हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

गठरी - हिमांशु जोशी

गठरी

आखिर बहुत दिनों बाद आया यह सुअवसर !
वान्या की स्वीकृति के पश्चात् लगा कि सीने पर रखा एक भारी पहाड़ अब कुछ हल्का हो गया है।
पत्नी की अंतिम इच्छा थी वान्या के हाथ पीले होते हुए देखने की, पर वान्या किसी भी स्थिति में सिर हिलाने को तैयार न थी ।
सयानी लड़की ! कॉलेज में पढ़ाती है। उसे समझाने का सवाल ही कहाँ था ?
सब हार गए तो अंत में उन्होंने भी हथियार डाल दिए । जब तक माँ जीवित थीं, वही कभी–कभी किसी निमित्त जिक्र कर दिया करती थीं, पर उसके बाद वह सिलसिला भी एक तरह से समाप्त हो गया ।
अनिला की शादी पर शिमला से तान्या आई थी। वान्या से उम्र में तीन साल छोटी होने के बावजूद दुनियादारी में कहीं आगे थी।
उसी ने समझाया, ‘पगली जिंदगी में ऐसे मौके बार–बार नहीं आते। अभी बाबूजी हैं, पाँव टिकाने के लिए चौखट है। उनके बाद यह घर–घर नहीं रह जाएगा। भाभी का स्वभाव तुम जानती ही हो । किसी को पानी पिलाना तक उन्हें भारी लगता है। मुझे ही देखो, कितने अर्से बाद आई हूँ, केवल बाबूजी को देखने के लिए । शादी का तो केवल एक बहाना था । पता नहीं क्यों ? आई के जाने के बाद पाँव ही इधर नहीं मुड़ते …..।’ कुछ रुककर तान्या बोली, ‘रानीखेत वाली मामीजी ने पत्र लिखवाया था, अपनी ही बिरादरी का लड़का है। किसी अच्छी फर्म में है, दिल्ली में कहते हैं, शादी के एक महीने बाद ही सड़क दुर्घटना में पत्नी की मृत्यु हो गई थी । तब से दूसरा ब्याह न करने की सौगंध खा चुका है; परंतु अब पता नहीं कैसे राजी हुआ है। …. मना मत कर । यह पहाड़–सी जिंदगी अकेली कैसे ढोएगी ? फिर अंत समय में बाबूजी को थोड़ा–सा भी संतोष हम दे पाए ,तो क्या वह कम बड़ी बात होगी ।’
माथा झुकाए वान्या सुनती रही । पहले की तरह उबली नहीं ।
‘मैं बाबूजी से हाँ कह देती हूँ । लड़के का फोटो ,जो मामाजी ने भेजा है, तू देख ले । लड़के से भी मिल ले। जन्म–कुंडली की क्या जरूरत ! हाँ, यह पसंद न हो ,तो कहीं और भी बातचीत की जा सकती है।’
बाबूजी को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था । वान्या यह क्या कह रही है।
इस बीच जल्दी–जल्दी में सारी औपचारिकताएँ पूरी हो गईं। लड़की ने लड़के को देख लिया। लड़के वाले आकर लड़की देख गए। मँगनी की रस्म अदा हो गई। फरवरी या मार्च में शादी होगी, यह भी तय हो गया ।
इतना सब होने के बावजूद बाबूजी का मन, तार्किक मन, भटकता रहा ।
उस दिन बुआ के यहाँ मेरठ जाना, पोते के अन्नप्राशन के अवसर पर ।
बाबूजी ने वर–पक्ष वालों को फोन पर यों ही सूचित कर दिया था कि मेरठ से लौटते समय गाजियाबाद में आपके घर होते हुए आएँगे । जाड़ों के दिन हैं । सात–सवा सात तक पहुँचेंगे । लौटने की जल्दी होगी, अत: केवल दस–पंद्रह मिनट ही रुक पाएँगे ।
ट्रक वालों की हड़ताल के कारण उस दिन यातायात में बाधा पड़ रही थी, फिर भी वह यथासमय पहुँचे ।
सब प्रतीक्षा में थे ।
नया–नया दोमंजिला मकान बनवाया था ।
मेन गेट पर सफेद पत्थर लगा था। लिखा था, ‘गंगोत्री’।
‘यह गंगोत्री तीर्थ धाम वाली नहीं, हमारी अम्मी गंगोत्री देवी के नाम से रखा है। अम्मा की आज्ञा के बिना यहाँ पत्ता तक नहीं हिलता…।’
होने वाले समधी के उदात्त विचार उन्हें बहुत प्रभावित करते हैं। ड्राइंगरूम में माँ का एक बड़ा–सा रंगीन चित्रा टँगा था। उसके ठीक सामने दिवंगत पिताश्री का, जिस पर मुरझाए फूलों की एक पुरानी–सी माला लटक रही थी ।
‘पिताजी तो बचपन में ही गुजर गए थ। हमारा लालन–पालन माँ और मामाजी की छत्रछाया में ही हुआ। आज यहाँ तक पहुँचे, सब उनका ही आशीर्वाद है…. ।
यह मातृ–पितृ भक्ति उनके अंत:करण को कहीं छू रही थी। संस्कार सम्पन्न घर का वातावरण, कहीं गहरे संतोष का भाव जगा रहा था ।
जब तक वह बैठे रहे । ‘परिवार–पुराण’ की महिमा का बखान होता रहा ।
‘साधारण–सी नौकरी के बावजूद हमने यह घर कैसे बनाया, हमीं जानते हैं। कहीं से धेले का उधार नहीं लिया। बच्चों को पढ़ाया–लिखाया । हाँ, घर बड़ा बन गया है, पाँच कमरे हैं, ड्राइंगरूम के अलावा…..।’ वह सुनते रहे ।
‘आज अम्मा यहाँ होती, तो आप सबसे मिलकर बहुत प्रसन्न होती। हमारे चिन्मय को वह बेहद प्यार करती है।
‘जमीन के अलावा दस–बारह और ऊपर से लग गए’, उन्होंने उठते हुए कहा ।
‘ऊपर कितने कमरे हैं ?’
अभी तो दो ही हैं। दो बाद में सुविधा से बनवा लेंगे ।
चलते–चलते उन्होंने जिज्ञासा से कहा, ‘शर्मा जी, लगता तो है कि मकान आपने बड़े मन से बनवाया है, जरा दिखलाएँ तो ! हमें भी अपनी करुणा के लिए ऐसा ही मकान बनवाना है। नोएडा में कब से जमीन पड़ी है खाली । कहीं कोई कब्जा न कर ले…।’
वह आगे–आगे चलते हुए कमरे–कमरे में झाँक रहे थे ।
अंत में सीढि़याँ चढ़कर ऊपर पहुँचे। जैसे ही पहला कमरा खोला, स्विच ऑॅन हुआ, मुट्ठी भर पीला उजास अँधियारे कमरे में धूल की तरह बिखर गया ।
टूटी मेज, पुरानी कुर्सियाँ तथा घर के अन्य फालतू सामान के साथ एक मैली गठरी–सी भी दिखी–ठंड से ठिठुरती, पुराने फटे कंबल में लिपटी।
स्पष्ट कुछ दिख नहीं रहा था। केवल दो बूढ़ी धुँधली आँखे अँधेरे को चीरकर कातर भाव से सामने देखती हुई ।
वह काष्ठवत् खड़े के खड़े रह गए ।
कुछ क्षण पश्चात् मुड़े और दरवाजे से बाहर निकल गए ।
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