हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

अपने-अपने युद्ध - डॉ.जेन्नी शबनम

डॉ जेन्नी शबनम
डॉ जेन्नी शबनम

आई . सी . यू . में मिलने का समय अभी नहीं हुआ था। कल से तनावपूर्ण मनः स्थिति में होने के कारण निशा को चाय की तलब हो रही थी ;अतः पास के रेस्तराँ में चली गई। मौसम काफी खुशगवार था। अभी जाड़ा शुरू नहीं हुआ था, मगर उसे तेज पसीना आ रहा था और यूँ लग रहा था ,जैसे हवा थम गई हो, साँसें घुटती-सी महसूस कर रही थी। इस वक़्त रजनी की हालत का अंदाज़ा करके एक अजीब मानसिक अवस्था से निशा गुजर रही थी। कई वर्षों से निशा भी तो अस्वस्थ रहती है। ज़िन्दगी जैसे दवा-सूई-डॉक्टर की गुलाम बन चुकी है। थकावट से पाँव में दर्द हो रहा था अतः वह कुर्सी पर पाँव ऊपर करके बैठ गई। वेटर से दो ग्लास पानी लेकर पीने के बाद ज़रा सी साँसें थमी तब दो कप चाय का आर्डर दिया और बिस्किट का एक पैकेट भी। चाय की हर घूँट के साथ साँसें संयत हो रही थी और यादें बेअख्तियार बरस रही थी।

कल शाम को निशा के पास फ़ोन आया था कि रजनी की स्थिति नाजुक है और उसे अचेतावस्था में समीप के एक नर्सिंग होम में भर्ती किया गया है ,जहाँ आई.सी. यू.में वह ज़िंदगी व मौत के बीच संघर्ष कर रही है। हालाँकि डॉक्टर ने कहा था कि अब चिंता की बात नहीं है ;क्योंकि स्थिति में लगातार तेजी से सुधार हो रहा है। होश में आने के बाद सबसे पहले रजनी ने निशा को ही ढूँढा था ;अतः रजनी के किसी रिश्तेदार ने निशा को फोन कर शीघ्र आने के लिए निवेदन किया था। अगले दिन सुबह की पहली फ्लाइट से पटना पहुँच कर निशा सीधे नर्सिंग होम गई।

कितनी अकेली और खोखली ज़िन्दगी जी रही थी रजनी। जब भी खुद से हार जाती ,तब निशा को फोन कर ज़रा देर को राहत पा लेती थी। जीवन से पलायन के हर तरीके पर घंटों विचार करती ;लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाई। ऐसा नहीं कि उसके कुछ अपनों को उसकी स्थिति का अनुमान नहीं था; मगर रजनी कभी किसी से अपना दर्द साझा नहीं करती थी। रजनी जब भी आत्महत्या की बात करती ;तो निशा उसे घंटों समझाती और अपने अँधेरों से लड़ने की हिम्मत देती। धीरे-धीरे रजनी खुद को सँभाल रही थी और समझौते वाली ज़िन्दगी अपना चुकी थी।

किसे पता था, स्कूल-कॉलेज की पढाई साथ-साथ करती निशा और रजनी की किस्मत विधाता ने दो अलग-अलग रंगों – सफ़ेद और स्याह रोशनाई से लिखी है। निशा खुशहाल गृहिणी थी ,जिसकी ज़िन्दगी सफल व्यवसायी पति और बच्चों के इर्द गिर्द नाचती थी। रजनी एक सरकारी स्कूल में प्राचार्या थी ,जिसका पति सरकारी विभाग में उच्च अधिकारी था, मगर विधाता ने उसके सुख पर काली स्याही पोत दी थी। रजनी को समृद्धि व समाज में सम्मान खूब मिला ;लेकिन सुकून ने उसकी ज़िन्दगी से सदा के लिए मुख मोड़ लिया। सफल और सम्मानित प्राचार्या होने के साथ ही रजनी एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता भी थी। स्त्रियों के अधिकार के लिए कई बड़े-बड़े आन्दोलनों में हिस्सा ले चुकी है। राष्ट्रीय स्तर पर उसकी पहचान है। उसके दोनों बेटे उच्च शिक्षा प्राप्त अपनी-अपनी ज़िन्दगी में पूर्णतः स्थापित हो चुके हैं। फिर कैसा दुःख? स्याह रोशनाई ने आखिर लिखा क्या? रजनी की तकदीर निशा से अच्छी दिखती है, अपना खुद का कमा भी तो रही है। आत्मनिर्भर है। फिर?

