हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

जफ़ा जब भी करे कोई - इन्दरजीत 'निर्दोष'

 जफ़ा जब भी करे कोई ,जहाँ तक हो, वफ़ा कीजे

यकीनन है जरा मुश्किल ,मगर फिर भी किया कीजे |

तहईय्या’ था कि राज़े -दिल न ज़ाहिर होने देंगे हम

मगर ये बेवफ़ा  आँखें बने ‘मुखबिर’ तो क्या कीजे |

गो  बाजी हारना या जीतना है बात क़िस्मत की

उतरने की किसी मैदान में हिम्मत किया कीजे |

हुई बेकार हर कोशिश, हुआ हासिल न गर मक़सद

अगर सब कर चुके तो अब जरा कुछ नया कीजे |

कभी जब गर्दिशे -अय्याम’ से बचना हो नामुमकिन

किसी के प्यार के साए में बस कुछ पल रहा कीजे |

किसी ‘निर्दोष’से जब गुफ्तगू करिये तो यूँ करिये

कहे जो वो सुना कीजे , कहे जो  दिल कहा  कीजे |

इन्दरजीत ‘निर्दोष’