हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

जाग रे मन !- विनीता चैल - विनीता चैल

उठ जाग रे मन!

अंखियाँ खोल

देख हुआ सवेरा

जागा जग सारा

सूरज की किरणों ने

धरती पर सोना बरसाया

आलस को त्यागो रे मन

देखो हुआ एक नया उजाला

सवेरे की इस सुहानी वेला में

मंद-मंद बहे ठंडी-ठंडी

मतवाली  पुरवाई

मन को लुभाने देखो

कितनी सुहानी रुत है आई

जग-मग है जग सारा

जागो रे मन जागो प्यारे

एक नवीन सन्देश लिये

नये दिन की आस लिये

एक नया सवेरा है आया

चिड़ियों की चह-चहाहट से

चहक रही ये हरी-भरी धरती

फूलों के सौरभ से देखो

सुगन्धित महक रही धरती

सोने वाले ऐ मेरे मन

जागो अब तुम जागो

मन का आलस दूर भगाकर

जागो रे मन अब तो जागो

एक नवीन उजाले संग

नदियों की कल-कल बहती

जलधार के  मधुर संगीत के संग

पुलकित होता ‌तन-मन

हर्षित होता अंग-अंग

मंदिर में जाकर पूजन कर

ईश्वर की भक्ति से मन प्रफुल्लित कर

जागो रे मन एक नवीन उजाले संग

देखो एक नया सवेरा है आया।

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विनीता चैल, बुंडू, रांची, झारखंड।

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मोबाइल नं-8789418525 ।