निशा ने घड़ी में वक़्त देखा। अभी एक घंटा और है रोगी से मिलने के समय में। उसने एक कप चाय और मँगा लिया। निशा को आज भी याद है तीस वर्ष पहले जब रजनी की शादी हो रही थी, विवाह से एक सप्ताह पूर्व ही वह रजनी के घर आ गई थी। सारा दिन खरीदारी और सारी रात अच्छे बुरे अजीब-अजीब ख्यालों में कटते। बी .ए . करते ही रजनी की शादी ठीक हो गई। उसने सुना कि उसका होने वाला पति बहुत अच्छा और सिद्धांतवादी अफसर है। बिना दहेज़ की शादी हो रही है और उसने एक ही माँग किया है कि शादी के बाद रजनी पढाई कर आत्म निर्भर बनेगी। इतना अच्छा वर पाकर पूरे घर में दोहरी ख़ुशी थी, मगर न जाने क्यों रजनी खुश नहीं थी। उल्लास की जगह पर एक अनजाना डर उसे सता रहा था। निशा से वह कहती थी कि देखना मेरी शादी टिकेगी नहीं। उसका होने वाला पति जैसा दिखता है ,वैसा है नहीं। दोनों के उम्र में यूँ भी 14 वर्ष का अंतर था, इस लिए भी रजनी डरी हुई थी, कि आपसी सामंजस्य कैसे होगा।

विवाह की पहली रात से ही दोनों के बीच टकराव शुरू हो गया था। उम्र का अंतर अपना रंग दिखाने लगा। विनय चाहता था कि वह जो सोचता है, रजनी भी वही सोचे, बिना कोई सवाल किए। घर की पूरी जिम्मेवारी उठाते हुए पढ़ाई में भी अव्वल आए। जाने कैसा तो दोहरा चरित्र था विनय का। किसी दूसरे के सामने ऐसा व्यवहार करता कि लोग सोचते की विनय जैसा पति सबको मिले। लेकिन रजनी? रजनी की स्थिति ऐसी हो गई कि बिना पूछे साँस भी नहीं ले सकती थी, अगर ले लिया ,तो जाने कितना बड़ा गुनाह किया। हर काम में मीन मेख निकालना विनय के लिए मानो यह पति धर्म हो।

शादी को अभी साल भी नहीं हुआ था। रजनी का नामांकन एम.. में हो चुका था और वह घर का काम निपटाते हुए कॉलेज भी जाने लगी। एक दिन रजनी की रिश्ते की एक बहन उसके घर पढ़ने के लिए रहने आ गई। रजनी को बहुत अजीब लगा रोहिणी का इस तरह अचानक आना; लेकिन फिर यह सोच कर खुश हो गई कि एक बड़ा सहारा मिलेगा। लेकिन धीरे-धीरे वह समझ गई कि विनय ने क्यों रोहिणी को यहाँ पढ़ने के लिए बुलाया है। एक दिन रजनी की तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी। वह जल्दी घर आ गई। घर आने पर रजनी ने विनय और रोहिणी को कमरे से बाहर आते हुए देखा। पूछने पर रोहिणी ने बताया की विनय से पढ़ाई में कुछ मदद ले रही थी। कई दिन जब ऐसा ही हुआ ,तो रजनी को सारा मामला समझते देर नहीं लगी। विनय से सीधे पूछने की हिम्मत तो न थी, पर बिना कहे रहना भी मुश्किल था। पूछने पर विनय ने बेहिचक कह दिया कि तुम ठंडी औरत हो, इसलिए वह रोहिणी को ले आया है। अगर चुपचाप न रही तो वो रोहिणी से शादी कर लेगा।

