हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

चार कविताएँ - कमलेश यादव

1-अब मैं मन का करतीं हूँ

कमलेश यदवधूल -पड़ी किताबों में, सपनों को खोजतीं हूँ ,
कभी भुले बिसरे गीतों में, यादों को जीती हूँ ।

प्रेमचन्द की कहानियों में, अपने गाँव को ढूँढती हूँ ,
कभी महादेवी की कविताओं में, अल्हड़पन को जीतीं हूँ ।

जीवन के उलझनों को, अब ऐसे ही सुलझातीं हूँ ,
थोड़े से हैं बचें, शब्द, तो ख़ुद को ही पुकारतीं हूँ ।

सब कहते हैं, मैं कुछ नहीं करतीं हूँ ,
हाँ, क्योंकि अब मैं मन का करतीं हूँ ।।
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2-कुछ बचा है हमारे बीच

सब कुछ ख़त्म नहीं हो गया है,
कुछ न कुछ बचा है हमारे बीच।

बची है थोड़ी सी पराजय,
जिसे मोरपंख की तरह रखेंगे हम किताब में छिपाकर।

बचा है थोड़ा सा संघर्ष,
जिसे हर मौसम में हम ओढ़ें रहेंगे चादर की तरह।

बची है ज़रा सी प्रार्थना,
जो हमारे न होने पर भी होगी तारों की तरह।

नहीं, सब कुछ ख़त्म नहीं हो गया है,
अभी, कुछ न कुछ बचा है हमारे बीच।।
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3-एक बार फिर

चलो फिर एक बार बीतें कल को जीते हैं।

उसी नदी के किनारे ठंडी हवा में साथ चलते है,

बिना कोई सवाल किए, लोगों का आना-जाना देखते है।

गीली हवा नदी की, साँसों से गुज़र जाने देते है,

और नदी के किनारे की रेत पर फिर नाम लिखते-मिटाते है।

दूरियों की दीवारों को गिरा देते हैं

और अपने अहम अभिमान को भुला देते है।

करते है अनदेखा ख़ामियों को,

और एक दूसरे को माफ़ कर देते है।

फिर सर्द ठिठुरती रातों में अलाव जलाते है,

और उनींदी सुबह, फिर अधूरे सपनों को समेटते है।

फिर फिसलते हुए वक़्त को मुट्ठी में भर लेते है,

और अनकही हमारी सब बातों को, कह जाते हैं।

आज आँखों को बह जाने देते हैं,

फिर इसी पानी में डूब जाते हैं।।

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4-बेटे के नाम

माँ होने का अहसास

जीवन को जन्म देने की ख़ुशी

जब पहली बार तुम्हें बाँहों में लिया

मैं अपने को भूल गई तभी

उस पल मैं निडर

और मज़बूत हो गई

एक पल में दुनिया छोटी

और मैं बड़ी हो गई

तुम्हारी बड़ी बड़ी आँखें

तुम्हारा कोमल तन

तुम्हारी नर्म हथेली

सब कुछ मानो एक चित्र

तुम्हारा वह मासूम चेहरा

वह पल जैसे रुका हुआ- सा

बार-बार देखती हूँ

जैसे कोई ख़ूबसूरत ख़्वाब- सा

वह पल, जिसमें पूरा जीवन

जिया जा सकता था,

पर समय की धारा में

उसे तो बीत ही जाना था

तुम पल-पल बढ़ रहे हो,

पल में रोना और पल में ख़ुशी

हर पल कुछ नया सीख रहे हो

और सीख रही हूँ तुम्हारे साथ मैं भी,

मुझसे बड़े होने की तुम्हारी चाहत

हर दिन मुझसे ख़ुद को नापते तुम

कई बार तुम्हारा मायूस होना

और अब मेरे कंधे को छूते तुम

तुम्हारा यह मनमोहक रूप

“मैं कर सकता हूँ” कहना

मुग्‍ध होती  हूँ मैं तुम्हें देखकर

अब तुम ही हो मेरा सपना

तुम्‍हें तो पार कर ही लेना है मेरी लम्बाई को

मैं मन में उतार लेती हूं तुम्‍हारी नज़र

मेरे बेटे, एक दिन तुम्‍हारें मज़बूत काँधे पर

मैं टिका सकती हूँ बेफ़िक्र अपना सर

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जन्म-स्थान:- लोरमी, छत्तीसगढ़(भारत)

शिक्षा- नेशनल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नॉलजी रायपुर, छत्तीसगढ़ से कम्प्यूटर टेक्नॉलजी में स्नातकोत्तर, सम्राट अशोक टेक्नॉलजी कॉलेज विदिशा (म प्र) से कम्प्यूटर साइंस में स्नातक।

वर्तमान-पता:– न्यूयॉर्क, यूएसए

कार्यक्षेत्र-9वर्ष तक कालेज अध्यापन अब स्वतंत्र लेखन। ब्लाग लेखन।

गीत, गजल, दोहे, हाइकु, सवैया, छंदमुक्त, कहानी और व्यंग्य विधाओं में सक्रिय।

कृतियाँ-कविता संग्रह-अब मैं मन का करतीं  हूँ ,चलो फिर एक बार, कुछ बचा है हमारे बीच दिन

सम्प्रति– स्वतंत्र लेखन।

ईमेल-nehakamlesh@gmail.com

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