हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

कविता शब्दों में आदमी होने की गवाही है - सुशील कुमार शैली

कविता शब्दों में आदमी होने की गवाही है । यह गवाही किसी कवि में जितनी सश्क्त, जितनी बॉल्ड, सुशील कुमार शैलीजितनी पुरज़ोर होगी वह उतना ही आदमी को कविता, कविता को आदमी की रक्षा में खड़ा कर सकेगा । इसी मिलन बिन्दु पर हम कविता को ‘आदमीयत की कविता’ के नाम से सम्बोधित करते हैं । ‘आदमीयत की कविता’ में आदमी का अपने समूचे में होना ही उसकी सार्थकता है । जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर कविता लिखी जाती है, लिखी जाती रहेगी । लेकिन क्या कविता का कार्य जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करवाना ही है । अगर हाँ तो कविता अपने मानवीय स्तर से नीचे न गिर जाएगी । कविता का यही ध्येय मानने वाले आदमी को समूचे रूप में कविता में न रख कर उसके अंगों को रखकर या तो रोते रहते हैं या यथार्थ का बिम्ब खींचकर साहित्य की किसी दीवार पर चिपकाते रहते हैं । पता नहीं वे उससे उनके कौन से उद्धेश्य की सिद्धि करना चाहते हैं । कविता का ये रूप क्या लोक में चेतना का विकास कर सकेगा । नहीं वह लोक को या तो निराशा के गहरे गर्त  में ले जाएगा या कविता से दूर या वाह वाही की ओर । ऐसे में लोक का उसके सम्पूर्ण रूप में कविता में आना कितना जरूरी है, आप समझ सकते हैं । रोज़मर्रा की जीवन यात्रा में हम पता नहीं कितने व्यक्तियों से मिलते हैं । प्रत्येक व्यक्ति का अपना संपर्क क्षेत्र होता है, जो उसके स्वभाव व कर्मक्षेत्र के ही अनुरूप होता है । लेकिन क्या एक कवि के जीवंत कर्मक्षेत्र को बांधा जा सकता है ? क्या उसके परिचित व्यक्तियों की कल्पना की जा सकती है ? इसी प्रश्न में कवि की, कविता की सामाजिकता, आदमीयत का उत्तर छिपा है । जिस कवि की पहचान लोक होगी उसकी कविता की पहचान भी लोक होगी । ऐसे में क्या कवि का दायित्व सिर्फ लोक -पीड़ा को शब्दबद्ध करना है । किसी संवेदनशील कवि ने सड़क पर किसी गरीब व्यक्ति को कार के नीचे कुचला देखा । अब वो क्या करेगा ? वहीं बैठकर उसका शब्दबद्ध चित्र बनाएगा या उसकी सहायता करेगा या अनदेखा कर देगा । यह उसकी अंत:श्चेतना और लेखनी के दायित्व पर निर्भर करता है । जो कवि वहाँ से अनुभव बटोरने लगेगा  उसकी लेखनी में केवल शब्दचित्र होगा ,जो शाब्दिक करुणा, रुदन से भरपूर । क्योंकि ऐसे लेखक संघर्ष से दूर भागते परिस्थितियों पर केवल विलाप करते सकते हैं, विरोध नहीं । जो कवि उसे अनदेखा करेगा वह घर के किसी सुन्दर से कमरे में फूलदान और प्रेमिका की बगल में बैठकर काम रस की ऐसी पिचकरियँ छोड़ेगा कि साहित्य में कामसूत्र का वंशज वही है । जो कवि उस व्यक्ति की सहयता के लिए तत्पर होगा, जो उसके जीवन की रक्षा को प्राथमिकता देगा, जो उसके प्राणों को बचाकर उसे अस्मिता, अस्तित्व के प्रति चेतन करेगा, उसे संघर्षरत करेगा वो अपनी लेखनी में न तो विलाप करेगा, न ही काम उडेलेगा वो कविता को एक हथियार की तरह प्रयोग करेगा जिसका ध्येय होगा आदमीयत की रक्षा । लेखन का कर्म लोक के लिए जीवन की मूलभूल आवश्यकताओं की पूर्ति करना कतई नहीं है । जो लेखन ऐसा दावा करता है वह लेखकीय राजनीति में खेला गया बस एक जुमला है और जन सामान्य को भ्रमित करना है । लेखन न तो अपने सारे इतिहास, भूगोल में लोक के लिए जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर सका है न ही कर सकेगा । लेखन का कर्म क्षेत्र तो लोक को ही जीवन की मूलभूत आवश्कताओं की पूर्ति के लिए तत्पर करना है । जहाँ लोक पर अत्याचार हो, उसका शोषण हो, उसका दलन हो, उसकी अस्मिता को कुचला जाए, उसकी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को छीना जाए ,वहाँ कविता का कर्मक्षेत्र आरम्भ होता है । वह लोक को ऐसी परिस्थितियों के प्रति सचेत करती है, उसे शोषण के पीछे की कुंठित मानसिकता के प्रति जागरूक करती है, संघर्ष के लिए संगठित करती है और अंतत: उसे अस्मिता प्रदान करती है ।

