हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

किशोर उत्तराखंड के मरते सतरंगी सपने - डॉ.कविता भट्ट

 

वर्ष 2017 के प्रारंभ में ही भारतवर्ष के अनेक राज्यों में विधानसभा का चुनावी बसंत फिर से जवान हुआ था। इस चुनाव का हर राज्य के लिए अलग महत्त्व था; किन्तु इस चुनाव ही नहीं ; अपितु हर एक चुनाव का महत्त्व उस राज्य के लिए सर्वाधिक होता है; जिसे पहाड़ी राज्य के दृष्टिकोण से ही विशेष एवं फ़ोटो0028_001_001भिन्न विकास की परिकल्पना को ध्यान में रखकर ही बनाया गया हो। उत्तराखंड राज्य- निर्माण के मूल में यही सतत विकास की विचारधारा थी। उत्तराखंड का आधुनिक परिदृश्य इस परिकल्पना को ध्वस्त कर चुका है। इस लेख के द्वारा तटस्थ भाव से इसी परिदृश्य को प्रस्तुत करूँगी। इस सम्बन्ध में अपनी बात स्पष्ट करने से पूर्व मुझे राज्य-निर्माण हेतु किये गए आन्दोलन के तत्कालीन दृश्य (जो मेरी दृष्टि में अभी भी घूमते हैं) का एक शब्दचित्र खींचने का प्रयास करती हूँ। आइए उस दृश्य को देखते हैं; उसके बाद मुख्य विषय पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे।

बात उन दिनों की है; जब मैं बारहवीं कक्षा की छात्रा थी; मैं किशोरावस्था में थी एवं उत्तराखंड राज्य आन्दोलन अपनी युवावस्था में था। मैं और मुझ जैसे अनेक तथाकथित पिछड़े हुए पहाड़ी समाज के आबाल- वृद्ध इस आन्दोलन को अपने संघर्ष द्वारा चरम पर पहुँचा रहे थे। जोश और जूनून से भरे भाषणों, जुलूस और रैलियों का दौर था; जिसमें मैं और मुझ जैसे अनेक किशोरों की भारी भीड़ उमड़ती थी। यों तो मैं विज्ञान वर्ग की छात्रा थी; और बारहवी में उत्तर प्रदेश बोर्ड की विद्यार्थी थी; किन्तु उस समय उत्तराखंड आन्दोलन का एक-एक नारा किसी भी विज्ञान सूत्र को रटने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया था। ऐसा अकारण नहीं था; इस उत्साह में किशोर मन के वो सपने छिपे थे ,जो अनंत पल्लवित लताओं एवं पुष्पों के शृंगार से युक्त वनों में कुलाँचे भरते हिरणों की कुलाँचों- सा तरंगित और उत्साह युक्त था। हमें विकास की अवधारणा लिए हुए राज्य का निर्माण अपने भविष्य के निर्माण से अधिक आवश्यक लग रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हमारे स्वर्णिम भविष्य की कुंजी एक मात्र अलग पहाड़ी राज्य का निर्माण है। साथ ही अलग राज्य-निर्माण जैसे उच्च लक्ष्य के सम्मुख अपने विषय की पढ़ाई तक सिमटे रहना अत्यंत स्वार्थयुक्त व बौना लक्ष्य प्रतीत हो रहा था। बड़े-बड़े सप्तरंगी स्वप्न-संसार में जीना किशोरावस्था का स्वभाव होता है। उस समय हमें यह पूर्वाभास नहीं था कि हम ही नहीं बल्कि; प्रत्येक उम्र का पहाड़ी व्यक्ति उत्तराखंड के नाम पर ऐसी मृग-मरीचिका के पीछे भाग रहा है; जिसमें पानी की मात्र प्रतीति ही होती है; वस्तुत: पानी होता ही नहीं है; व्यक्ति पानी की आशा में कोसों भागता ही रहता है; किन्तु पानी की एक बूँद भी नहीं मिलती।

