हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

जुड़ाव की साहित्यिक संस्कृति - रामकुमार कृषक

रामकुमार कृषक

ग़ज़ल के बारे में बात करना ग़ज़ल में बात करने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है। लेकिन आज जब उसे या तो हिन्दी कविता की समकालीनता से अलगाकर देखा जा रहा है या फिर उर्दू की रवायती कसौटी पर कसा जा रहा है, तो कुछ कहना ज़रूरी है।
हिन्दी ग़ज़ल की पूर्ववर्ती परंपरा में यदि हम फ़ारसी और अरबी तक जाएँ,तो वह 5वीं सदी या उससे भी पहले तक जाती है। लेकिन हिन्दी –उर्दू ग़ज़ल का शुरुआती रिश्ता तेरहवीं सदी के दौरान अमीर खुसरो (1253–1325 ई.) से है। वे कला–संगीत–मर्मज्ञ थे और बहुभाषाविद् भी। लोकजीवन और उसकी बोलियों पर भी उनकी पकड़ थी।यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि उन दिनों हिन्दी को हिन्दी नहीं, बल्कि ‘हिंदवी’ और ‘रेख़्ता’ आदि कहा जाता था। ‘उर्दू ’ शब्द तो और बाद में जाकर अस्तित्व में आया,जिसे लश्करी और देहलवी ज़बान भी कहा गया। कह सकते हैं कि खुसरो ने हिंदवी या रेख़्ता कही जानेवाली भाषा–बोली में ग़ज़लें कहीं। यही ‘भाखा’ बाद में खड़ी बोली हिन्दी के रूप में विकसित हुई। खुसरो मूलत: फ़ारसी के शायर थे और ग़ज़ल फ़ारसी की प्रमुख विधा ; तो भी उन्होंने इस विधा में कुछ हटकर प्रयोग किए। मसलन,फ़ारसी और हिंदवी की एक–एक पद–पंक्ति को मिलाकर कहा गया यह शेर–
ज़े हाले–मिस्कीं, मकुन तग़ापफुल दुराए नैना बनाय बतियाँ
के ताबे–हिज़राँ, न दारमे–दिल न लेहु काहे लगाय छतियाँ

सोचा जाए तो खुसरो के यहाँ मौजूद ऐसे भाषिक प्रयोग भविष्य में कही या लिखी जानेवाली हिन्दी –उर्दू की गंगा–जमुनी भाषायी संस्कृति के परिचायक थे, जिसने रचनात्मकता के अनेक पड़ावों को पार किया। इस संदर्भ में दकन से लेकर दिल्ली तक मीरो–ग़ालिब के पूर्ववर्ती कम–से–कम पाँच शायरों का उल्लेख किया जा सकता है, जिनके यहाँ भाषा का यह रंग है। वे हैं जिनके यहाँ भाषा का यह रंग है। वे हैं कुली कुतुब शाह, वली दकनी, प्यारेलाल शौक़ी, पंडित चंद्रभान बिरहमन और सिराज औरंगाबादी। इन सभी का समय 1668 ई. से 1764 ई. तक का है। लेकिन अमीर खुसरो से शुरू हुई हिन्दी –उर्दू की कविता या उसके एक काव्यरूप ग़ज़ल के मय में कबीर हैं , तो आधुनिक काल के प्रारंभ में भारतेंदु हरिश्चंद्र, जिन्होंने ‘रसा’ नाम से ग़ज़लें लिखीं। इसी से जुड़ी राष्ट्रीय काव्याधारा और छायावादी कविता में ग़ज़लें लिखी गइ। वहाँ अगर मैथिलीशरण गुप्त की कुछ कोशिशें हैं ,तो जयशंकर प्रसाद और सूर्यकांत त्रिापाठी निराला की ग़ज़लें भी हैं। प्रगतिशील कविता में शमशेर बहादुर सिंह और त्रिलोचन जैसे कवि मौजूद हैं। कहना चाहिए कि हिन्दी ग़ज़ल की अपनी भी एक लम्बी परंपरा है। नई, मुक्तछंद या छंदमुक्त कविता की तरह वह कोई आकाशबेल–जैसी नहीं है। उसकी अपनी जड़ें हैं।
