हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ज़रा रोशनी मैं लाऊँ  - डॉ.भावना कुँअर

छाया घना अँधेरा

ज़रा रोशनी मैं लाऊँ

डॉ.भावना कुँअर

ये सोचकर कलम को

मैंने उठा लिया है…

घूमें गली-गली में

नर-वहशी और दरिंदे

तड़पें शिकार होकर

घायल पड़े परिंदे

उनके कटे परों पर

मरहम लगा दिया है…

ये सोचकर कलम को

मैने उठा लिया है…

सज़दे में झुकते सर भी

रहते कहाँ सलामत

पूजा के स्थलों में

आ जाए कब क़यामत

नफ़रत  पे प्रेम का रंग

थोड़ा चढ़ा दिया है…

ये सोचकर कलम को

मैने उठा लिया है…

ढूँढें डगर कहाँ जब

क़ानून ही है अंधा

मर्ज़ी से इसको बदलें

नेताओं का है धंधा

आँखों में आस का अब

दीपक जला दिया है…

ये सोचकर कलम को

मैने उठा लिया है…

(ज़रा रोशनी मैं लाऊँ – शीघ्र  प्रकाश्य संग्रह  से )