बहरहाल, अत्यंत संघर्षपूर्ण राज्य आन्दोलन के पश्चात् उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया; परन्तु उस राज्य की स्थिति; स्वप्न संसार से भिन्न थी। देखते ही देखते शिशु उत्तराखंड 16 वर्ष का हो चला; किशोरावस्था में प्रवेश कर चुका यह राज्य। दु:खद तो यह है कि हमने कम से कम किशोरावस्था में सपने तो बुने थे; किशोर उत्तराखंड की आँखों में तो तथाकथित राजनीति ने लाल मिर्च का ऐसा पाउडर भर दिया है; कि यह किशोर होते हुए भी सपने बुनने का दु:स्साहस भी नहीं कर सकता। तथाकथित विकास के संगमरमरी फर्श पर घिसटकर चलता हुआ उत्तराखंड अपने पैरों पर खड़े तक होने की स्थिति में नहीं है; तो फिर सपने देखे भी तो कैसे? ऐसा नहीं की यह मात्र दूषित राजनीति से उपजा हुआ संकट है; संकट उस विकृत मानसिक स्थिति से उपजा है; जिसमें हम सिर्फ अधिकारों की बात करते हैं और कर्त्तव्यों को तिलांजलि दे देते हैं।

मुझे पन्त जी की पंक्तियाँ याद आती हैं ‘भारतमाता ग्रामवासिनी/ खेतों में फैला है श्यामल,धूल भरा मैला-सा आँचल,’ अर्थात् भारतवर्ष की आत्मा गाँवों में बसती है। उत्तराखंड के सन्दर्भ में भी यह यथोचित है; यहाँ का यथार्थ जीवन गाँवों में बसता है और वस्तुतः उत्तराखंड के रूप में एक अलग पहाड़ी राज्य की परिकल्पना उन्ही गाँवो के सुनियोजित एवं सतत विकास हेतु की गयी थी; किन्तु बहुत ही दु:खद है कि अभी भी कुछ प्रश्न अपना मुंह बाये खड़े हैं और उत्तराखंड के राजनीतिज्ञों के पास उनका कोई भी उत्तर नहीं है; बस प्रत्येक पाँच साल बाद ये वोटों के लिए ऐसे प्रकट होते हैं ,जैसे यह इनका जन्मसिद्ध अधिकार हो; कर्त्तव्य तो जनता का है- सिर्फ वोट देना।  इन प्रश्नों की सूची यों तो बहुत लम्बी है; किन्तु कुछ प्रश्न तो अत्यंत ही ज्वलंत हैं; और आंकड़ों के अनुसार नहीं, अपितु वास्तविक धरातल पर खड़े हो कर आइये जरा इन प्रश्नों पर दृष्टिपात करते हैं-

बच्चों से प्रारंभ करते हैं; क्योंकि बच्चे राष्ट्र का भविष्य होते हैं; इसलिए प्रासंगिक है एक प्रश्न कि ग्रामीण परिवेश के बच्चे कितनी और किस प्रकार की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं? कितने गरीब बच्चे हैं, जो सार्थक, कौशल-केन्द्रित तथा रोजगारपरक शिक्षा ग्रहण कर पा रहे हैं और उनमे से भी बालिकाएँ कितने प्रतिशत हैं ? कितने प्रतिशत बच्चे मात्र हाई स्कूल अथवा इण्टर करके अपने प्रदेश से मात्र इसलिए पलायन कर रहे हैं कि इनकी रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का कोई खाका अभी तक की कोई भी सरकार नहीं बना सकी है। कितने पहाड़ी बच्चे बड़े शहरों में जूठे बर्तन धोने नहीं जाते; सिर्फ अपना पेट भरने के लिए? कितने प्रतिशत दुर्घटनाग्रस्त या रोगग्रस्त लोगों को पहाड़ में यथोचित स्वास्थ्य सुविधाएँ प्राप्त हो पा रही हैं? कितनी पहाड़ी महिलाओं को प्रसूति हेतु यथोचित समय पर गायनोकॉलोजिस्ट (प्रसूति एवं महिला रोग विशेषज्ञ)  मिल पाती है  या प्रसूति के लिए यथोचित समय पर चिकित्सालय तक पहुँच पाती हैं और वहां उन्हें यथोचित सुविधाएँ मिल पाती हैं या नहीं ? और एक ज्वलंत प्रश्न- यथोचित शैक्षिक योग्यताओं के बावजूद भी यहाँ के युवा बेरोजगार क्यों हैं? किसान खेती से कितना उत्पादन कर रहा है, यदि उत्पादन हो रहा है तो कितने सुदूरवर्ती गांवों में विपणन हेतु आवागमन के साधन हैं? और भी बहुत सारे प्रश्न जैसे यातायात, बिजली तथा पेयजल आदि कितने गाँवों में सुचारू रूप से हैं?

