हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

डा.ऋतु त्यागी की कविताएँ - डा.ऋतु त्यागी

1-बचपन

वह अपनी कल्पनाओं में बजाता है शंख
रितु त्यगीढूँढता है सीपियाँ ,उड़ाता है हवाएँ
हँसता है खिलखिलाहट सपनों में
पैरों से धकियाता है चिंताओं के ढेले
फेंकता है संशय की दृष्टि
सुपरमैन और शक्तिमान -सा बचपन

हम धो देते हैं रगड़कर
कर देते हैं साफ-सुथरा
बचपन को सुखाकर धूप में
बना देते हैं चमकीली मानव मशीन
जो छेड़ती है बेसुरे राग
जो धकिया देती है
एक दिन हमीं को
अतीत के अँधेरों में।

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 2-मेरी माँ

मेरी बूढ़ी जर्जर होती माँ
घड़ी अटकाकर कलाई पर
समय की चिन्दियों को गाँठ में बाँधकर
आज भी जीती है सिर्फ आज
नकली दाँतों को फेंककर कूड़े में
जबड़े की गाँठों से ही
चबा लेती है
रोटी का हर कौर
और स्वाद को निचोड़ लेती है कटोरी भर

छुटपन की भागती-दौड़ती स्मृतियों से
झाँकती मेरी माँ हर दिन अपने छोटे-छोटे
नाखूनों पर रच लेती है आज भी
अपने अनगढ़ सपनों की सजीली आकृति
झटपट लपेटती है धोती
घर की ड्योढ़ी पर खड़ी मेरी माँ
पढ़ नहीं सकती पर
जीती है अपनी शर्तों पर स्त्री विमर्श।
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परिचय

डा.ऋतु त्यागी

जन्म-1 फरवरी

 प्रकाशन-छिटपुट रचनाएँ पत्रिकाओं में प्रकाशित

शिक्षा-बी.एस.सी, एम.ए(हिन्दी,इतिहास),नेट(हिन्दी,इतिहास),पी.एच.डी

,बी.एड

सम्प्रति-पी.जी.टी हिंदी केंद्रीय विद्यालय सिख लाईंस मेरठ में कार्यरत ।

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