लेकिन 20वीं सदी का आठवाँ दशक हिन्दी ग़ज़ल के लिए युगांतरकारी रहा और इसकी अगुवाई की सन् 1975 में प्रकाशित दुष्यंत कुमार के ग़ज़ल–संग्रह ‘साये में धूप’ ने। दुष्यंत की ग़ज़लें सत्ता–व्यवस्था से उत्पीडि़त जन–सामान्य का संवेदनात्मक साक्ष्य तो है ही, व्यवस्थाजन्य दमन के विरुद्ध प्रतिरोधी चेतना जगानेवाला स्वर भी है। ग़ज़ल जैसा ‘लोकप्रिय’ काव्यरूप उनके यहाँ गहरे दायित्वबोध से उपजा है। वहाँ कथ्यगत ताज़गी और प्रयोगार्मिता तो है, लेकिन प्रयोग के लिए कथ्य से किसी तरह का खिलवाड़ नहीं है। आकस्मिक नहीं कि आज की हिन्दी ग़ज़ल दुष्यंत कुमार द्वारा तैयार की गई इसी ज़मीन को उत्तरोत्तर उर्वर बना रही है।
किन्तु कोई विकासमान विधा अपनी परंपरा से विकसित ही नहीं होती, उसे स्वयं भी विकसित करती है। उसका युगबोध उसे एक नई ज़मीन, नया मिज़ाज और नई भाषा देता है। वह अपनी सुदीर्घ काव्य–परंपरा में मौजूद जीवन–संस्कृति और उसके जातीय मिथकों, बिंबों, प्रतीकों, मुहावरों आदि का उपयोग करते हुए आगे बढ़ती है। ग़ज़ल का कोई शेर अगर हमारे दिल में उतर जाता है तो सिर्फ़ अपने रूप–रचाव के कारण ही नहीं, बल्कि अपने समूचे व्यक्तित्व के कारण, जिसे उसका कथ्य और रूप दोनों एक साथ रचते हैं।ख़ास होते हुए भी वह इतना आम होता है कि सहज ही जु़बान पर चढ़ जाए। यह विधा भावक के दिल और दिमाग़, दोनों से एक साथ संवाद करती है। उसका अच्छा लगना उसके बाह्य सौंदर्य पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि उसके आंतरिक सौंदर्य पर भी निर्भर है। मितकथन और सांकेतिकता उसकी पहली ज़रूरत है। नया कथ्य, नई भाषा,नया भाव–सौंदर्य और नई अर्थ–व्यंजना; एक अच्छी ग़ज़ल इन सभी का सुमेल चाहती है। कहा जा सकता है कि हिन्दी ग़ज़ल इन सभी बातों का निर्वाह करती हुई अग्रसर है।
फ़िराक साहब ने ग़ज़ल को ‘असंबद्ध कविता’ कहा है; लेकिन उसके रूपबंध या शिल्प–विधान के चलते वे उसकी सम्बद्धता की बात भी करते हैं। हिन्दी ग़ज़ल ने अपनी रूपगत सम्बद्धता में एक और चीज़ जोड़ी है,और वह है उसकी अंतर्वस्तु में निहित भावबोध । हिन्दी कविता की अपनी परंपरा सामाजिक बदलाव और मनुष्यविरोधी सत्ता–व्यवस्था के प्रतिरोध की रही है। रीतिवादी विशृंखलित भावाधरा और खंडित सौंदर्यबोध के बजाय अब वह अपनी उद्देश्यपरकता से पहचानी जाती है। उसमें भाषायी बदलाव भी है,विचाराधरात्मक भी। जिन दिनों वह ब्रज और अधी जैसी भाषाओं में सृजनात्मकता के शिखर पर थी, खड़ी बोली कविता का प्रादुर्भाव उन्हीं दिनों हुआ, और उसके लिए उसका संघर्ष हमारे साहित्यिक इतिहास का हिस्सा है।