चलिए अब वस्तुस्थिति पर दृष्टिपात करते हैं- आधी आबादी अर्थात महिलाओं की बात से प्रारंभ करुँगी; क्योंकि ये पहाड़ी महिला ही इस समाज की आर्थिकी की रीढ़ है। स्वास्थ्य और शिक्षा तो एक दूसरा पक्ष हैं; महिलाओं के जीवन का सबसे नकारात्मक पक्ष यह है की ग्रामीण महिलाओं का पूरा जीवन ही बोझ ढोने में ही स्वाहा हो जाता है। एक ओर तो वे पहाड़ की आर्थिकी में रीढ़ की  हड्डी कहलाती हैं, और दूसरी ओर उनके श्रम का कोई मोल ही नहीं है; क्योंकि ग्रामीण महिलाएं 18-18 घंटे खेती, पशुपालन तथा घर-परिवार के अन्य कार्य जैसे- समस्त घरेलू कार्य, बच्चों की शिक्षा, बैंक, पोस्ट ऑफिस आदि से सम्बन्धित समस्त कार्य करती हैं। साथ ही ये सभी कार्य सरल इसलिए नहीं हैं; क्योंकि दूर-दराज से पहाड़ी ऊँचे-नीचे रास्तों पर मीलों चलकर लकड़ी, घास, चारा, पानी तथा अन्य घरेलू सामान आदि ढोना; मानो इनकी नियति बन गई हो। इतने परिश्रम के बाद भी महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वावलंबी नहीं हो सकी हैं। राजनीति में उनकी स्थिति ऐसी कि महिला की मोहर पुरुष के झोले में; वाली कहावत प्रधानपतियों के द्वारा चरितार्थ की जा रही है; बहुत कम ही महिलाएँ अपने पद का अपने हिसाब से उपयोग कर रही हैं। 21वीं सदी में भी हम कहाँ खड़े हैं; यह विचारणीय है। अब कुछ और दृश्यों को प्रस्तुत करते हैं-

कुछ गाँवों में प्राथमिक विद्यालय बचाने के नाम पर स्कूल में कुछ बच्चों के नकली नाम लिखवा कर ही गाँव वाले सिर्फ इसलिए खुश की चलो पुरखों का बड़ी मेहनत से खोला गया स्कूल इस बार बच गया। हॉस्पिटल में महिला स्वास्थ्य के नाम पर मात्र आयरन की गोलियों में ही महिलाएँ खुश; की चलो कुछ तो मिला। कस्बों एवं गाँवों में अधिकतर पुरुषवर्ग कुछ ताश के पत्तों में और शराब की बोतलों में ही खुश; की चलो यह ही तो जीवन का आनंद है। किसान पूरी मेहनत करके भी झोले उठाकर राशन की दुकान पर कतारों में खड़ा होने को विवश। आपदा- प्रबंधन के नाम पर मात्र हवाई दौरों का दौर। राजनेता आपदा-प्रबंधन, संस्कृति एवं मठ-मंदिरों के नाम पर पौराणिक विरासतों की होली जलाकर; उस आग पर हर शाम अलग-अलग फ्लेवर के साथ कभी तंदूरी, तो कभी  शाही अंदाज़ में चिकेन सेंककर खाने में व्यस्त। राजनेता, अधिकारी एवं माफिया आदि विविध कंपनियों की मथनी से पहाड़ी संसाधनों की छाछ बनाकर मक्खन-घी मिल-बाँटकर खाने में व्यस्त। पहाड़ी समाज मथनी तथा मथने वाले हाथ बनकर तथाकथिक ऊर्जा प्रदेश के लेबल से ही गौरवान्वित। हिमालय एवं गंगा बचाने में तथाकथित शुभचिंतक आत्ममुग्धता एवं प्रचार में ही संतुष्ट। कर्मचारी एवं अधिकारी इतने निश्चिन्त की उनके पहाड़ी कार्यस्थल उनकी एक झलक पाने को ही तरसते  रह  जाएँ।

