हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

क्या करूँ.. - मंजूषा मन

जब कभी लिखना चाहा

मनआसमान का नीला रंग

फूलों का खिलना

खिलकर महकना…

लिखना चाहा

नदियों की कल-कल

समंदर की शांत विशालता

झरनों की झरझर…

चाहा लिखूँ

प्रेम के गीत

होंठो का मुस्काना

आँखों की चमक…

पर हर बार

जब भी उठाई कलम

लिखी गई पेट की आग..

तमाम दिन की ऊब

चौबीस में सोलह घण्टों की थकन…

पलकों की कोर से किनारा करते आँसू…

क्या करूँ,

सपने नहीं लिखे जाते मुझसे…

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