हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

अनसुलझे प्रश्नों की कथा - डॉ.निरुपमा कपूर

‘‘एक याद अतीत की /चलती है मेरे साथ–साथ/अस्तित्व मेरा / अपना है या पराया

हम दोनों में है कितना अंतर / मुझे पहचान पाना और मिलना/बड़ी दूर की बात है।

साहित्य की कई विधाओं या यूँ कहें कि साहित्य या जीवन के हर पक्ष को किसी दूसरे के सामने रखने के लिए ईमानदारी की आवश्यकता होती है। यह बात आत्मकथा के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। आत्मकथा के लिए बुनियादी आवश्यकता है ईमानदारी। इसकी पुष्टि तभी होती है, जब व्यक्ति किसी बात के लिए दूसरों के साथ–साथ अपनी और अपनों की भी आलोचना करता है। डॉ सुधा गुप्ता की एक पाती सूरज के नाम भारतीय स्त्री की पारंपरिक छवि को आधुनिक दृष्टिकोण से देखने की कथा है। परम्पराओं के नाम पर अपनी इच्छाओं को दबाते रहना भारतीय स्त्रियों की मजबूरी है। अपने पिता के घर में जो कल तक लाड़ली थी पति के घर में कोने में पड़ी तुच्छ वस्तु के समान थी। ‘ज्यादातर तो औरतों का हाल यह है कि शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धि, आर्थिक, आत्मनिर्भरता के बावजूद वे एक बार अगर अंधे कुँए में गिर पड़ी तो बस गिर पड़ीं……….. जिंदगी के आखिरी लम्हे तक उस अकेले भयावह अँधेरे में पड़े रहना हो उनकी नियति है’……… विवाह के पश्चात पति यदि समझदार व कर्त्तव्यनिष्ठ हो तो समस्याएँ थोड़ी कम हो जाती हैं परन्तु भारतीय पुरुष अपनी पत्नियों के मामले में कम संवेदनशील होते हैं वैसे अब तस्वीर बदल रही है। परन्तु अपनी कमियों के प्रति आँखें मूँदे रहना और स्त्रियों की प्रकृतिवश किसी कमी को माफ न करना भारतीय जनमानस में अंदर तक व्याप्त है। लेखिका के काले रंग के लिए उनके पति के व्यंग्य निश्रित बाण उनकी नकारात्मक सोच दर्शाने के लिए काफी थे। ‘अरे, अरे दीवार से हट कर खड़ी होओ……….. कहीं काली न हो जाए  ।पता है पूरे पाँच हजार लगे हैं घर की पुताई रंगाई में।’ पति के मिसरी घुले शब्द विवाह के दूसरे दिन ही यदि पत्नी को सुनने को मिले ,तो वह अपने आगामी जीवन के स्वप्नों को तो काला होते  देख ही सकती है। पति के लिए तो उनका काला रंग ऊपर से विद्याध्ययन की ललक एक तो करेला  ऊपर  से नीम चढ़ा। इस पंक्ति को लेखिका के जीवन में सार्थकता प्रदान कर रहा था। शोध कार्य के उपरान्त परिवार की जीविका चलाने के लिए सुधा जी ने कई महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया। इस दौरान कई खट्टे -मीठे अनुभव उन्होंने अपने तीनों पुत्रों के साथ सहे; जिसमें अपने पति की अकर्मण्यता व अजीब विचारों से ग्रसित होने के कारण सुधाजी व उनमें (बलवीर जी के रिश्ते में )एक अजीब सी दूरी व डर बैठ गए थे, जो उन्हें इस बात की ओर बढ़ावा देते थे – ‘अनमेल विवाह सिर्फ़ आयु के वर्ग के, जीवन स्तर के अन्तर से ही नहीं होते या हो सकता है रुचियों के भेद से शायद सबसे ज्यादा अनमेल विवाह होते हों। हमारी रुचियाँ कितनी भिन्न थीं। भाषाओं, अध्ययन विषयों सभी में पसंद बिल्कुल अलग–अलग थी मनोरंजन के साधन तक भी’ ये अनमेल विवाह का दंश लेखिका को कई स्तरों पर आजीवन चुभता रहा। यदि स्त्री आर्थिक रूप से सृदृढ़ महिलाएँ भी वैवाहिक संस्था में शोषण होने के बावजूद भी चलाए जाने के पक्ष में ही होती है। लेखिका के शब्दों में ऐसी वैवाहिक व्यवस्था को ‘‘विशाल मकड़जाल मजबूत उसमें फँसी निरीह मक्खी छटपटाती है, हाथ पाँव पटकती है……. जी तोड़ कोशिश करती है, उसमें से निकाल भागने की, सब व्यर्थ। अंत में धीरे–धीरे निष्चेष्ट होती, पड़ी रह जाती है स्पन्दनहीन’’ के रूप में व्यक्त करती है।

