हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ऋण–मुक्ति - डॉ.आरती स्मित

आरती स्मित
आरती स्मित
“बाबूजी ! माँ अब ख़तरे से बाहर है। घर चलिए और कुछ खा-पीकर थोड़ा आराम कर लीजिए। पूरी रात अपने आँखों में ही बिता दी है।”
निशा की आवाज़ से मैं चौका । सिर उठाया, हिलाया मगर, बोल न फूटे। फूटते कैसे? मैं तो उससे नज़र मिलाने के भी काबिल ना था। जिस बच्ची को हमलोगों ने दिल से बेदखल कर दिया, वह भी महज इसलिए कि अपने सपनों को जीवित रखने के लिए उसने गाँव की संकीर्णता को अँगूठा दिखाकर महानगर को अपना लिया था, आज उसी ने …. ।

पाँच वर्ष ! कैसे बीते वे पाँच वर्ष उसके ! हमलोगों ने जानने की भी कोशिश नहीं की। उसके शब्द आज भी गूँज रहे हैं, “बाबूजी आप माँ को गूंगी बना सकते हैं ,मुझे नहीं।”
“चुप नासपीटी ! क्या बकती है ?”
माँ खिसियाकर कहती ज़रूर , मगर मैं उसके दिखावे को समझता था। बेटे के डर से हम दोनों मूक दर्शक बने हुए थे ।
“मैं बकती हूँ? हाँ, ठीक कहती हो माँ ! ईट –गारे की दीवारों से मगज़मारी करते –करते तुम्हारी संवेदना भी सीमेंट हो गई है। मगर याद रखो, मेरे पैरों में बेड़ियाँ डालकर कोई सुखी ना होगा ।“
“क्या इस घर ने यही संस्कार दिए हैं तुझे ?” बोल! बोलती क्यों नहीं !!”
मैंने हुंकार भरी और आवेश में उसकी ओर झपटा।
“बस्स ! बाबूजी बस्स !! बहुत हो गया। भैया के डर से आपलोगों ने जब मेरी पीड़ा को अनदेखा करने की ठान ली है तो मैं समर्थन के लिए मनुहार नहीं करूँगी। अगर ससुराल वालों से आजीवन प्रताड़ित होना संस्कार है तो मैं इस संस्कार का दाह- संस्कार करती हूँ।“
“तो तू भी हमारे लिए मर गई।“
ऋषभ कमरे में घुसते- घुसते चीखा था।
शायद उसने हमारी बातें सुन ली थीं।

निशा चली गई। अस्त- व्यस्त परेशान सी। हम मर्यादा और संस्कारों का रोना रोते रहे। दामाद को मनाते रहे कि वह निशा को क्षमा कर उसे वापस ले आए। हमारी नरमी उनकी अकड़ बढ़ाती रही। समझ ही नहीं पाए हम कि एक खुशदिल लड़की आज उद्दंडता से क्यों पेश आ रही है ? …. क्यों अपना जीवन दॉँव पर लगा रही है ! और , एक दिन पड़ोसी ने बम विस्फोट किया था … “सागर साहब की बेटी तो किसी के साथ भाग गई ।”
“ज्यादा पढ़ –लिख लेने से लड़की का दिमाग खराब हो जाता है।”
“और नहीं तो क्या ! ज़रा भी नहीं सोचा कि बेचारे सागर साहब की कितनी जगहँसाई होगी !”
“अजी ! ससुरालवाले भी कहाँ मुँह दिखाने के लायक रहे ! दामादजी के सीधेपन का छोरी ने खूब फायदा उठाया।“
पड़ोसियों और रिश्तेदारों की टिप्पणियों ने कानों को शीशा घोलकर पिलाना शुरू किया। हमलोगों ने भी वही सोचा , जो समाज ने सोचा। हमें हमारी परवरिश पर भरोसा न रहा। नहीं सोच सके कि स्त्री –पुरुष में केवल बिस्तर का ही संबंध नहीं होता। शिक्षित होने के बावज़ूद मेरी समझ संकीर्ण हो चली थी या जाहिलों के बीच रहते –रहते मैं भी जाहिल हो गया था मगर, दिखता न था।
निशा अब हमारे परिवार का हिस्सा नहीं रही। उसकी माँ छिपकर तड़पती, पर मेरे सामने उसे जी भरकर कोसती ; “क्या कमी की थी हमलोगों ने । इतना खर्च-वर्च करके नौकरी वाला लड़का ढूँढा, सब व्यर्थ हो गया । उसपर से जगहँसाई !”
“हम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहे।”
ऋषभ भी माँ पर अपनी खीझ उतारता । भीतर पसीजती माँ ऊपर से पाषाण बनी रहती। मैं सचमुच पत्थर हो गया। भूल गया कि वह मेरी ही चुलबुली निशा है, जो बचपन से ही कल्पना में उड़ाने भरती थी। कहती थी, “बाबूजी ! मेरे सपने एक दिन ज़रूर सच होंगे !”
“बाबूजी ! उतरिये, घर आ गया।”
निशा ने दूसरी बार टोका। मैं फिर सिर हिलाकर रह गया। वक़्त मुझे गूँगा बनाता जा रहा था शायद!