कविता एक हस्तक्षेप है ठहरी हुई मानसिकता में, वैश्वीकरण, उद्योगीकरण, उपभोगतावाद, विकासवाद की अंधी दौड़ में । भौतिकता के बढ़ते प्रभाव ने एक निरुद्देश्य दौड़ शुरू कर दी है, जिसे कुछ बुद्धिजीवी विकास का नाम देते हैं । इसी विकासवाद के नाम आदमी का शोषण रहा है, हो रहा है, होता रहेगा । आदमी की दिनचर्या में बस घर से ऑफिस, ऑफिस से घर तक का ही परिवेश है । उसका चेतन, अचेतन मन बस कुछ इच्छाओं की पूर्ति के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है ; जिनका अंत कभी नहीं होता, वह मुँहबाए हर वक्त उसके आगे खड़ी रहती हैं । अब हमारे समाने प्रश्न ये है कि वैश्वीकरण, उद्योगीकरण, उपभोगतावाद, विकासवाद क्या कोई ऐसी वस्तु या वाद है जो आकाश से गिरा है ? नहीं यह एक षड़यंत्र है जो विश्वपूँजी का पैदा किया एक मायाजाल है । जो भौतिक वस्तु तत्त्व का एक ऐसा जाल बुन देना चाहता है कि व्यक्ति समाज आराम, सुविधा और ऐश के नाम पर उसे जुटाने में लगा रहे और सुविधा जुटाने की यही दौड़ चल रही है । धीरे धीरे अब ये हालात पैदा हो गए हैं कि  वस्तु के उत्पादन को दुनिया के चंद लोगों ने अपने तक केन्द्रित कर लिया है । केन्द्रीयकरण के इसी षड़यंत्र के तहत वह नब्बे प्रतिशत जनता पर राज कर रहा है । इस षड़यंत्र में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में उसका साथ दे रहा मध्यवर्ग, उच्च मध्यवर्ग । बड़े बड़े उद्योग स्थापित हो रहे है । उसमें उत्पादन करता है निम्न मजदूर वर्ग । जिस के शोषण के तरीके ईजाद करता है मध्यवर्ग, उच्च मध्यवर्ग और शोषण करता है पूँजीपति, जो उसी पूँजी पर ऐश का जीवन व्यतीत करता है । जैसे अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ के लिए कुशल शिक्षित क्लर्क पैदा किए वैसे ही येपूँजीपति प्रोफ़ेश्नल स्किल और तकनीकि शिक्षा के नाम पर व्यक्ति व्यक्ति में भावनात्मक सूत्र, परस्पर सहयोग को समाप्त कर देना चाहते हैं । व्यक्ति को एक मात्र उद्योगिक  मशीन के रूपांतरित कर देना चाहते हैं । यही कारण है संयुक्त परिवार धीरे धीरे समाप्त हो रहे है । रिश्ते में धन परिवेश कर गया है । परस्पर सहयोग, स्नेह समाप्त हो गया है । ये कितना गहरा षड़यंत्र है कि जिसकी जड़ें व्यक्ति के भीतर तक परिवेश कर चुकी हैं और आश्चर्य की बात ये है कि उसे पता तक नहीं कि वो मानव से धीरे धीरे रोबोट संस्कृति की ओर बढ़ता जा रहा है । साहित्य से व्यक्ति की दूरी का एक यह भी कारण है । इसीलिए लेखन, कलम का यह दायित्व है कि वह इस जड़, ठहरे हुए समाज में बलात् प्रवेश करे और एक हलचल पैदा करे, हस्तक्षेप करे । कविता अपने समय के बदलाव को गर्भ में लिये रहती है इसी में कविता की जीवंतता है । समकालीन कविता में उन सारे परिवर्तनों के पदचिह्न होते हैं जो उस समय घटित होते हैं । सही कविता भूत की वर्तमान से तुलना, विश्लेषण करते हुए भविष्य के निर्माण के लिए मार्ग बनाती है । इसीलिए कविता को सृष्टि सृजना भी कहा जाता है ।

कवि कविता से होता है न कि कविता कवि से । सही कविता की पहचान कवि न होकर लोक होती है जहाँ कविता लोक-गीत की तरह लोक की हो जाती है । कवि मर जाता है कविता जीवित रहती है । लोक की कविता को जो भी व्यक्ति  पढ़ता है उसे अपनी सी लगती है । यही कविता का प्रभाव है । लोक कविता बहते दरिया की तरह होती जो निर्मल, सात्विक और परिवर्तनशील होती है । लोक कविता के दरिया में जो भी अपना चेहरा देखता है उसे अपना अश्क साफ़ दिखाई देता है । इसका एक कारण लोक कविता में लोक भाव और लोक भाषा का प्रवाह है । लोक कविता में भाषा व भाव घुलेमिले होते हैं जिसे अलग-अलग करके समझना कविता के प्रभाव की मृत्यु । कविता को अगर ज्योति मान लिया जाए तो भाव उसका ताप है और भाषा प्रकाश । कविता अगर तहज़ीब है तो भाव उसका मज़हब, भाषा अदब । इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि कविता भावों का भाषिक अदब हैं इस लिए किसी कवि में भाव जितने सात्विक, तीव्र होगें भाषा उतनी ही प्रभावमयी होगी । भाषा विषय व कवि के दर्शन के अनुरूप कविता में उतरती है । इसी लिए भाषा का प्रभावी होना कवि की विषय के प्रति सामान्यकृत अनुभव पर निर्भर करता है । ऊपरी अनुभूति को लेकर लिखी गई कविता भाषिक छद्म होगी जहाँ विषय एक जड़ मूर्ति होगा और भाषा उस मूर्ति को प्रयत्न-पूर्वक पहनाया गया वस्त्र । इस लिए कविता में भाषा स्वत: उतरती है प्रयत्नपूर्वक, बलपूर्वक बैठाई नहीं । कविता में समकालीन परिवेश साँस लोता है और भाषा उसकी धड़कन होगी है । इस लिए कविता का कर्म अपने समकालीन परिवेश, सामाज का निर्माण करना है, इसी में कविता की सार्थकता है ।

-0-सुशील कुमार शैली,सहायक प्राध्यापक,  एस. डी कॉलेज, के. सी. रोड़ , बरनाला (पंजाब) 148101
ई.मेल- shellynabha01@gmail.com