जहाँ तक हिन्दी ग़ज़ल की भाषायी संस्कृति का सवाल है तो उसके तीन स्तरहैं। पहला.संस्कृत बहुल पदावली;दूसरा.हिन्दी –उर्दू मिश्रित ‘हिंदुस्तानी’ और तीसरा.उर्दू का फ़ारसी बहुल रंग। लेकिन हिन्दी ग़ज़ल को आज उसी भाषा में स्वीकृत माना जा रहा है,जिसे बोली–बानी या बोलचाल की भाषा कहा जाता है, यानी ‘हिंदुस्तानी’। इतिहास गवाह है कि भारतेंदु काल में ही पद्य के लिए अयोध्या प्रसाद खत्री जैसे विद्वानों ने हिन्दी के जिस रूप की हिमायत की, और अपने ही साहित्य–समाज की आलोचना सही,वह उसका ‘हिंदुस्तानी’ रूप ही था। उसे उन्होंने ‘मुंशी शैली’ कहा है। फ़ारसी बहुल हिन्दी उनके लिए ‘मौलवी शैली’ थी तो संस्कृत बहुल ‘पंडित शैली’। एक तरह से देखें ,तो यहाँ वे खड़ी बोली की उसी परंपरा को मान्यता दे रहे थे, जिसमें मीर, नजीर और दाग़ जैसे शायर आते हैं। दाग़ का तो यह शेर ही इस संदर्भ में प्रसिद्ध है–
उसको कहते हैं ज़बाने – उर्दू
जिसमें न हो पुट फ़ारसी का

आकस्मिक नहीं कि आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल ने अपनी इस भाषायी संस्कृति की उपेक्षा नहीं की है। उदाहरण के लिए दुष्यंत कुमार का यह भाषायी अंदाज़–
मैं जिसे ओढ़ता – बिछाता हूँ
वह ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

अथवा सूर्यभानु गुप्त का यह शेर–
जिनके अंदर चिराग़ जलते हैं
घर से बाहर वही निकलते हैं

या फिर भवानी प्रसाद मिश्र की यह प्रसिद्ध काव्योक्ति–
जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख
और उसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख
यह कि तेरी–भर न हो तो कह
और बहते बने सादे ढंग से तो बह।

यहाँ हिन्दी की अपनी काव्य–संस्कृति और उसके सामाजिक सरोकारों को भी लक्षित किया जा सकता है। दुष्यंत उसे ओढ़ने–बिछाने की हद तक जीवन–यथार्थ से जोड़कर देख रहे हैं; सूर्यभानु गुप्त मनुष्य की जिजीविषा से जोड़कर तो भवानी भाई उसे उसकी व्यापकता में देखने के आग्रही है–‘यह कि तेरी–भर न हो तो कह।’
असल में हिन्दी ग़ज़ल के प्रादुर्भाव और उसके विकास को हिन्दी की सुदीर्घ काव्य–परंपरा में ही रखकर देखा जाना चाहिए। प्रगतिशील मूल्यों की रोशनी में वह जनाकांक्षाओं की स्वाभाविक परिणति है। समय–सापेक्षता उसकी बुनियाद में है, और वह उसके बड़े हिस्से में मुखर है। मनुष्य के सुख–दुख वहाँ हैं अवश्य; लेकिन उनके स्वरों में लोक की सामूहिकता है। व्यक्तिवादिता और निरा रोमान आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल के विकास–इतिहास में प्राय: कहीं शामिल नहीं है।
देखा जाए तो कोई भी काव्य–प्रवृत्ति या काव्य–रूप समय के गर्भ से पैदा होता है या एक नया रूप धारण करता है। आज अगर अनेक हिन्दी कवि ग़ज़लें लिख रहे हैं ,तो उसके कारणों और सकारात्मक संभावनाओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता। पहला कारण है, हिन्दी –उर्दू की एक से दो बना दी गई भाषायी संस्कृतियों के एकमेक होने की ज़रूरत और दूसरा, समकालीन हिन्दी कविता में अति बौद्धिकता और गद्यात्मकता का प्राबल्य। दूसरे शब्दों में कहा जाए ,तो यह विधा कविता की आंतरिक चुनौतियों से ही पार पाने का रचनात्मक संघर्ष नहीं कर रही; बल्कि अपने समय की बहुविध विडंबनाओं से ग्रस्त मनुष्यता की पक्षारता में खड़ी है। यानी हिन्दी में ग़ज़ल जैसी काव्य–विधा का विकास एक नई साहित्यिक संस्कृति का विकास है,जिसे हम गंगा–जमुनी तहज़ीब के नाम से जानते हैं –और जिसे अलगाव की नहीं,लगाव और जोड़ने की साहित्यिक संस्कृति की तरह देखा जाना चाहिए।