निशा के बार-बार कहने पर मैं बिस्तर पर लेट गया। लेट तो गया, मगर आँखों में नींद नहीं आनी थी, सो नहीं आई। आती भी कैसे? आँखों को यकीन ही कहाँ हो रहा था कि यह अपनी ही निशा है, जिसे हमलोगों ने दुत्कार दिया और समाज के सुर में सुर मिलकर उसे कुलक्षिणी, कुलनाशिनी और न जाने क्या-क्या कहते रहे; जो विक्षिप्तता के कगार पर खड़ी हमें चेता रही थी कि दामादजी उसे पागल बनाने पर तुले हुए हैं। सास उसे जीने नहीं दे रही । हम साथ दें, नहीं तो वह कोई कदम उठा लेगी… मगर हम ,हम तो परंपरा की पट्टी बाँध गांधारी बने रहे, ना उसकी भावनाओं को समझा, ना व्यवहारों को देखा। बस, उसके नाम का श्राद्धकर्म कर चंद लम्हे शोक संतप्त हो लिए।
दिल्ली आकर पहले तो वह रिश्तेदार के आश्रय में गई, पर जब उसका स्वाभिमान उनके कटाक्षों की बलि चढ़ने लगा तो अपने मित्र के सहयोग से उसने अपने लिए वैकल्पिक व्यवस्था ढूँढी। एक ओर हताशा भरी वैवाहिक ज़िंदगी थी, दूसरी ओर सपनों की ऊँची उड़ान के लिए व्यापक आसमान । संघर्ष के थपेड़ों ने उसके शरीर को थकाना चाहा, लेकिन हमारे परित्याग की चोट ने उसके संकल्प को और दृढ़ कर दिया था। आज यही दृढ़ता मैंने उसके चेहरे पे देखी । लेकिन, आज वह उद्दंड नहीं, शालीन है। संस्कार का नूर उसके भाल पर चमक रहा है । देश- विदेश में प्रसिद्धि पाकर भी वह शांत, सुशील और सेवारत है, जैसे माँ के बीमार होने पर पहले हुआ करती थी।

“बाबूजी ! चाय पी लीजिए।“
निशा की आवाज़ सुनकर मेरी निद्रा टूटी। मैंने धीरे से आँख खोली। कहना चाहा, “क्यों तक़लीफ की? मैं बाहर आकर पी लेता।”
मगर कह न पाया। होंठ मानो आपस में सट से गए हों। उसने फिर कहा, “आपको शाम पाँच बजे चाय की आदत है ना !”
अब स्थिर ना रह सका मन। आँखें छलक़ीं, मैंने छलकन दबाने की, रोकने की पुरजोर कोशिश की , मगर बेकार। गला रूँध गया। इतना ही कह पाया,
“तुझे मेरी आदतें अबतक याद हैं !”
“हाँ सबकुछ !”
“लेकिन हमलोगों ने तो तुझे …”
हलक में कुछ हुआ। शब्द कंठ में फँस से गए।
‘बाबूजी !’ कहती हुई वह मेरे पास बैठ गई।
“आपलोगों ने मुझे छोड़ा था, मैंने नहीं । मैं तो आपदोनों को साथ ले आई थी। आज मैं जो कुछ हूँ, आपदोनों को आशीष का ही फल है। आप अपनी जगह सही थे, मैं अपनी ।”
“बेटी ! मैं …”
“कुछ मत कहिए बाबूजी । अच्छा अब चाय खत्म कर तैयार हो जाइए। माँ के पास चलना है। विजिटिंग आवर छ्ह से आठ बजे तक का ही है । मैं नीचे आपका इंतज़ार करती हूँ ।”
वह मुड़ी और चली गई। मैं देखता रहा। अपनी गोद में खेली इस बच्ची का आकार नाप ना पाया। सचमुच ! उसके व्यक्तित्व का आकार उसके बाप से कई गुना ज्यादा बड़ा हो गया था।
रास्ते भर वह खामोश रही । मैं अतीत और वर्तमान के बीच गोते लगाता रहा,पर तैराक अच्छा ना था, सो पार ना पा सका परिस्थितियों की । पिछले कई महीने से उसकी माँ सीना दर्द से पीड़ित थी। ऋषभ को कई बार ख़बर भिजवाया कि अपनी माँ को ले जाकर बड़े डॉक्टर से दिखला दे । पर, उसे कंपनी के काम से कभी फुर्सत नहीं मिली। फोन पर दिलासा और नसीहत देता कि वैद्यजी से कहूँ कि अच्छी से अच्छी दवा दे। माँ ज़रूर अच्छी हो जाएगी।
पिछले सप्ताह उसकी माँ के सीने में दर्द की लाकर नहीं, सैलाब आया। उसकी तड़प मुझसे और देखी न गई। भतीजे को साथ लेकर आ पहुँचा दिल्ली। सोचा, बेटे को फुर्सत नहीं मिल पा रही। चलो, इसी बहाने सबसे भेंट हो जाएगी और वह अच्छे डॉक्टर से माँ का इलाज भी करवा देगा । बड़े- बड़े अस्पतालों में अकेले जाने की हिम्मत कहाँ !”
