हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

इंतजार - डॉ.सुषमा गुप्ता

1- इंतजार

 यूँ तो इंतजार
Dr.SUSHAMA GUPTAएक छोटा-सा शब्द है
और याद
उससे भी छोटा
पर कभी कर के देखिएगा ।
एक एक पल की गहराई
समंदर-सी हो जाती है….
हर एक आती -जाती
साँस पर्वत-सा थकाती है ….
और घड़ी की बढ़ती
सुइयों के साथ …..
नब्ज़ डूबती-सी जाती है ।
जी हाँ ….
कभी करके देखिएगा ।
ये वो बला है …
जितना झटकोगे
उतना चिमटती जाती है ।
चित भी अपनी ..
पट भी अपनी
विक्रमादित्य के वेताल-सी
सर पर चढ़ जाती है ।
बस फिर और रस्ता
दिखाई नहीं देता …
और आप की हालत
उस राही-सी
हो जाती है ….
जो बैठा तो है ठंडी
छाँव में प्यार की ….
घने बरगद के नीचे …
पर दिल की आग
कतरा-कतरा कर
झुलसाती है
जलाती है
और लील ही जाती है ।

2- तेरे हिस्से,मेरे हिस्से

मैं रख लेती हूँ
तुम्हारी यादों से
कुछ माँगे हुए किस्से
हिसाब फिर कभी कर लेंगें
इस रिश्ते में क्या आया
तेरे हिस्से
मेरे हिस्से ….

मैंने नाराजगी रख ली
तुम भी इल्जाम
कुछ रख लो
मुकम्मल हो गया रिश्ता
मगर इक साथ न आया
तेरे हिस्से
मेरे हिस्से …

वो लम्हों की थी
जागीरें जो मिल-जुलकर
बनाई थी
हड़प गई जिन्दगी ऐसे
बचा कुछ भी न बाकी अब
तेरे हिस्से
मेरे हिस्से ….

टूटा तो जरूर है
कुछ मेरा वजूद
कुछ तेरा गुरूर भी
हिसाब फिर कभी कर लेंगें
किस के हुए ज्यादा
तेरे हिस्से या…..
मेरे हिस्से ….

3-आज  मन नहीं है

आज मन नहीं है ….
किसी की बात सुनने का
किसी से कुछ भी कहने का
किसी का काम करने का…
पर कहाँ से लाऊँ अधिकार
अपनी खुद की सुनने का ..
कैसे कह दूँ आखिर हाँ
आज मन नहीं है ।

आज मन नहीं है …
बताऊं क्या वजह है उदासी की
बोलूं क्या हुआ अहसासों को
बताऊं क्यों मन है भरा हुआ …
पर बोलने पड़ते है अल्फाज़
सौम्य सभ्य दिखने को…
कोई क्यों समझेगा भला …
आज मन नहीं है।

आज मन नहीं है…
दिन के साथ निकलने का
शाम के साथ ढ़लने का
रात की चादर लपेटने का …
पर रक्स फिर भी करना है
निरंतर घड़ी की सुइयों- सा …
बींधता समय क्यों सोचे
आज मन नहीं है ।

आज मन नहीं है …….
पर औपचारिकताएँ है बाकी
कुछ हंसी परोसनी है अभी
कुछ आँसू और पीने है …
करना है अभिनय रोज सा
सबकुछ ठीक होने का …
पर जाने क्यों …सच..
आज मन नहीं है ।

4– आँखें

तुम आए ….

तुम्हारी खूबसूरत
हाँ बेहद खूबसूरत आँखें
सवाल करती थी बहुत ..
एक रोज़ बस यूँ ही
देख के अनदेखा
कर न पाई..
तुम्हारी खूबसूरत आँखें ।
और थमा दी तुम्हें
अपनी जिंदगी की किताब
एक -एक शब्द
वक्त की कलम से
बड़ी मेहनत से लिखा था मैंने
तुम्हारे पढ़ने के
इंतजार में
कभी खोली नहीं  किताब ये…
तुम्हारी और बस तुम्हारी ही
आँखों की बाट जोहता रहा
मेरे वजूद से गढ़ा गया
एक -एक शब्द ।
तुमने अपने मजबूत हाथों से
खोला भी मुझे
तपती आँखों से
लफ्ज़ दर लफ्ज़
पढ़ा भी मुझे …
और फिर …
फिर वहीं हुआ ,
जो  अक्सर होता है ।
किताब पुरानी हो गई ..
अब मैं पढ़ती हूँ ..
खुद को ऐसे
जैसे नज़र तुम्हारी है
और दर्द मेरा…
पर अब बस भी करो..
हाँ !हाँ !तुम…
अब बस भी करो
मेरी आँख से बहना तुम
जिंदगी की किताब के
हर पन्ने की स्याही
फैल चुकी है।

5- अकाल

यादों की मिट्टी पे
जब भी पलकों का
पानी गिराया …
खुशबू ही आई है
सौंधी-सौंधी-सी …
वक्त बीतता गया
मिट्टी पड़ने लगी
कड़ी -कठोर….
आने लगी
गहरी तरेड़ें…
मिट्टी के वजूद में।
फिर ?
फिर पलकों का पानी
पर्याप्त नहीं रहा….
सूखी मिट्टी के लिए ।
गहरी हुई तरेड़ों में
कहीं गुम होने लगा…
पलकों का पानी ।
फिर ?
फिर वक्त और
बीतता गया…
बंजर होने लगी
यादों की मिट्टी…
और सूख गया
पलकों का पानी …
सब बंजर हो गया
आखिर ।
यादें भी पलकें भी ।
कुछ लोग इसे
संवेदनाओं का
अकाल भी कहते है
ठीक से तो नहीं पता
पर शायद
आपात्काल की स्थिति है
किसी भी इंसान के
वजूद की ये …।

डॉ. सुषमा गुप्ता
जन्म : 21 जुलाई 1976,   दिल्ली
शिक्षा :   एम कॉम (दिल्ली यूनिवर्सिटी ), एम बी ए (आई एम टी गाजियाबाद),    एल एल बी,पी -एच. डी.
कार्य- अनुभव :   कानून एवं मानव संस्थान की व्याख्याता-  2007-2014    (आई एम टी गाजियाबाद )
सम्मान : हिंदी सागर सम्मान – 2017
प्रकाशन :समाचार पत्रों एवं  पत्रिकाओं में कुछ रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।
प्रकाश्य- साझा संग्रह( जे एम डी प्रकाशन )*नारी काव्य सागर,
*भारत के श्रेष्ठ युवा रचनाकार

ई मेल :    suumi@rediffmail.com