हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

क्या-क्या न गँवाया है - सुनीता काम्बोज

आजादी के  बदले,क्या-क्या न गँवाया है

अपना अधिकार बड़ी,मुश्किल से पाया है

हालात आज के भी, हैं ज्यादा ठीक नहीं

बीते कल से लेते, क्या कोई सीख नहीं

पलती रिश्वतखोरी, कानून सिसकता है

नंगा ही नंगे के, अब तन को ढकता है

सब गिरवी रख डाला,जो मान कमाया है

आजादी —

मुरझाये सहमे हैं , बचपन के फूल यहाँ

अपराध हुआ ,कहते  , कुछ  नेता भूल यहाँ

कुर्सी खातिर करते, कितनी मारामारी

भगवान समझते हैं, खुद को ही अधिकारी

भूखों को रोटी का बस ख़्वाब दिखाया है

आजादी—

अब कौन बनाएगा, सपनों के भारत को

सब लगे गिराने में, मजबूर इमारत को

वीरों को प्रतिमाएँ, पल- पल धिक्कार रही

अब जीत रहे छलिया, कुर्बानी हार रही

सच कहा सुनीता ने, सबको न सुहाया है

आजादी–