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की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ख्यालों के खलिहान (मुक्तछंदी कविता) - प्रोफ़ेसर लालचन्द गुप्त ‘मंगल’

ख्यालों के खलिहान (मुक्तछंदी कविता):धीरा खंडेलवाल, मूल्य:250 रुपये, पृष्ठ:130, प्रकाशकः नोवा पब्लिकेशंज़, प्लाट नं-9-10, सेक्टर -59५९, फेज़ -2 फरीदाबाद-121004

स्वयंसिद्ध कवयित्री धीरा खंडेलवाल की सद्य-प्रकाशित कृति ‘ख्यालों के खलिहान’ में 59 कविताएँ संगृहीत हैं । ‘ख्यालों के खलिहान’ अर्थात् भावों-विचारों का ढेर, प्रवृत्तियों-स्मृतियों का अम्बार, ख्याल-ही-ख्याल, खयाल-दर-खयाल, विविधमुखी खयालों, भावों, विचारों और अनुभवों का समुच्चय । पूरी पुस्तक एक-ही साँस में पढ़ जाने के पश्चात् मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि धरती से लेकर आकाश तक और जन्म से लेकर मृत्यु तक, दृश्य-अदृश्य जगत् का शायद ही कोई सार्थक भाव-विचार बचा हो, जिस पर कवयित्री ने अपनी सुचिंतित राय व्यक्त न की हो । यथा – बाचपनिक खट्टी-मीठी स्मृतियों के झुरमुट में खो जाने की उमंग, रिश्तों का ताना-बाना, अनासक्ति की व्यावहारिकता, आँखों देखा सच, अनाथ बनाम सनाथ, दृढ़ आत्मविश्वास, स्वयंसिद्ध होने का संकल्प, जीवन की रहस्यमयता और मुक्तावस्था, झूठ से टकराहट, दिल और दिमाग़ का ऊहापोह, मन की चंचलता, ख्वाहिशें खंगालने का दर्द, खुशी रहित जीवन, ज़िन्दगी बनाम ज़िन्दादिली, भाग्यवाद, आवागमन का चक्र, संसार की अपरिहार्य नश्वरता, मरजीवड़ा होने का अर्थ, स्वाभिमानी राष्ट्र, पानी रे पानी, उद्दीप्त प्रकृति और साहित्य-सृजन के लिए अनिवार्यतः अपेक्षित प्रतिभा, पीड़ा, सामर्थ्य और अभ्यास आदि-आदिऋ क्या नहीं है यहाँ ? सभी-कुछ तो है। हाँ ! दुनियादारी को समझने के लिए आपको सिर तो खुजलाना ही पड़ेगा ।

एक बात और ! आज, जब हमारे ‘आधुनिक’ कवि ‘प्रेम’ शब्द की वर्तनी-तक भूल चुके हैं, तब धीरा खंडेलवाल का अपने प्रेम-दर्शन के साथ मंचागमन एक उत्साहवर्द्धक, आह्लादकारी, जीवनानुरागी एवं स्वागतेय क़दम है । कवयित्राी का अटल विश्वास है –

प्यार देता है ताक़त/तन को मन को /प्यार जब अहसास दे/

हर ज़ख़्म सहलाने का/तो पास कहाँ आता है/वक़्त रोने-रुलाने का।

एक पल का स्पर्श/ज़िन्दगी का सुकून दे जाता है ।’

सच मानिए, जहाँ मान-मनुहार,  समर्पण-एकाकार और लाड़-प्यार नहीं है, वहाँ ‘‘जीवन है बस/अन्ध्कार।

एक बार अपने प्रेम-पात्र के हाथों प्यार का दुशाला ओढ़कर तो देखिए, पता चल जायेगा कि

वह प्यार का दुशाला/है सभी गरम रेशों से बढ़कर गरम।

 ध्यान रखना

 ‘इस वृक्ष पर बहार/बार-बार नहीं आती । 

‘‘कोंपलें तो बस/सिर्फ़ एक बार ही’’ निकलती हैं । जहाँ सच्चा प्यार होता है, वहाँ अधर और नेत्र बिन-बोले ही सब-कुछ कहने लगते हैं तथा मन मचल-उछल तैयार हो जाता है-

सुनहरा चैतन्य नशा/तेरे साथ पीने के लिए।

 झंकृत तारों की लहरों पे/चलती मेरी प्रीत सिन्दूरी ।

याद आने लगते हैं पूर्वराग वाले दिन, जब ‘बादाम-गिरी सी/तुम्हारी आँखें/मिलते ही/चमका देती थीं/मेरी नयन-ज्योति/बंदिशों के कुहासे में/अतल तल में बसा/वो प्यार/दिख जाता था मुझे/जिसे अंजुरी-भर शब्द/कह न पाते कभी ।’ आज ‘तेरा दिल जिसमें सिर्फ/मेरा ही प्रवेश/तुम ही कहो/कैसे हो सकता है/तुमसे जुदा मेरा भेष।’ सो ‘मेरे अस्तित्व की खिलन/तुम हो/तुम ही हो ।’

काव्यानुशासन की कसौटी पर भी ‘ख़्यालों के खलिहान’ एक सफल-सार्थक रचना सिद्ध होती है । बोधगम्य-कोमलकांत पदावली, लय-सुर युक्त मुक्तछन्द-योजना, खयालों के लक्ष्यार्थ-व्यंग्यार्थ को सुस्पष्ट करतीं शब्द-शक्तियाँ, उपमाओं की बहार, रूपकों की फुहार तथा आद्यंत भाव-विचाराभिव्यंजक रंगीन चित्रों से सुसज्जित एवं नयनाभिराम प्रस्तुति के कारण यह विचारावली, निस्संदेह, एक अनुपम कृति है ।

संक्षेप में, धीरा खंडेलवाल एक संवेदनशील-संस्कारशील कवयित्राी हैं । उनका जीवन-दर्शन वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक है । हर दृष्टि से पठनीय, मननीय एवं संग्रहणीय इस कृति का स्वागत है । वस्तुतः, आज ऐसी ही उद्देश्यपूर्ण कृतियों की महती आवश्यकता है ।

-0-समीक्षकः प्रोफ़ेसर लालचन्द गुप्त ‘मंगल’, 1218/13, शहरी सम्पदा, कुरुक्षेत्र-136 118