हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

जल (चौपाई छन्द) - ज्योत्स्ना प्रदीप

JYOTSNAA PRADEEPकितना प्यारा निर्मल जल है 

वर्तमान है ,इससे कल है ॥

घन का देखो मन  उदार  है 

खुद मिट जाता जल अपार  है ॥

 

ज्यों गुरु माता ज्ञान छात्र को

नदियाँ भरती  सिन्धुपात्र को ।।

सागर कितना रलसरल था

निज सीमा में  इसका जल था।।

 

 मानव   की जो थी   सौगातें  

 अब ना करती मीठी बातें  

सागर झरनें , नदी ,ताल   ये  

कभी सुनामी कभी काल ये ॥ 

 

दुख  से भरती भोली अचला

कैसा जल ने चोला बदला ।।

धर्मकर्म   हम भुला रहे है

सुख अपनें खुद सुला रहे है।।

 

मिलकर सब ये काम करें हम

आओ इसका मान करे हम।।

जल को फिर से  सुधा बनाओ

जल है जीवन , सुधा  बचाओ

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