दुर्भाग्यवश हिन्दी आलोचना में हिन्दी ग़ज़ल के वही मायने नहीं हैं, जो हिन्दी कविता के। वहाँ यह काव्य–रूप आज भी अपने समय से संवाद करती सृजनात्मकता और अपने विविध जीवनानुभवों के लिए नहीं जाना जाता। इसके कई कारण हैं। एक तो इस विधा को उर्दू ग़ज़ल की परंपरागत रूमानियत से जोड़कर देखने की आदत, जबकि उर्दू ग़ज़ल स्वयं अपनी उस रूमानियत से प्राय: दूर निकल आई है। दूसरे, यह सोच कि कल अगर रामविलास शर्मा और नामवर सिंह जैसे बड़े आलोचक ग़ज़ल को ‘सामंती फॉर्म’ और ‘उर्दू का उच्छिष्ट’ कह चुके हैं ,तो नया कुछ क्यों कहा जाए! रामधुन वैसे भी हमारी संस्कृति की सहज विशेषता है। हिन्दी के एक कवि (जिन्हें उनके कामरेडी आभिजात्य के लिए पहचाना जाता है) तो उनकी इन स्थापनाओं की पक्षधरता में घंटों बहस करने की चुनौती दे चुके हैं। (जबकि ज़रूरी यह है कि मौजूदा काव्यरूपों को बिना किसी पूर्वाग्रह के गंभीरता से पढ़ा जाए।) यहीं पर हिन्दी आलोचना की एक और प्रवृत्ति का भी जि़क्र किया जा सकता है। हमारे कुछ आलोचकों और कवियों का एक ख़ास समुदाय छंदोबद्ध कविता का कोई उदाहरण भी अगर देगा तो रघुवीर सहाय या केदारनाथ सिंह की एक–दो कविताओं से। केदार,नागाजु‍र्न, त्रिलोचन, शील, शलभ, गोरख पांडेय और रमेश रंजक जैसे कवि उन्हें याद नहीं आते, जबकि इन कवियों का अधिकांश छंदोबद्ध है, और महत्वपूर्ण भी।
इसके अलावा एक दिलचस्प परिदृश्य भी है। हम जानते हैं कि समाज की जो नियामक शक्तियाँ हैं, राजनीति उनमें प्रमुख है। हमारे प्रगतिशील–जनवादी आलोचक भी इससे इन्कार नहीं कर सकते। लेकिन आज जब अनेक सवर्ण जातियाँ पिछड़े वर्ग में और पिछड़ी जातियाँ दलित वर्ग में शुमार होना चाहती हैं, तब हमारी साहित्यिक बिरादरी गीत और ग़ज़ल जैसे ‘पिछड़े’ काव्यरूप की परछाई तक से दूर भाग रही है! उसे डर है कि गीत और ग़ज़ल जैसे पुरातन काव्यरूपों से जुड़कर कहीं उसे भी ‘पिछड़ा’ न मान लिया जाय! ऐसे में हमें यही तो मानना पड़ेगा कि समकालीन हिन्दी आलोचना आज भी बौद्धिक कुलीनतावाद और सवर्णवादी मानसिकता से ग्रस्त है। यह एक सवाल है, आरोप नहीं। इसे सफाई की नहीं, संस्कार की ज़रूरत है।
यह ठीक है कि पूर्वाग्रह और जड़ताएँ भी मनुष्य के स्वभाव और संस्कार का हिस्सा होती हैं। इससे न तो रचनाकार और न ही आलोचक पूरी तरह मुक्त हैं। कई लोगों को तो ग़ज़ल के साथ ‘हिन्दी ’ शब्द ही खटकता है। तर्क यह कि पाकिस्तान में कई उर्दू शायर दोहा लिख रहे हैं, किंतु उसे वे ‘उर्दू दोहा’ नहीं कहते। यह निरा कुतर्क है, क्योंकि वहाँ हिन्दी –उर्दू का मसला ही नहीं है। हमें समझना चाहिए कि उत्तर भारत में यह भाषायी विडंबना इतिहास की देन है, वर्तमान की नहीं। शमशेर के शब्दों में कहें तो ‘‘इन दोनों (हिन्दी –उर्दू) के भेदभाव के पीछे ‘राजनीति’ और जातीयता के स्वार्थों का और गुलामी के ज़माने की शिक्षण–नीति का इतिहास है। मैं इस इतिहास का कायल नहीं हूँ, ठीक जैसे सामान्य जीवन में खड़ी बोली का व्यवहार करनेवाली साधारण जनता इसकी कायल नहीं है।’’ इसी संदर्भ में उनका यह बोलता हुआ शेर भी है–
