हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

‘जिज्ञासा’ विज्ञान लोकव्यापीकरण कार्यक्रम - सम्पादक

वर्षो से चली आ रही एक मिथ्या अवधारणा यह  थी की विज्ञान को जानने हेतु आंग्लभाषा ही अधिक श्रेष्ठ है; किन्तु इस अवधारणा को तोड़ते हुए राजभाषा हिंदी में विज्ञान के लोकव्यापीकरण हेतु 002-kavita-bhatt-reportसराहनीय प्रयास  है, ‘जिज्ञासा’ विज्ञान लोकव्यापीकरण कार्यक्रम शृंखला । पिछले दस वर्षों से अनवरत आयोजित की जा रही इस एक सप्ताह की विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी लोकव्यापीकरण एवं संचार की कार्यशाला, इस वर्ष पर्यावरण पर आसन्न संकट  एवं अक्षय विकास पर आधारित थी । एक सप्ताह तक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वरिष्ठ वैज्ञानिकों एवं पर्यावरणविदों को एक मंच पर प्रस्तुत करते हुए वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बने पर्यावरणीय संकट एवं अक्षय विकास पर, यह कार्यक्रम गंभीर चिंतन एवं पर्यावरणीय समस्याओं को जन-जन तक उन्ही की भाषा में पहुँचाने का माध्यम बना । इस राष्ट्रीय कार्यशाला(3 से 9 नवम्बर 2016) को राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञान लोकव्यापीकरण तथा स्वदेशी विज्ञान प्रसार के क्षेत्र में सतत क्रियाशील उन्मेष : ज्ञान विज्ञान विचार संगठन ने राष्ट्रीय विज्ञान एवं  प्रौद्योगिकी संचार परिषद्, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी ,भारत सरकार, नई दिल्ली के सहयोग से शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय,जबलपुर,मध्य प्रदेश में आयोजित की गयी। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य था विद्यालयीय एवं महाविद्यालयीय स्तर के छात्रों को जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी वैज्ञानिक तथ्यों  एवं अक्षय विकास की आवश्यकताओं तथा नव वैज्ञानिक आविष्कारों को नैतिक मूल्यों के दृष्टिकोण से हिंदी भाषा में समझाने का प्रयास करना था । एक सप्ताह तक चले इस कार्यक्रम में सी एस आई आर,नई दिल्ली, इंडियन आयल कार्पोरेशन, फरीदाबाद, एटॉमिक एनर्जी एजुकेशन सोसाइटी,मुंबई, इसरो, बंगलुरु, आई आई टी, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, हे न ब गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर, उत्तराखंड, कृषि एवं तकनीकि विश्वविद्यालय,उदयपुर, राजस्थान, आर जी डब्ल्यू एम्, भोपाल,मध्य प्रदेश,मेडिकल कालेज, जबलपुर,आदि सहित अनेक संस्थानों, विश्वविद्यालयों तथा राज्यों के वैज्ञानिकों,आचार्यों, पर्यावरणविदों एवं अध्येताओं ने व्याख्यान दिया, विचार-विमर्श किया और बच्चों एवं युवाओं से संवाद किया । इस कार्यक्रम में पर्यावरण, अक्षय विकास, वैज्ञानिक चेतना एवं विज्ञान शिक्षा द्वारा नैतिक मूल्यों के संवर्धन पर केन्द्रित हिंदी भाषा में संपन्न हुए व्याख्यानों सहित छात्र-छात्राओं ने अनेक विज्ञान लोकव्यापीकरण प्रतियोगिताओं जैसे विज्ञान संचार नाटिका के द्वारा, भाषण, शोधपत्र लेखन/संगोष्ठी प्रतियोगिता के रूप में, निबंध -लेखन, चित्रकला  प्रश्नमंच आदि का आयोजन हुआ । एक सप्ताह तक चलने वाला इस प्रभावी कार्यक्रम को  डॉ संजय अवस्थी पिछले दस वर्षों से निरंतर आयोजित कर रहे हैं; जिसमे भारत के सभी विशिष्ट विज्ञानी साथ ही विदेशों से भी विज्ञानी अपनी प्रभावी उपस्थिति दे चुके हैं । कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रारंभ किए गए स्वच्छ भारत अभियान को दृष्टिगत रखते हुए एक विशाल मार्च भी संचालित किया गया; जिसके माध्यम से नगर के विभिन्न मार्गो को स्वच्छ करते हुए लोगों को भारत की स्वच्छता का सन्देश दिया गया ।एक सप्ताह की इस कार्यशाला में डॉ.के जी व्यास, श्री जी के आचार्य, डॉ.मनोज पटेरिया,श्री जगत सिंह चौधरी ‘जंगली’, डॉ.कविता  भट्ट,डॉ.गोविन्द सिंह भरद्वाज, डॉ.गौतम बनर्जी, डॉ.पी एस आहूजा,डॉ.एस के मल्होत्रा तथा डॉ.बी आर गुरुप्रसाद ,श्री चन्द्रकान्त पडियार(डीसा, गुजरात) आदि  ने विभिन्न विषयों पर स्लाइड शो के माध्यम से अपने व्याख्यान प्रस्तुत किये। स्थानीय संयोजकों में इ राकेश अग्रवाल,डॉ.एस. एन शुक्ला,समाजसेवी एवं अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ.जितेन्द्र जामदार आदि ने अपनी क्रियाशीलता से कार्यशाला की व्यवस्थाओ में योगदान दिया।