रजनी ने अपनी माँ को यह सब बताया ।फिर बहुत कठिनाई से रोहिणी वहाँ से गई। इसके बाद तो रजनी ने खुद को ही जैसे नरक में झोंक दिया था। विनय खुले आम लड़कियों को काम के बहाने घर बुलाता और कमरा बंद कर लेता। रजनी को कमरे में आने की इजाज़त नहीं थी। जब विनय का मन करता रजनी को कमरे में बुलाता और इस तरह शारीरिक सम्बन्ध बनाता मानो वो  पत्नी नही,वेश्या हो।खुद की संतुष्टि के बाद बिस्तर से नीचे ज़मीन पर धकेल देता फिर उसे कमरे से बाहर निकाल देता।

पढ़ाई के साथ ही दो बच्चे हो गए। उनका पालन पोषण रजनी को ही करना होता था। बच्चे रोते या बीमार पड़ते तो रजनी दोषी होती और उसे इसकी सज़ा भी भुगतनी होती। कई-कई दिन तक विनय बात नहीं करता, न बच्चों को डॉक्टर के पास ले जाता। सब कुछ अकेले रजनी ही करती। बच्चों के बड़े होने के साथ कार्य भी बढ़ रहा था और विनय का दुर्व्यवहार और मानसिक प्रताड़ना भी।

रजनी की पढ़ाई ख़त्म होते ही उसे एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिल गई। नौकरी क्या मिली रजनी की तकदीर मानो राख हो गई। आए दिन किसी न किसी सहकर्मी के साथ रजनी का नाम जोड़कर विनय व्यंग्य करता रहता। नौकरी लगते ही विनय ने उसे कई सारे सामाजिक संगठनों से भी जबरन जोड़ दिया था, जहाँ सामजिक सरोकारों से जुड़े कार्य होते थे, विशेषकर स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा से सम्बन्धित। रजनी समझ ही नहीं पाती थी कि वो क्या करे। वो कैसे बताये कि स्त्री के जिस अधिकार की बात वह सबके सामने करती है उसकी अपनी ज़िन्दगी में वह अधिकार उसे कभी मिला ही नहीं। विनय की सामाजिक प्रतिष्ठा के आगे रजनी सदैव मूक हो जाती थी। विनय की चालबाजी किसी से कह नहीं पाती थी। यहाँ तक कि विनय के नज़दीकी मित्र भी नहीं जानते थे कि विनय अपनी घरेलू ज़िन्दगी में इतना क्रूर और शातिर अपराधी है।

रजनी का कोई सहकर्मी या रिश्तेदार घर आ जाए, तब तो मानो आफत ही आ गई। विनय ने स्पष्ट कह दिया था ”मेरा घर है जिसे मैं पसंद करूँगा,वही आएगा, बिना मुझसे पूछे किसी को भी घर लाने की इजाज़त नहीं है।”।रजनी न सिर्फ मित्रो और सहकर्मियों से बचने लगी थी ;बल्कि अपने रिश्तेदारों से भी कटी-कटी रहने लगी। सभी सोचते थे कि सम्पन्न -सुखी जीवन जीने वाली रजनी कितना बड़ा भाग्य लेकर आई है, इसीलिए घमंड में रहती है। रिश्ते-नाते व दोस्तों के लिए वक़्त ही नहीं है उसके पास। कोई कभी व्यंग्य में यह कह भी देता ,तो हँस कर बात को टाल देती थी।

रजनी वक़्त के साथ समझौता तो कर रही थी ;लेकिन मन से हार चुकी थी। अपने स्त्री होने की पीड़ा से वह घुटती रहती। हर दिन सोचती कि वह यह सब क्यों सह रही है, एक झटके में इस नरक को त्याग कर चली क्यों नहीं जाती। अपने दोनों बेटों के कारण न इस घर को छोड़ पाई न अपने जीवन को। अपने मन को अक्सर यह कह कर सांत्वना देती ”मैं स्त्री हूँ” ”तकदीर ने मेरे गले में कर्तव्यों की माला पहनाई है जो फंदे की तरह धीरे-धीरे गले को कसती जा रही है, एक दिन इसी से घुटकर मर जाऊँगी, और शायद तभी छुटकारा है।”

