हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

चार नवगीत - हरिशंकर सक्सेना

1.सदी की भूल

 हो गया अभिशप्त फिर

तालाब का पानी

मछलियों को सूर्य का

आंतक डसता है ।

रोज ज़ख़्मी हो रहे हैं

अब कमल के फूल

पीढ़ियाँ ढोती रहेंगी

हर सदी की भूल;

हादसा ही दर्द का

इतिहास लिखता है ।

नागफनियाँ पंखुरी पर

लिख रहीं कानून

इस व्यवस्था ने पिया है

आदमी का खून;

सभ्यता का शर्म से

सिर आज झुकता है ।

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2.मत अंगार बिछाओ

 जल जाएगा

मानचित्र यह

मत अंगार बिछाओ ।

मौसम की बीमार हवा भी

आक्रामक लगती है,

आदर्शो की पगडण्डी पर

नागफनी उगती है;

मर जाएगी फसल यहाँ

मत खरपतवार उगाओ ।

जोंकें पीकर रक्त हमारा

आदमक़द हो आईं,

शिरा–शिरा में कालदंश की

लहरें फिर मुस्काईं;

राह ढूँढ़ती पीढ़ी को

मत नारों में उलझाओ ।

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3.बापू की चौपाल

 महानगर की चकाचौंध में

इतने हुए निहाल

भूल गये दादी की गोदी

बापू की चौपाल ।

कहाँ गये जलते अगिहाने

माह–पूस की रात

कहाँ गयी ‘होरी’ के मुँह की

सीधी–सच्ची बात

भूल गये नदिया के गोते

मछुआरों के जाल ।

कहाँ गये वे होलों वाले

मूँगफली के खेत

ज्वार–बाजरे की बालें औ’

नदी- किनारे रेत

भूल गए बैलों की जोड़ी

खुर्पी और कुदाल ।

कहाँ गया गन्ने का कोल्हू

पालेजों का रंग

कहाँ गया मट्ठा–नैनी सब

दूध–दही का संग

मिट्टी से सोना उपजाएँ

भूले यही सवाल ।

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4.दिन हुए धृतराष्ट्र

 फिर अँधेरा हाथ में

संगीन लेकर आ गया

दिन हुए धृतराष्ट्र

रातें गांधारी हो गईं

आस्थाएँ ‘रूपकँवरों’–सी

चिता पर सो गईं

बेरहम बादल

फसल पर बिजलियाँ बरसा गया ।

ढो रही है पीठ पर

अंगार बेबस चाँदनी,

फिर सदी की देह

सिर से पाँव तक खूँ में सनी;

खोखला संकल्प

आँसू–गैस बनकर छा गया ।

बुन रहे हैं लोग सन्नाटे

सुबह के नाम पर,

सुर्खियों में आ रहे बौने

किसी कुहराम पर;

हादसों से

दर्द ‘झेलम’ का बहुत गहरा गया ।

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