हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ग़ज़लें - डॉ•कुँअर बेचैन


कुँअर बेचैन
कुँअर बेचैन
1-नींद आई तो कहीं पर भी बसेरा कर लिया

नींद आई तो कहीं पर भी बसेरा कर लिया
बिजली के तारों पे भी चिड़ियों ने डेरा कर लिया

आईना लेकर मैं उनके पास बस पहुँचा ही था
कुछ बड़े लोगों ने चेहरों पर अँधेरा कर लिया

आप ही बतलाइए दुनिया में क्या है आपका
आपने आपस में क्यूँ फिर तेरा-मेरा कर लिया

काम करने थे मुझे वो रात थी तो क्या हुआ
मैंने अपनी आँख खोली और सवेरा कर लिया

छोटी-छोटी मछलियों को मारने के वास्ते
हर बड़ी मछली ने खुद को ही मछेरा कर लिया

ये पता करने को काम आया हूँ क्या औरों के मैं
रोज़ सोते वक़्त मन में एक फेरा कर लिया

डाल ना पाया गले में हार तो उसने ‘कुँअर’
लेके बाँहों में मुझे बाँहों का घेरा कर लिया

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2-चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया

जागा रहा तो मैंने कई काम कर लिए
ऐ नींद, तेरे आज न आने का शुक्रिया

सूखा पुराना ज़ख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया

आतीं न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारो, मेरी राह में आने का शुक्रिया

ग़म मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
ये बात है तो सारे जमाने का शुक्रिया
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3-इस दिल में हमने ऐसा इक घर बना के रक्खा

पहले तो अपने दिल को इक घर बना के रक्खा
फिर बाद में तुम्हारे हर ग़म को ला के रक्खा

मालिक बना के रक्खा तब तक तो उलझनें थीं
खुश हूँ कि जब से दिल को नौकर बना के रक्खा

वो राह रोकते थे रस्ता दिया उन्होंने
जब पत्थरों को हमने ठोकर पे ला के रक्खा

तुम हो कि सारे घर को सर पर उठा रहे हो
हम ने तो पूरे घर को सर पर बिठा के रक्खा

जिसमें कि सारी दुनिया आकर खुशी से रह ले
हाँ, मैंने अपने दिल में उस घर को ला के रक्खा

अब उम्र हो गई है अपनी भी, हमने लेकिन
अपने बड़ों के आगे ये सर झुका के रक्खा

जिस दिल में भी अँधेरा हमको दिया दिखाई
उम्मीद का दिया इक उसमें जला के रक्खा

ये तो हमारा दिल है हम चाहे जिसको देते
लेकिन तुम्हारी ख़ातिर हमने बचा के रक्खा

इतना तो अब यकीं है वो दूर तक चलेगा
जो गीत हमने तेरे होठों पे गा के रक्खा

कमरे में दिल के वो जो नीचे पड़ी हुई थी
इंसानियत को हमने ऊपर उठा के रक्खा

आँखों में जो तुम्हारी तस्वीर है उसे अब
दिल में मुहब्बतों की चादर बिछा के रक्खा

अब हमसे कह रहे हो ‘बेचैन’ हो रहा हूँ
क्या तुमने नाम अपना हमको बता के रक्खा
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