एक दिन दोपहर में निशा को फोन पर बताया कि उसने आज छुट्टी ली है, क्योंकि विनय सरकारी दौरे पर दो दिन के लिए बाहर गया है और दोनों बच्चे अपने दादा दादी के पास। घर में कोई नहीं है, वह जो चाहे कर सकती है। उसने खुद के लिए पोहा बनाया और चाय पीकर चुपचाप गाना सुनती रही। लता के कुछ गाने ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर आँखें भर आती हैं। वह गाना सुनती रही और खूब रोती रही। अकेले में रोना रजनी को बहुत भाता है, क्योंकि किसी के सामने रोना उसे पसंद नहीं। अब तरोताजा होकर निशा से बातें कर रही है। रजनी ने बताया कि अब आत्महत्या करने का नहीं सोचेगी। बच्चे भी अब थोड़े बड़े हो गए हैं। विनय क्या करता है, किसके साथ रात और दिन बिताता है, वह न तो जानना चाहती है ,न इससे उसे कोई फर्क पड़ता है। एक ज़िन्दगी सिर्फ अपने लिए ,एक ज़िन्दगी बच्चों के लिए और एक पूरी दुनिया के लिए।

कार्य भार और मानसिक पीड़ा अधिक होने के कारण रजनी न सिर्फ शारीरिक रूप से बीमार रहने लगी बल्कि मानसिक रूप से पूर्णतः टूट गई थी। एक साथ कई बीमारियाँ रजनी की ऐसी ख़ास सहेली बन गई थी ,जो उसका साथ कभी नहीं छोड़ेगी। एक दिन विनय ने कहा कि वह घर छोड़ कर जा रहा है। तलाक के कागज़ भेज देगा। आपसी समझौते से तलाक दे दे ,तो ठीक वरना कई सारे ऐसे इल्ज़ाम मढ़ देगा कि वो कहीं मुँह दिखाने के काबिल न रहेगी। रजनी ने कुछ नहीं कहा, चुपचाप दस्तखत कर दिए और दूसरे दिन दोनों बच्चों और अपना सामान लेकर घर छोड़कर अपनी माँ के घर चली गई। विनय कहाँ गया, किससे शादी की, रजनी ने कभी कोई खबर नहीं ली। एक छोटा फ़्लैट किराए पर लेकर अपने बच्चों के साथ रहने लगी। धीरे-धीरे ज़िन्दगी ने रफ़्तार पकड़ लिया। विनय अब रजनी के जीवन से जा चुका था। शुरू में एक दो बार बच्चों से मिलने आया :लेकिन बाद में आना हमेशा के लिए बंद हो गया। दोनों बच्चों की शादी हो गई और वे दोनों अपने-अपने परिवार के साथ दिल्ली में रह रहे हैं। रजनी का कार्य काल पूरा हो चुका था। [सेवानिवृत्ति को अभी एक साल भी नहीं हुआ था।]  नौकरी ख़त्म होने के साथ ही रजनी ने सामाजिक कार्यों से भी अवकाश ले लिए था। सभी कर्त्तव्यों का पूर्ण निर्वहन कर रजनी मुक्त हो चुकी थी और नितांत अकेली रह रही थी। रिश्तेदार कभी-कभी मिलने आ जाते थे। निशा ही एक मात्र ऐसी दोस्त थी जिससे सप्ताह में एक बार बात हो जाती थी, भले मिलना न हो पाता था।

निशा ने घड़ी देखी, मिलने का वक़्त हो गया था। वेटर को पैसे देकर अस्पताल पहुँची। रजनी उसका ही इंतज़ार कर रही थी। निशा को देखते ही बिना कुछ कहे रजनी फूट-फूट कर रोने लगी। पूरी उम्र की पीड़ा मानो आज ही रोकर बहा देगी रजनी। निशा ने उसे रोने से रोका भी नहीं। एक वही तो है जो जानती है कि रजनी को रोना भी आता है। तब तक नर्स ने सूचना दी कि डॉक्टर ने कमरे में शिफ्ट होने को कहा है। आधे घंटे में कमरा मिल गया। कमरा में जाने के बाद रजनी ने निशा को वहीं अस्पताल में रुक जाने के लिए कहा। रजनी के दोनों बेटे भी आ चुके थे। निशा ने दोनों को घर चले जाने के लिए कह दिया और खुद वहीं रुक गई।

