हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

‘काश पंडोरी न होती’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा - सम्पादक

प्रगति मैदान विश्व पुस्तक मेला 2017 में 11 जनवरी को मृदुला श्रीवास्तव के कहानी संग्रह ‘काश पंडोरी न होती’ के लोकार्पण कार्यक्रम एवं पुस्तक परिचर्चा का आयोजन साहित्य मंच पर किया गया।
पुस्तक का लोकार्पण हिंदी जगत के मूर्धन्य साहित्यकार श्री महेश दर्पण, श्री सुभाष नीरव, डॉ रमेश तिवारी और डॉ अमरेन्द्र मिश्र के हाथों संपन्न हुआ।कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी साहित्य जगत के प्रतिष्ठत कहानीकार और समीक्षक श्री महेश दर्पण ने की।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मृदुला श्रीवास्तव की कहानियाँ अपने कहन में विशद है। “फेरन” कहानी का ज़िक्र करते हुए उन्होने कहा कि कथाकार ने अपने को एक ही विषयो में सीमित नहीं रखा है।उनके पास जीवन के अनुभव तो है ही <साथ ही वो कुछ ऐसे अनुभव भी बटोरती है और बटोरना चाहती है जिससे हमारा स्त्री लेखन सदैव बचता रहा है। ‘खेस’ कहानी में ऐसे ऐसे वाक्य आये है जिनमे हमें ज़िंदगी की धड़कने बेहद साफ़ सुनाई देती है।

दर्पण जी ने अंत में हिमाचल की धरती को और NBT को धन्यवाद भी दिया जहॉ से ये कहानियाँ निकल कर आईं है और जिनकी वजह से हमें ये कहानियाँ पढ़ने और आप सभी के बीच आने का आज अवसर मिला।

मृदुला श्रीवास्तव की कहानियाँ अपनी बुनावट और कथ्य में भीड़ से बिलकुल अलग है ।यह बात सुभाष नीरव ने इस कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए कही।उन्होंने इस संग्रह की कहानियों को बेहद पठनीय और सामाजिक सरोकारों के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। उन्होंने कहा “ब्रेन “खेस”, मेला-1“काश पंडोरी” और “रैम्पवॉक” जैसी कहानियाँ हमारी पुंरानी कहानियो की तरह पाठको के साथ एक लंबा सफर अवश्य तय करेंगी।उन्होंने सआदत हसन मंटो की टोबा टेक सिंह जैसी कालजयी कहानी की तरह यह कहानी कालजयी साबित होगी इसमें कोई संदेह नहीं।

हिंदी साहित्य में कथाओं के मर्मज्ञ और प्रसिद्ध व्यंग्यकार और समीक्षक श्री रमेश तिवारी जी ने इस संग्रह की गहनता से पड़ताल करते हुए कहा कि हैरी पॉटर और तुलसीदास की तरह मृदुला श्रीवास्तव की इन कहानियो को आपको पढ़ना ही होगा क्योकि इस संग्रह की सभी कहानियां विशेषकर शीर्षक कहानी हमें हमारे सरोकारों से कही गहरे तक परिचित करवाती हैं।उन्होंने आगे कहा रचना की पीड़ा प्रसूति की पीड़ा की तरह होती है।रचना करते समय लेखिका की जो पीड़ा है वही पढ़ते समय पाठक की पीड़ा बन जाती है। अगर आज के सरोकारो को उसकी सच्चाई में जानना है तो मृदुला श्रीवास्तव को आज के विकट दौर में पढ़ना ही होगा।उन्होंने कई संवाद और वाक्य उद्धृत कर अपनी बात को सिद्ध भी किया

कथाकार एवं समहुत पत्रिका के संपादक डॉ अमरेन्द्र मिश्र जी ने कहा कि यह संग्रह मृदुला श्रीवास्तव की लेखन यात्रा का एक पड़ाव है।’खेस’ ,’बात अभी वाकी है’ तथा ‘काश पंडोरी न होती’ कहानियोँ को उन्होंने लेखिका के लेखन का प्रतिमान बताया पर यह आशा भी व्यक्त की कि लेखिका अपने लेखन कर्म में और संभावनाएं खोजेंगी।
लेखिका मृदुला श्रीवास्तव ने अपने इस संग्रह की कहानियो पर बोलते हुए कहा कि यह संग्रह सामाजिक सरोकारों और उनके यथार्थ परक जीवंत अनुभवों की प्रस्तुति करने का एक लघु प्रयास है।
पाकिस्तान और भारत के बीच सरहदी कानूनों पर पुनः विचार का आह्वान वह भी वह “काश पंडोरी न होती” कहानी के माध्यम से करना चाहती है जिसमें पाकिस्तान और भारत के बीच बहने वाली पंडोरी दरिया से भारत में बहकर आने वाली मुस्लिम सलमा बेगम के जीवन की त्रासद स्थितियों और सरहदों में बंटी ज़िंदगी,तीसरी मिट्टी या्नी उसकी बेटी पंडोरी को क्या नाम दिया जाए जैसी समस्या को उठाया गया है।
संग्रह मृदुला श्रीवास्तव का पहला कहानी संग्रह है जिसमें ब्रेन,मुलम्मा,कही एक और ग्रंथि,रक्त के रंग,खेस,बात अभी बाकी है,चवन्नी,रैम्पवॉक,फेरन,काश पंडोरी न होती इत्यादि दस कहानियां संगृहीत है।
कार्यक्रम का समापन श्री शिव कुमार शर्मा के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ । मंच संचालन का दायित्व चेतना इंडिया के महा सचिव श्री रणविजय राव ने सफलता पूर्वक निभाया।

प्रस्तुति
रणविजय राव
महासचिव चेतना इण्डिया