हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ग़ज़ल - डा.इन्द्रजीत ‘निर्दोष’

तेरे गेसू हुए जिस दम परीशाँ मेरे शानों पर

तड़प कर रह गई आहें रक़ीबों की ज़ुबानों पर

Dr. I. Nirdosh 2017हया का रंग आता है तेरे आरिज़ पे कुछ ऐसे

कि जैसे शाम को बिखरे है सुर्ख़ी आसमानों पर

मुझी से पूछते हैं- “कौन है? उसका पता क्या है?”

अजब दीवानगी छाई है मेरे राज़दानों पर

बुलाकर बज़्म में देखा नहीं हम को नज़र भर भी

इनायत देखिएगा मेज़बां की मेहमानों पर

वो जो रूठे तो ऐ ‘निर्दोष’ रूठी हैं बहारें भी

कि वीराने बिखरते जा रहे हैं बोस्तानों पर।

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Dr. I. Nirdosh, FCIC

Professor Emeritus of Chemical Engineering
Lakehead University 955 Oliver Road
Thunder Bay, ON Canada P7B 5E1