रात का खाना खाने के बाद रजनी को बिस्तर पर लिटा दिया गया। निशा वही पर स्टूल खींच कर बैठ गई। रजनी न जाने क्यों बहुत खुश लग रही थी, जबकि अभी भी कमजोरी थी और स्लाइन चढ़ रही थी।  धीमी आवाज़ में निशा से कहने लगी कि वह बहुत खुश है। आज तक किसी का कुछ भी नहीं लिया, न पति का न बच्चों का। विवाह के बाद उस पर जितना भी खर्च होता था उससे ज्यादा का काम वो अपने पति के लिए करती थी। जब से नौकरी में आई बच्चे और घर की पूरी जिम्मेदारी उठाई। अपने लिए कुछ पैसा बचाकर बाकी रिश्तेदारों में बाँटती रही ;क्योंकि कब कौन काम में आ जाएँ ,क्या पता। सर पर किसी का क़र्ज़ या एहसान लेकर मरना नहीं चाहती, ताकि अगले जन्म में इस जन्म से कोई नाता न रहे। तमाम उम्र तिल-तिल कर मरती हुई औरत को यूँ जीते देख निशा को अच्छा भी लग रहा था लेकिन न जाने क्यों एक डर भी समाया हुआ था।

रात को रजनी की तबियत फिर बिगड़ने लगी। दोनों बेटों को निशा ने बुलवा लिया। रजनी को जब पता चला तो नाराज़ हो गई। निशा से कहा ”मैं मरने वाली नहीं हूँ। क्यों सबको बुलवा रही हो”। डॉक्टर ने बताया कि फिक्र की बात नहीं है; क्योंकि दवा का असर धीमे-धीमे हो रहा है। डॉक्टर ने बताया कि रजनी ने अपने शरीर के साथ बहुत लापरवाही की है, जिसका परिणाम है उसकी यह स्थिति। कुछ और दवाएँ देकर डॉक्टर चला गया। दोनों बेटे भी घर चले गए। रजनी सुकून से गहरी नींद सो रही थी। मानों सदियों बाद सो रही हो। निशा भी वहीं ज़मीन पर बिस्तर कर सो गई।

सुबह-सुबह निशा की नींद खुली। रजनी उठ चुकी थी और उसे भी उठा रही थी। रजनी की बीमारियों पर डॉक्टर का पूर्ण नियंत्रण हो चुका था और रजनी का अपने मन पर। डॉक्टर ने कहा कि अगर सब ठीक रहा तो शाम को रजनी घर जा सकती है। सुबह की चाय और दवा लेने के बाद रजनी ने निशा को घर भेज दिया ,ताकि तैयार होकर आ जाए। तब तक रजनी की एक रिश्तेदार वहाँ रही। जब निशा वापस आई तो रजनी को देखकर दंग रह गई। लगा जैसे आज वह उस रजनी से मिल रही है जो शादी से पहले थी। पूरी बिंदास।

शाम को रजनी घर आ गई। रात की फ्लाइट से दोनों बेटे वापस दिल्ली चले गए। निशा ने अपने पति को कह दिया कि उसे भी एक सप्ताह की छुट्टी चाहिए, यूँ भी उसके बेटी-दामाद घर और पिता का बहुत ख्याल रखते हैं। दोनों दोस्त पुराने दिनों में खो गई। ब्रेड और सूप दोनों का पसंदीदा भोजन, लता का गाना और…। बहुत कठिन तपस्या के बाद रजनी अब मालकिन थी, जो चाहे कर सकती थी, लेकिन उम्र ने उसका साथ देना बंद कर दिया था। फिर भी अतीत से ताकत लेकर रजनी एक बार फिर जीवन- युद्ध में खड़ी थी। इस बार भी अकेले, लेकिन अपने हौसले के साथ।

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