हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

गोबर गाथा - डॉ.सुरेन्द्र वर्मा

तीज-त्योहारों पर मेरी पत्नी कभी कभी बड़ी परेशान हो जाती है। अपने पूजा-घर की सुरेन्द्र वर्मालीप-पोत कर सफाई करना चाहती है। तब गोबर की माँग होती है। लेकिन गोबर मिले कहाँ से ? महानगरों से गाएँ लापता हो गईं हैं। पहले आराम था। मोहल्ले-मोहल्ले में गाएँ मारी-मारी फिरती थीं। गोबराकांक्षी महिलाएँ उनपर निगाह रखती थीं। जैसे ही गाय गोबर करती थी, वे झट से तसला लेकर नीचे रख देतीं थीं। ताज़ा ताज़ा गोबर उसमें भर कर ले आतीं थीं। लीपो, कितना लीपोगे ! अब वो बात नहीं रही। ज़रा से गोबर के लिए कामवाली से निहुरे करने पड़ते हैं। कहीं से थोड़ा गोबर ले आओ, पूजाघर लीपना है। वह भी कभी ला देती है, कभी नहीं लाती। बड़ी मुश्किल हो गई है। क्या किया जाए?
ऐसे में अमेरिका से एक खबर आई है। उत्साहवर्धक समाचार है। वहाँ पिछली बार एक्समस के मौके पर जब लोगों में खरीदारी का जुनून होता है, कार्ड्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी नामक एक कम्पनी ने अपने साइट पर बुलशिट यानी, गोबर, तक बेच डाला। देखते देखते गोबर के तीस हज़ार पैक बिक गए। कम्पनी ने यह स्पष्ट घोषित कर दिया था कि वह गोबर बेचने जा रही है। फिर भी तीस हज़ार लोगों ने धड़ाधड़ ऑर्डर दे डाले। केवल तीस मिनट में प्रोडक्ट आउट ऑफ़ सेल हो गया। मुख्यत: गेम्स की इस कम्पनी ने अपनी साइट पर से सारे गेम्स हटा लिये। केवल गोबर-मंजूषाओं को ही सेल पर रखा। मकसद यह था कि लोग फिजूलखर्ची न करें और केवल एक ही चीज़ खरीदें !! खरीदारी के मारे खरीद-खोरों ने गोबर-बक्से बिना सोचे-समझे खरीद डाले। कुछ लोगों ने यह सोचकर खरीद डाले कि इनमें शायद कुछ ‘सरप्राइजिंग’ चीज़ मिलने वाली है; लेकिन जब उनके घर सॉलिड-पैकिंग में गोबर पहुँचा तो वे आश्चर्य में पड़ गए। अब उसे वापस भी नहीं किया जा सकता था।आखिर बेचने वाले ने कोई धोखा-धड़ी तो की नहीं थी। उसने तो पहले ही बता दिया था की वह गोबर ही बेच रहा है। खरीदारों की सारी खरीदारी गुड़-गोबर हो गई।
मुझे अपने भारत के व्यापारियों पर बड़ा अफ़सोस होता है। यहाँ गोबर की इतनी माँग है ; लेकिन आज तक किसी व्यापारी के दिमाग में यह बात क्यों नहीं आई कि गोबर की सलीके से पैकिंग करके उसे वह बेचने वाली अपनी साइट पर रख दे। भारत में तो त्योहार ही त्योहार होते हैं। कोई एक ही ‘बड़ा-दिन’ थोरे ही होता है, और हर त्योहार पर घर लीपने के लिए गोबर चाहिए होता है। अगर कोई व्यापारी ऐसे ‘काऊ-शिट-पैक्स’ को सेल के लिए रख दे तो मुझे लगता है कि उनकी बिक्री भी धड़ाधड़ होनी चाहिए। हमारे यहाँ की जनता का एक बड़ा वर्ग पूरी तरह से “मॉडर्नाइज़’ हो गया है। कोई पूछेगा कि यह क्या खरीद लिया – गोबर? तो उसका जवाब होगा, नो, नो। इट्स काऊ-शिट-पैक ! और वह इतरा के चलता बनेगा अपनी बीवी को लीपने के लिए गोबर देने !
आजकल भारत में ‘मेक-इन-इंडिया’ का खब्त सवार है। हम विदेशियों को आमंत्रित कर रहे हैं कि वे अपने उत्पाद भारत में बनाएँ , और भारत में जो बने-बनाए उत्पाद पहले से ही मौजूद हैं, उनकी तरफ हमारा ध्यान ही नहीं है। जैसे,गोबर। बस, उसे आकर्षक ढंग से पैक भर करना है ! हम वह भी नहीं कर पा रहे हैं।
मैं कल्पना करता हूँ कि कभी बाज़ार जाते वक्त मुझसे कहा जाएगा, सुनते हैं, कल हवन करना है। चौक बनाने के लिए थोड़ा लीपना पडेगा। बुल प्रोडक्ट्स का एक छोटा २०० ग्राम का काऊ-शिट पैकेट लेते आइएगा –प्लीज़।
मुझे पता नहीं यह ‘गोबर’ शब्द कैसे बना। मेरा शब्द वैज्ञानिक परेशान है। गो का अर्थ तो खैर गाय से है ही, लेकिन ‘बर’ ? वैसे ‘बर’ का अर्थ श्रेष्ठ या उत्तम से होता है। गाय तो, इसमें शक नहीं, श्रेष्ठ पशु है ही लेकिन गोबर का अर्थ गाय तो नहीं होता! कभी लगता है, मूलत शब्द, ‘गो-मल’ (गाय का मल) रहा होगा लेकिन मुख-सुख के लिए गोमल ‘गोबर’ हो गया होगा। या यह भी हो सकता है ; क्योंकि सभी पशुओं के मल में गो-मल ‘श्रेष्ठ’ माना गया अत: उसे गोबर कर दिया गया ! कुछ इसका सही और तत्सम रूप ‘गोमय’ मानते हैं ,जो भी हो, गोबर को उत्तम तो हम मानते ही हैं। सच तो यह है कि हमारे आयुर्वेद में गाय के सभी उत्पाद – दूध, मूत्र और गोबर – श्रेष्ठ ही माने गए हैं। लेकिन गोमांस ? ना, ना। इसका तो नाम लेना भी पाप है। बीफ के शौकीन हमारे एक मित्र कहते हैं, लेकिन क्यों ? इसे भी श्रेष्ठ माना जाना चाहिए। पर समाज तर्क से नहीं चलता। अगर तर्क से चले तो सब गुड़-गोबर हो जाएगा। मित्र भी हार मानने वाले नहीं थे। बोले, गुड बेशक गोबर हो सकता है; लेकिन गोबर कभी गुड़ नहीं बन सकता।
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