002-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%beवरिष्ठ वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों तथा पर्यावरणविदों को किशोरों-युवाओं के मध्य हिंदी भाषा में पर्यावरण संतुलन सम्बन्धी समाधानों को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करने के साथ ही; इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता थी छात्र-छात्राओं के द्वारा विज्ञान एवं पर्यावरण चेतना सम्बन्धी तथ्यों को नाटिकाओं,प्रश्नोत्तरी, भाषण, निबंध तथा अन्यान्य प्रतियोगिताओं में प्रतिभागिता करने का अवसर प्रदान करना और वह भी हिंदी भाषा में। इन सभी प्रतियोगिताओं में छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर प्रतिभागिता की, तथा साथ ही उत्तम पुरस्कार भी प्राप्त किये। प्रत्येक दिन प्रथम सत्र में नौनिहालों की विभिन्न गतिविधियाँ संचालित होती थी तथा द्वितीय सत्र में विभिन्न विद्वानों के व्याख्यान करवाए जाते थे।

पर्यावरण एवं विज्ञान चेतना तथा नैतिक उत्थान हेतु हिंदी में करवाये जाने वाला यह कार्यक्रम आधुनिक चुनौती युक्त वातावरण में प्रसंगिक इसलिए है क्योंकि; एक और शैक्षिक विसंगतियों के कारण नौनिहाल हिंदी को भूल रहे हैं, तथा दूसरी ओर पर्यावरणीय प्रदूषण तथा प्रकृति को नष्ट करने वाली  गतिविधियों से जूझ रहे है।भविष्य इन्ही नौनिहालों पर टिका होने के कारण, इन्हें सचेत किया जाना अत्यंत आवश्यक है।वक्ताओं ने अपने प्रस्तुतीकरण में प्रदूषण नियंत्रण, वैज्ञानिक चेतना, पर्यावरणीय संतुलन,आपदाओं से बचाव, प्राकृतिक संतुलन,अक्षय विकास की विभिन्न तकनीकियों से छात्र-छात्राओं को परिचित करवाया साथ ही नैतिक उन्नयन हेतु उनका मार्गदर्शन किया। वक्ताओं ने अपने संबोधनों में इस बात पर भी जोर दिया की पुरातन भारतीय संस्कृति में सूर्य नमस्कार, तुलसी, वट एवं पीपल आदि वृक्षों को अर्घ्य प्रदान करने की परंपरा के बहुत ही पुष्ट वैज्ञानिक अर्थ थे।साथ ही भूमि को नमन करना शांति पाठ करना आदि ऐसी परम्पराएं थी जिनमे पर्यावरणीय संतुलन का वृहद् दर्शन था/ इसलिए पुनः भारतीय जीवन शैली को अपनाने की आवश्यकता है; जिससे आचार-व्यवहार एवं वातावरण सभी शुद्ध, स्वच्छ एवं संतुलित हो सकें।

-0-प्रस्तुति- डॉ.कविता भट्ट