वो अपनों की बातें वो अपनों की खू–बू
हमारी ही हिन्दी हमारी ही उर्दू

असल में उर्दू ग़ज़ल का एक लम्बा इतिहास है, यहाँ तक कि वह उर्दू कविता का पर्याय जैसी है। हिन्दी में चूँकि यह विधा नई है, और हिन्दी –उर्दू का भाषायी क्षेत्र प्राय: एक है, इसलिए प्रथमत: तो हिन्दी शब्द ग़ज़ल की विधागत पहचान के लिए है– और दूसरे, हिन्दी कविता की अपनी सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा में बने रहने के लिए। स्वभावत: जब हम यह कहते हैं तो हिन्दी कविता के जो अपने वस्तुगत सरोकार हैं, वही हिन्दी ग़ज़ल के भी हैं। उर्दू उसकी भाषाई परंपरा में है, विचार और संस्कार में उस तरह नहीं है। इसके बावजूद कुछ लोग ‘हिन्दी ग़ज़ल’ का नाम सुनते ही मुस्कराने लगते हैं। इससे उन्हें भाषायी साम्प्रदायिकता की बू आती है। दिलचस्प यह कि कुछ विद्वानों को यह बू ‘ग़ज़ल’ शब्द से आती है ,तो कुछ को ‘हिन्दी ’ शब्द से। हमारा नज़रिया लेकिन इस संदर्भ में बिल्कुल साफ़ है। उर्दू और हिन्दी एक ही कोख से जन्मी हैं, बेशक वे दो हैं।उनका रंग–रूप, रहन–सहन,ओढ़ना–पहनना,बोल–चाल स्वभावत: ही कुछ अलग है। होना भी चाहिए। एकरूपता में कोई सौंदर्य नहीं होता। दूसरे, यह उनकी स्वायत्तता का भी सवाल है। दो वयस्क, घरबारी बहनों की तरह वे एक घर में नहीं, एक समाज में रहती हैं। लेकिन यहाँ यह कहना भी ज़रूरी है कि यदि वे अपने समाज को छोड़कर अपना–अपना देश बनाना चाहेंगी ,तो न तो हिन्दी , हिन्दी रहेगी और न उर्दू , उर्दू । रेख़्ता को तो हम कब के विदा कर चुके।इस संदर्भ में डॉ. शिवशंकर मिश्र की यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि ‘‘उर्दू से एकदम से टूटकर हिन्दी ग़ज़ल तो क्या बनेगी, उर्दू ग़ज़ल भी हिन्दी से बिल्कुल कटकर एक नामुमकिन ख़याल की ही तज़ु‍र्मानी होगी।’’ (हिन्दी ग़ज़ल की भूमिका, पृ. 55)
एक और मसला भी है, और वह है ग़ज़ल के कलापक्ष का। इसके दो पहलू हैं। पहला इसके अरूज़ या छंद–विधान से जुड़ा हुआ है, दूसरा तग़ज़्ज़ुल या ग़ज़लियत से। एक का आाधार भाषा–व्याकरण है, दूसरे का कल्पनाशील सृजनात्मकता। हम देखते हैं कि अनेक ग़ज़लें अरूज़ की रुक्नाधारित तमाम शर्तों का निर्वाह करते हुए भी ग़ज़लियत पैदा नहीं कर पातीं, जबकि बहुत–सी ग़ज़लें बहर से कमोबेश इधर–उधर होकर भी तग़ज्जुल पैदा कर जाती हैं और यह बात वर्णिक एवं मात्रिक, दोनों तरह के छंदानुशासन पर लागू होती है। कई शास्त्रज्ञों का आग्रह है कि हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू –अरूज़ की अरकान–पद्धति पर ही लिखा जाना चाहिए। यानी वे उसके रुक्नाधारित वर्ण–विन्यास पर ज़ोर देते हैं। हमारा मानना है कि हिन्दी की छंदोबद्ध कविता बहुत पहले से ही अपने संस्कृत वर्णवृत्त को छोड़कर मात्रिक छंदानुशासन में लिखी जा रही है, और उसमें कालजयी कविताएँ मौजूद हैं। उर्दू या फ़ारसी पिंगल बहर को महत्त्व देता है तो हिन्दी का छंदशास्त्र लय को। वज़न या लयखंडों का समान निर्वाह दोनों में अनिवार्य है। इसीलिए मात्रिक अनुशासन में लिखी गई ग़ज़लें भी तक़्ती पर सही उतर आती हैं। इस संदर्भ में डॉ. शिवशंकर मिश्र का यह कथन बहुत खूब है–‘‘हिन्दी में (काव्य) चरणों की व्यवस्था ठोस भूमि पर संचरण की तरह है,जबकि उर्दू में चरणों (अरकानों) की व्यवस्था जल में संतरण की तरह है। हिन्दी के मात्रिक छंद डग–डग चलते हैं, जबकि उर्दू के छंद लहर–लहर चलते हैं ; हिन्दी मात्रिक छंद अविषम और सरल होते हैं, जबकि उर्दू की बहरें विषम और वतु‍र्ल।’’ (हिन्दी ग़ज़ल की भूमिका, पृ. 98) असल में उर्दू और हिन्दी ग़ज़ल के छंदानुशासन को लेकर आत्यंतिक नुक़्ता–चीं होने की ज़रूरत नहीं है। ये दोनों भाषाएँ अगर भाषायी संस्कृति–सहकार का उदाहरण हैं, तो इसकी उपयोगिता अन्यत्र भी है। आवश्यकता भी। भाषा–व्याकरणिक सिद्धान्तों की जकड़बंदी के चलते अतीत में भी काफ़िया–रदीफ़ जैसे महत्त्वपूर्ण अनुषंगों में अवश्य कुछ छूटें ली गई हैं, जिन्हें ‘समरथ को नहिं दोष गुसाई’ वाले मुहावरे से भी समझा जा सकता है। यों यह ऐसा बुरा भी नहीं है, क्योंकि कोई भी सिद्धान्त अगर व्यावहारिकता में आड़े आ रहा होता है, तो वह दूसरों को तो जड़ बनाता ही है, स्वयं भी जड़ता को प्राप्त कर रूढि़ में बदल जाता है।
इसलिए इस सब पर सोचिए , तो यही लगता है कि कोई भी अच्छी ग़ज़ल रूप और वस्तु के संतुलन का परिणाम है। इनमें अगर बेहतर संतुलन होगा तो ग़ज़ल मुग्ध भी करेगी और वैचारिक या भावनात्मक उद्वेलन तक भी ले जाएगी। कोई भी कला–मायम अंतत: अपने समय और समाज से जुड़कर ही संवाद करता है। उसके बग़ैर उसकी कोई गति नहीं। कोई भी रचना अगर अपने समय का पता नहीं देगी,तो देर–सवेर वह भी लापता हो जाएगी। दूसरे, कविता का काम, चाहे वह किसी भी विधा में लिखी गई हो, हमारे संवेदन और विचार को अमूर्त करना नहीं है, बल्कि उन्हें अपने सहज संप्रेषण से देश–काल में घटित करना है।
कई बार हमारी भाषा और लबो–लहज़ा भी सार्थक भाव–बिंबों में बदल जाते हैं, बशर्ते उनमें कोई बोलती हुई बात हो। उदाहरण के लिए मिर्ज़ा ग़ालिब का ही यह बहु प्रशंसित शेर–
दिले–नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

यहाँ न बिम्ब है, न प्रतीक। बात है और उसे कहने का ढंग। लेकिन हमारे कई ग़ज़लकार ग़ज़ल को कुछ भी कह देने की कला मानते हैं। अर्थ की असंगति ही नहीं,निरर्थकता भी उन्हें अर्थवान् लगती है। निरर्थक बिम्बों और प्रतीकों के अम्बार को वे कलात्मकता कहते हैं। उदाहरण के लिए हमारे एक नामी ग़ज़लकार का यह शेर–