सार एवं सौ प्रश्नों का एक प्रश्न यह है कि क्या कोई भी सरकार अभी तक अक्षय विकास का ऐसा खाका बना सकी; जिसमे पृथक् राज्य की परिकल्पना का मूलभूत आधार निहित हो।

मात्र कोई एक वर्ग चिंता का विषय नही; चिंता का विषय वह विकृत मानसिकता एवं असंवेदनशीलता है, जो कूट-कूटकर प्रत्येक वर्ग में भर गई है। जिसका कोई समाधान फ़िलहाल तो दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है। मानसिकता यह कि राजनेता तो कहते हैं कि हमारी जनता की पाँचो उँगलियाँ घी में और सर कढाई में होने चाहिए। कढ़ाई की व्यवस्था भी हुई और  तेल की भी; किन्तु जनता के लिए नहीं; तथाकथिक कर्णधारों के लिए ही। उत्तराखंड तो एक लेबल मात्र का कार्य कर गया; जिसका उपभोग चंद लोगों की मुठ्ठी में ही रहा। रंग-रूप बदलकर चुनाव के मौसम में बसंत के सपने दिखाने ये लोग हर पांच वर्ष में निकल आते हैं, और फिर से किशोर वय की दहलीज़ पर खड़े उत्तराखंड को सपने दिखाना प्रारंभ कर देते हैं। मुट्ठी भर इन लोगो को उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गांवों में बसने वाले पुरुष-महिला-बच्चों-बालिकाओं-बुजुर्गों के झुर्रियों से भरे चेहरों और पानी भरी आँखों की पीड़ा से क्या वास्ता?

जो सपने मैंने और मुझ जैसे लाखों किशोरों ने रैली, जुलूस एवं नारों का हिस्सा बनाते हुए देखे थे उन सपनो से इन तथाकथित लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली के ठेकेदारों को क्या लेना-देना; क्योंकि मतदाता भी तो यही सोचता है कि भागते भूत की लंगोटी ही हाथ आ जाए  बहुत है। एक बोतल में जब वोट बिकने लगे या फिर जीत जाने पर फ्री में किसी भी चीज को जनता के बीच आबंटन जैसे वायदों पर जब वोट तोले जाने लगें ,तो भारतवर्ष जैसे विशाल गणतंत्र के लिए तो आत्मघाती है ही; इसके साथ ही उत्तराखंड एवं इसी की तर्ज पर विकास के नाम पर बने छोटे एवं विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्यों के लिए तो  यह नासूर के समान है।  सकारात्मकता एवं संवेदनशीलता तो ऐसी चिंगारी के समान खो गई, जो अनैतिकता से संघर्ष करते-करते अपना ही अस्तित्व खो चुकी हो।  मेरी चिंता बस यह है कि मेरे उन सपनो को तो मैंने मरते देख ही लिया; जो मैंने पृथक् उत्तराखंड राज्य के जन्म के समय देखे थे; अब किशोर उत्तराखंड को दिखाए जाने वाले इन सपनो के अनुबंधकर्ताओं को शर्म कब आएगी? इस किशोर के उन सपनों का क्या होगा जो इसने खुली आँखों से देखे हैं; क्या ये भी मेरे सपनों के ही समान दम तोड़ देंगे?

  • राष्ट्रीय महासचिव ,उन्मेष  ,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड

ई मेल- mrs.kavitabhatt@gmail.com