हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

उम्मीदों के उच्छ्वास की कविताएँ - जय कृष्ण शुक्ला

कविता एक भाव-योग है। यह मन से निकल कर मन को ही प्रभावित करने वाला है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कविता के सन्दर्भ में यह कथन समकालीनता में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कवर 2 - Copyकि छठें दशक में .डॉ० सोनिया गुप्ता का नव-प्रकाशित काब्य संग्रह  उम्मीद का दीया संवेदना की भूमि पर अभी- अभी  पाँव रखे युवा- कवयित्री के मन से सद्य: प्रस्फुटित अनुभूतियों का संकलन है।

यह अनुभूतियॉ कभी चौंकाती हैं ,तो कभी उलझन में भी डाल देती हैं और कभी-कभी तो ऊर्जस्वित उर्मियों सी चमक उठतीं हैं कि इनकी चकाचौंध में निराशा व हताशा पलायन के मार्ग भाग चलती हैं :-

-क्या है आखिर ये डर,

किस बात का डर,

किससे डरता है इंसान,

मुश्किलों से या खुद से ?डर ,पृष्ठ- 49.

अपने भावों की अभिव्यक्ति को जिस प्रबलतम तरीके से कागज़ पर उकेरा है ,उसे पढ़ कर लगता है कि लेखक की भावनाएँ न केवल अपने मन की बात साझा करने की है बल्कि समाज में व्याप्त बुराइयाँ एवं मानव जीवन के मूल्यों के बारे में भी गहन चिन्तन नज़र आता है।जब अभिनन्दन की बात करती है तो उनका कथन होता है कुछ इस तरह से:

जो मौत का भी न रखें खौफ़ मन में ,

मुक्ति उनका अभिनन्दन करती है

जो समझ गए हो अर्थ इस जिंदगी का ,

जिंदगी उनका अभिनन्दन करती है !

डॉ० सोनिया की कविताएँ उम्मीद का अनावश्यक बखान नहीं करतीं ;बल्कि अभिव्यक्तियों से उम्मीद स्वयं छलक पड़ती है :-

 कारण बन जाऊँ

किसी की मुस्कराहट का,

चाहे दो पल की ही

दे पाऊँ उसको खुशी। -प्रेरणा

कवियत्री अनुभूति की भी अत्यन्त धनी हैं। कुछ तो चौंका ही देते हैं :-

-मुस्कराहट एक अनोखा नकाब है।

-घर दीवारों से नहीं बनते।

और कुछ जगहों पर कविता की लयबद्धता अपनी मृदुलता से सहृदय पाठक को मन्त्र- मुग्ध कर देती है :-

-जब सुख का सागर छलकेगा,

और गम का बादल सरकेगा,

हर महफिल भी सज जाएगी,

वह सुबह कभी तो आएगी !

अब यूँ तो जितना भी लिखा मुक्कमल लिखा है और सबसे बड़ी बात है की इनके सृजन में एक परिपक्वता है, जो हमे सोचने को मजबूर करती है कि एक लेखक का नज़रिया कितना विशाल है और होना चाहिए , क्योंकि भावों की अभिव्यक्ति को अपने शब्दों में बाँधना भी एक कला है। दुनिया में सोचते सब है सब के अपने अपने ख्याल होते है पर उन्हें मूर्त रूप देना और वो भी अपनी कल्पना को कविता में ढालना ,यह बहुत बड़ी बात है इनकी एक और रचना जिसने मुझे आनन्द की नुभूति दी , देखियेगा-
कभी कभी इस गम को भी अपनाना अच्छा लगता है,

कभी कभी बेरुखा जीवन बिताना भी अच्छा लगता है,

कभी कभी काँटों को यूँ सराहना भी अच्छा लगता है,

कभी कभी सूखे पत्तों को सँवारना भी अच्छा लगता है !

मानता हूँ कि अभी कवयित्री को बहुत कुछ सीखना बाकी है, किन्तु चुकि यह प्रथम प्रयास है इस उभरती हुई कवयित्री द्वारा, इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी कलम से निकले शब्द सीधे, सरल और साफ़ भाव लिये हृदय को छू गये हैं ! थोड़ा शिल्प पक्ष की ओर ध्यान देने से,  आने वाले समय में  डॉ सोनिया काव्य जगत में एक उज्ज्वल भविष्य लिये नजर आएँगी !

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काव्य संग्रह ‘उम्मीद का दीया,कवयित्री : डॉ. सोनिया गुप्ता ;प्रकाशक : दी पोएट्री सोसाइटी ऑफ़ इंडिया, गुडगाँव !