धूप ने इतना सताया कि उससे घबराकर
डूब के रेतों में पानी ने खुदकुशी कर ली

अब यहाँ निरर्थक चमत्कार पैदा करने की बेचैनी पानी की है या ग़ज़लकार की, इस पर आप सोचिए। हिन्दी में ऐसे शेरों से सजी ग़ज़लों की कमी नहीं है, और उनको सराहने वालों की भी। उन्हें सिर्फ़ फूलों से मतलब है, भले ही वे प्लास्टिक के हों। ऐसे ही शेरों के चलते डॉ. मैनेजर पांडेय ने कहा था कि हिन्दी की अधिकांश ग़ज़लें चेतना को जगाने के बजाय स्तब्ध अधिक करती हैं।
कवि को स्रष्टा कहा गया है, द्रष्टा भी। रचनाकार के रूप में उसकी स्वायत्तता भी होती है। लेकिन अनुभूति और अनुभव से अभिव्यक्ति तक की यात्रा के बाद उसकी अपनी कविता सबकी हो जाती है। यानी कवि की स्वायत्तता और स्वतंत्रता का एक सामाजिक और मानवीय पक्ष भी है। वह जो कहता है और जिस तरह कहता है, उसमें सिर्फ़ वही नहीं होता। तमाम लोग होते हैं–उत्पीडि़त, दलित, सर्वहारा। तभी तो वह बोलता है, तभी तो उसकी अपनी आवाज़ का कोई मतलब है। लेकिन ऐसी आवाज़ों को इधर कुछ लोग कविता का ‘पुरानापन’ कहने लगे हैं। पुरानापन, माने प्रगतिशीलता, जनवाद और क्रांतिकारी चेतना वगैरह! ‘कविता’ में तो ये सब फिर भी चल सकता है, लेकिन ग़ज़ल जैसी नाज़ुक विधा इस सबको कैसे वहन कर सकती है! अव्वल तो आज के सामाजिक–राजनीतिक यथार्थ से उसका लेना–देना ही नहीं होना चाहिए–वह पहले ही बहुत हो चुका और अगर हो भी तो ज़रा सलीके से। यह नहीं कि हमारी सुरुचि और सौंदर्यबोध के चिथड़े उड़ा दे! लेकिन एक सच्चा रचनाकार जलते हुए रोम में नीरो की तरह वंशी कैसे बजा सकता है। वैसे भी वह कोई सम्राट नहीं होता। ख़ास भी होता है तो आम जन से जुड़े रहकर ही होता है। इसलिए वह सदा उन लोगों के साथ होगा, जिनके घर जलते हैं, क्योंकि एक घर उसका भी उन्हीं में होता है। और न भी हो ,तो भी वह उन्हें अपने संवेदना–विस्तार में शामिल कर लेता है। दुष्यंत ने कहा ही है–‘मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ?’ इसलिए कवि की साधना और आत्मतोष अगर उसी तक सीमित है ,तो कविता की निरर्थकता भी वही है। अपने ही शेर के सहारे कहूँ तो–
कितने ही लोग–बाग अँधेरे कुँओं में हैं
बेमायने हैं शेर अगर आसमान हों

मार्क्स का एक कथन यहाँ और अधिक मौजू है। कहते हैं–‘‘प्रत्येक कला का मूल मनुष्य है, और यदि नासमझी में या चालाकी वश कोई भी कला मनुष्येतर व्यवहार करती है, तो वह कला नहीं, बल्कि एक संहारक हथियार की तरह काम करती है।’’
ग़ज़ल निश्चय ही एक कलात्मक विधा है। लेकिन हमें यथासंभव उसके जनोन्मुख मूल्य और प्रतिरोधी चेतना की रक्षा करते हुए उसे पतनशील और संहारक होने से बचाना है।
[‘अलाव’ पत्रिका के समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के आलोचना केंद्रित विशेषांक के संपादकीय का संक्षिप्त रूप।]
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