हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

कविता -लकी निमेष - लकी निमेष

सब मुखौटा है लगाए फिर रहे

और सच को सब छिपाए फिर रहे

एक वह है कुछ बताता ही नहीं

एक हम है सब बताए फिर रहे

लोग पैसो के लिये है बावले

और रिश्तों को भुलाए फिर रहे

कामयाबी से मेरी हैरान सब

दांतो में  उँगली दबाए फिर रहे

मर  मिटेंगे  एक दिन दिल में लिये

दर्द जो दिल में दबाए फिर रहे

हाल वह ही पूछते है अब लकी

देख लो जिनके सताए फिर रहे

-0-लकी निमेष,रौजा-जलालपुर,ग्रैटर  नौएडा,गौतम बुद्ध नगर

nimeshlucky716@gmail.com