद्योगिकी में योगदान के लिए एच. के. फिरोदिया अवॉर्ड, देशी कोट्टम अवॉर्ड, विश्व भारती अवॉर्ड आदि । डॉ. कलाम को कई संस्थानों द्वारा फेलोशिप भी प्रदान की गई । इन संस्थानों में इंडियन नेशनल अकेडमी ऑफ़ इंजीनियरिंग, इंडियन अकेडमी ऑफ़ साइंस, इंस्टीट्यूट ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक टेलिकम्यूनिकेशन्स प्रमुख हैं ।
डॉ. कलाम 27 जुलाई 2015 की शाम भारतीय प्रबंधन संस्थान (आई.आई.एम.) शिलोंग में मंच पर अपना एक व्याख्यान दे रहे थे । इनके व्याख्यान का विषय था- ‘रहने योग्य ग्रह’ । इस व्याख्यान के दौरान ही डॉ. कलाम को तेज़ कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा) पड़ा और बेहोश हो कर गिर पड़े । उस वक्त शाम के लगभग 6:30 बजे गंभीर हालत में इन्हें बेथानी अस्पताल में आईसीयू में ले जाया गया । दो घंटे के बाद इनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी गई । अस्पताल के सीईओ जॉन साइलो ने बताया कि, “जब डॉ. कलाम को अस्पताल लाया गया तब उनकी नब्ज और ब्लड प्रेशर साथ छोड़ चुके थे ।”
अपने निधन से लगभग 9 घण्टे पहले ही उन्होंने ट्वीट करके बताया था कि, “मैं शिलांग आईआईएम में लेक्चर के लिए जा रहा हूँ ।”
मेघालय के राज्यपाल वी॰ षडमुखनाथन; अब्दुल कलाम के हॉस्पिटल में प्रवेश की खबर सुनते ही सीधे अस्पताल में पहुँच गए ।
मृत्यु के तुरंत बाद ही डॉ. कलाम के शरीर को भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टर द्वारा शिलांग से गुवाहाटी लाया गया । यहाँ से अगले दिन 28 जुलाई को पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का पार्थि‍व शरीर मंगलवार दोपहर वायुसेना के विमान सी-130जे हरक्यूलिस से दिल्ली लाया गया । लगभग 12:15 पर विमान पालम हवाईअड्डे पर उतरा । सुरक्षा बलों ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ डॉ. कलाम के पार्थिव शरीर को विमान से उतारा । इस दौरान वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल व तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने इसकी अगवानी की और डॉ. कलाम के पार्थिव शरीर पर पुष्पहार अर्पित किए । इसके बाद तिरंगे में लिपटे डॉ. कलाम के पार्थि‍व शरीर को पूरे सम्मान के साथ, एक गन कैरिज में रख उनके आवास 10 राजाजी मार्ग पर ले जाया गया । यहाँ अनेक गणमान्य लोगों ने इन्हें श्रद्धांजलि दी । भारत सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति के निधन के मौके पर उनके सम्मान के रूप में सात दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की ।
डॉ. कलाम का पुश्तैनी निवास रामेश्वरम् है । यहाँ इनके 99 वर्ष के बड़े भाई एवं अन्य परिवारीजन रहते हैं । हालाँकि डॉ. कलाम स्वयं अविवाहित थे । 29 जुलाई की सुबह वायुसेना के विमान सी-130जे से भारतीय ध्वज में लिपटे डॉ. कलाम के शरीर को पालम एयर बेस पर ले जाया गया, जहाँ से इसे मदुरै भेजा गया, विमान दोपहर तक मदुरै हवाई अड्डे पर पहुँचा । इनके शरीर को तीनों सेनाओं के प्रमुखों और राष्ट्रीय व राज्य के गणमान्य व्यक्तियों, कैबिनेट मंत्री मनोहर पर्रीकर, वेंकैया नायडू, पॉन राधाकृष्णन; और तमिलनाडु और मेघालय के राज्यपाल के.रोसैया और वी. षडमुखनाथन ने हवाई अड्डे पर प्राप्त किया । एक संक्षिप्त समारोह के बाद कलाम के शरीर को एक वायु सेना के हेलिकॉप्टर में मंडपम भेजा गया । मंडपम से कलाम के शरीर को उनके गृह नगर रामेश्वरम एक आर्मी ट्रक में भेजा गया । अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए उनके शरीर को स्थानीय बस स्टेशन के सामने एक खुले क्षेत्र में प्रदर्शित किया गया ताकि जनता उनके असंख्य चाहने वाले उन्हें आखिरी श्रद्धांजलि दे सकें ।
30 जुलाई 2015 को पूर्व राष्ट्रपति को पूरे सम्मान के साथ रामेश्वरम के पी करूम्बु ग्राउंड में मुस्लिम रीति से दफ़नाया गया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, तमिलनाडु के राज्यपाल और कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों सहित 3,50,000 से अधिक लोगों ने इनके अंतिम संस्कार में भाग लिया ।
डॉ. कलाम के निधन से देश भर में और सोशल मीडिया में पूर्व राष्ट्रपति को श्रद्धांजलि देने के लिये अनेक कार्य किये गए । भारत सरकार ने कलाम को सम्मान देने के लिए सात दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की ।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम का सपना था कि भारत स्वयं एक हाईपरसोनिक मिसाइल बनाए । ये सुपरसोनिक मिसाइल चार से पांच वर्ष में बनकर तैयार होगा । इस हाइपर सोनिक मिसाइल का बनना एपीजे अब्दुल कलाम को सच्ची श्रद्धांजलि होगी । इस हाईपरसोनिक मिसाइल का नाम डॉ. कलाम के नाम पर रखा जाएगा ।
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