दर्द से अधमरी हुई उसकी माँ को जैसे-तैसे सहारा देकर हमलोग ऋषभ के फ्लैट पहुँचे । घंटी बजाई। दरवाज़ा खुला और बहू बाहर निकली। हमें बैठक की तरफ़ जाने का इशारा करती हुई उसने नौकर को चाय के लिए आवाज़ दी। उस आवाज़ में बोझिल औपचारिकता की बू उफान पर थी। नौकर ने चाय लाकर मेज़ पर रख दी और पलटकर चला गया। बहू कहीं नहीं दिखी। करीब आधे घंटे बाद ऋषभ परेशान- सा हमारे पास आया। शहरी सभ्यता के हिसाब से घुटने तक झुककर हमारे चरण –स्पर्श की परंपरा –निर्वहन का ढोंग करते हुए पूछा, “ आने की ख़बर नहीं दी आपलोगों ने ” ।“
“इसमें ख़बर क्या देना ! अपना घर है। वैसे भी तुम्हारी माँ की तबियत …..”
“बाबूजी ! कल तो सुभद्रा और मैं सिंगापुर जाएँगे । सुबह की फ्लाइट है। हमारे लौटने के बाद ही माँ का …”
“जाना ज़रूरी है?”
“आप समझते क्यों नहीं ? बार-बार इतना समय नहीं मिल पाता है हमदोनों को। इसपर सारा खर्च भी कंपनी दे रही है । ऐसे में कोई भी भला फ़ॉरेन टूर क्यों छोड़ेगा?”
“टूर माँ की तकलीफ़ से बढ़कर है बेटा?”
“आप तो कुछ सुनने- समझने को तैयार ही नहीं हैं।”
मेरी बात पर वह झुँझला उठा ।
“वैसे भी, जिनके बच्चे महानगरों में नहीं रहते, उनका इलाज नहीं होता क्या …यहाँ हॉस्पिटलों में सारी व्यवस्था रहती है। आप रोमेश को भेजकर पहले नंबर लगवा लीजिए , फिर माँ को दिखला दीजिए। तबतक, यहाँ आराम से रहिए। राजू (नौकर) घर पर ही रहेगा।”
ऋषभ की माँ, जो तकलीफ़ से अधमरी –सी पड़ी थी, बेटे की बात सुनकर चेतनाशून्यता में जाकर कहीं सचेत- सी हो गई और कहने लगी-
“तेरे बाबूजी तो सठिया गए हैं । तू उनकी बात का बुरा मत मान ! रोमेश है न हमारे साथ। वह दिखला देगा डॉक्टर को । तू अपने जाने की तैयारी कर।”
पत्नी की बात सुनकर मैं हैरान रह गया। उसकी तरफ़ देखा तो पलकों के नीचे झिलमिलाती बूँदें मुझे वास्ता दे रही थीं कि दूध और ख़ून का हिसाब बेटे से ना माँगा जाए। मैं उस माँ की व्यावहारिकता को नमन करने लगा, जो कम पढ़ी-लिखी थी।
ऋषभ आश्वस्त होकर अंदर के कमरे में चला गया। शायद, बहू को बताने के लिए कि बला टल गई। बैठक से अंदर कमरे में जाने के लिए कहना भी भूल गया… उसने घर से निकाला तो नहीं, पर दिल से धक्का मारकर निकाल दिया है, इतनी बात हम दोनों की समझ में आ गई। फिर एक मिनट भी वहाँ रुकने का मन ना हुआ। रोमेश से कहा कि किसी सराय में ले चले।
“चाचाजी, निशा के पास चलें?” भतीजे ने डरते-डरते पूछा ।
“किस मुँह से जाएँ बेटा ! इस कुलदीपक को ख़ुश रखने के लिए उससे ही नाता तोड़ लिया हमने । पाँच साल में पता तक नहीं किया कि वह जीती है या…”
आगे बोल न पाया ।स्वर अवरुद्ध हो गया।
“अब कुछ न सोचिए । निशा का पता मेरे पास है !”
“कहीं उसने भी….?”
“नहीं, चाचाजी !”
मेरी आशंका समझते हुए उसने बीच में ही टोका- “निशा हमारा इंतज़ार कर रही है।“
हमें सामने देखकर कैसे जी उठी वह । आनन- फानन माँ को डॉक्टर के पास ले गई। उसी रात उसकी माँ एडमिट कर ली गई। बाइपास सर्जरी हुई। दो आर्टरीज़ ब्लॉक थीं। इसी वजह से शायद इतनी परेशान थी वह ।
कितना ख़र्च आया – चाहकर भी पूछ ना पाया। पूछने की हिम्मत नहीं हुई। उसने माँ को मरने से बचा लिया और मैं अपराध बोध से ग्रसित, दंड पाने की लालसा लिए, सहमे बच्चे की तरह उसके साथ-साथ डोलता रहा। सोचता रहा कि माँ के दूध और मेरे ख़ून का ऋण तो तूने उतार दिया पर मैं कैसे उबरूँ?
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