पहले अस्थायी व्याख्याता और फिर स्थायी नौकरी के पश्चात भी लेखिका अपने उस वैवाहिक मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पाई ;जिसे हम संस्कारों में जकड़ी भारतीय स्त्री की आजीवन कैद भी कह सकते हैं जहाँ हर सम्बन्ध इस रिश्ते की कठिनाईयों का जानते व समझते हुए भी दोनों पक्षों के सामने इससे बाहर आने का विकल्प को नहीं देखता। लेखिका को अपने प्रति कर्कश व्यवहार, बच्चों के प्रति गैर जिम्मेदराना व्यवहार ही पूरे जीवन मिला था। पर फिर भी विवाह के प्रति उनका लगाव कहीं कम नहीं हुआ था। शृंगार के बिना तो वे जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकती थी ,पर बलवीर जी की मृत्यु के बाद उन्हें स्वयं उस रूप को अपनाना पड़ा ,जिससे वह बचपन से ही डरती थी। पति की मृत्यु के बाद वह उनके द्वारा किये गये शोषण की भी इतनी अभ्यस्त हो चुकी थी कि उसके बिना रहने की कल्पना भी डराती रहती थी। वाह री भारतीय नारी शोषण से भी प्यार करने लगती है। सुधा जी की आत्मकथा की यह एक बड़ी उपलब्धि है कि उन्होंने ईमानदारी से सच को अभिव्यक्त करके अपनी कथा के माध्यम से शिक्षित व आर्थिक रूप से सुदृढ़ स्त्रियों की कथा को फलक पर ला दिया है ;जिसे हम सब यह कर खारिज करते थे शिक्षित स्त्रियों के शोषण की समस्या समाज में न के बराबर है। सुधा जी के इस लंबे संघर्ष वाले कठोर जीवन में उनके माता–पिता का प्रेम व स्नेह, गुरुजनों का आशीर्वाद व अन्य जनों का स्नेह,प्रेमरूपी बौछारों से भिगोता रहा और अपनी सोंधी खुशबू से जीवन की कठिनाइयों को जीतते रहने के लिए आकर्षित करता रहा है। इस आत्मकथा में एक सघन संवेदनात्मक रचाव को सर्वत्र महसूस किया जा सकता है।

सुधाजी के भोगे हुए दारुण यथार्थ के कारण मन में जो वितृष्णा और आक्रामकता पैदा हो गई है उसे बहुत हदत क नियंत्रित कर, वे एक निर्दोष भोलेपन के साथ अपना सीधा रिश्ता पाठकों की संवेदना से कायम कर लेती है। यह आत्मकथा हमारी संवेदना को झकझोरते हुए प्रश्न उठाती है कि आखिर कब तक रिश्तों के बोझ तले दब कर बहुमूल्य ज़िन्दगियाँ बेरौनक होती रहेगी।

एक पाती सूरज के नाम( आत्मकथा)-डॉ सुधा गुप्ता, पृष्ठ :580( सजिल्द) ;मूल्य;800 रुपये ; संस्करण :2012 ; प्रकाशक: अयन प्रकाशन ,1/ 20 महरौली नई दिल्ली-110030

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