हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

घर-घर हों वीरांगना - डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

कभी सुखद –सी चंद्रिका ,कभी सुनहरी धूप ,

dr. jyotsna sharmaकुदरत ने तुझको रचा , देकर रूप अनूप ।।1

 खुशबू के मिस फूल ने ,भेज दिया सन्देश 

हाल हमारा देखने , आओ तो इस देश ।।2

 आज अँधेरों को चलो , दिखला दें यह रूप 

एक हाथ में चाँदनी  ,एक हाथ में धूप ।।3

 तितलीचिड़ियामोरनी,तुलसी नहींन दूब 

एक जहाँ इनसे अलग,रचा आपने खूब ।4

 लिखना है तुझको यहाँ ,खुद ही अपना भाग 

सरस-सृजन की जोत तू , कलुष-दहन की आग ।।5

 न्याय और अन्याय कोरच ऐसा संसार 

इत बरसे रस की सुधा ,उत बरसे अंगार ।।6

 फूल कली से कह गए ,रखना इतना मान 

बिन देखे होती रहे ,खुशबू से पहचान ।।7

 बिटिया आँगन की कली,उपवन का शृंगार 

महकी कस्तूरी हुईमहकाए संसार ।।8

 शीश चुनरिया सीख की ,मन में मधुरिम गीत 

बाबुल तेरी लाडली ,कभी न भूले रीत ।।9

 बिटिया को समझाइए ,सही-गलत पहचान 

मानव के भी वेश में ,मिलते हैं शैतान ।।10

 छू लेना आकाश मन,रख मिट्टी का मान 

तुम्हें धरा पर स्वर्ग काकरना है संधान ।।11

 कहीं धूप अंगार –सी , कहीं मिलेगी छाँव 

काँटे भी हैं पंथ में , सखी सँभल रख पाँव ।।12

 छुपकर तितली ने पढ़े ,सभी सुमन के पत्र। 

सोचसमझ उड़ना सखी , वन,उपवन ,सर्वत्र।।13

 देख-देखकर हो गए , डर,शंका निर्मूल 

रंग-बिरंगी तितलियाँ ,उड़ें फूल से फूल ।।14

 मिली राह में ज़िंदगी ,बड़े दिनों के बाद 

कुछ मुट्ठी में बंद सी , कुछ लगती आज़ाद ।।15

 दिवस अठारह तक चला ,द्वापर में संग्राम 

कलियुग में क्यों कर भला,लेता नहीं विराम ।।16

 बैठीं नैना मूँद कर ,गांधारी किस चाह 

सच्ची जीवन संगिनी ,सही सुझाए राह ।।17

 पोर-पोर पीड़ा बसी ,अभी रहे चुपचाप।

माफ़ कभी खुद को भलाकर पाएँगें आप ।।18

 

 कैसे हम उनको कहें ,स्वयं धर्म का रूप 

रखें प्रिया को दाँव क्या ,मर्यादा अनुरूप ।।19

 कान्हा तब तुमने रखी ,द्रुपद सुता की लाज 

घर-घर हों वीरांगना , दुर्गालक्ष्मी आज ।।20

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