हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

औरों की खुशियों में (सार या ललित छंद ) - सुनीता काम्बोज

1-सुनीता काम्बोजक बार गर गई, लौटकर,आती नहीं जवानी
माटी में माटी मिल जाए,ये पानी में पानी ।

सबको इक दिन जाना होगा,जो दुनिया में आया
हँसकर रोकर इस मानव ने,जीवन का सुर गाया ।

ज्ञानी है कोई इस जग में,कोई है पाखण्डी
कोई सरल बड़ा ही मिलता,कोई बड़ा घमण्डी ।

इस दुनिया में कुछ लोगों को ,अपना आप सुहाता
जो उनकी अच्छाई गिनता ,केवल वो ही भाता ।

रंग- बिरंगे सजे खिलौने ,दुनिया लगती मेला
कोई जीता भीड़- भाड़ में,कोई रहा अकेला ।

सारा जीवन धन के पीछे ,फिरते हैं बौराए
जितना मिलता कम पड़ता है,  हाय हाय! चिल्लाए ।

औरों की खुशियों में खुशियाँ ,जिसने ढूँढी ,पाई
रहता नहीं कभी वह प्यासा, मिट जाती तन्हाई ।

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