हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

डॉ.जेन्नी शबनम की कविताएँ - डॉ.जेन्नी शबनम

1-विकल्प 

मेरे पास कोई विकल्प नहीं

पर मैं हर किसी का विकल्प हूँ,

कामवाली छुट्टी पर तो मैं

रसोइया छुट्टी पर तो मैं  JENNI SHABNAM

सफाईवाली छुट्टी पर तो मैं

धोबी छुट्टी पर तो मैं

पशु को खिलानेवाला छुट्टी पर तो मैं

चौकीदार छुट्टी पर तो मैं,

इन सारे विकल्पों को निभाते हुए

मैं विकल्पहीन हूँ,

काश! मेरा भी कोई विकल्प हो

एक दिन ही सही

मैं छुट्टी पर जाऊँ!

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2-सुख-दुःख जुटाया है 

तिनका-तिनका जोड़कर

सुख-दुःख जुटाया है

सुख कभी-कभी झाँककर

अपने होने का एहसास कराता है

दुःख सोचता है –

कभी तो मैं भूलूँ उसे

ज़रा देर आराम करे

मेरे मायके की

टिन वाली पेटी में

तिनका-तिनका जोड़कर

सुख-दु:ख जुटाया है।

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3-साथ-साथ

तुम्हारा साथ

जैसे बंजर ज़मीन में

फूल खिलना

जैसे रेगिस्तान में

जल का स्रोत फूटना!

अकसर सोचती हूँ

तुममें कितनी ज़िन्दगियाँ बसती है

बार-बार मुझे वापस खींच लाते हो

ज़िन्दगी में

मेरे घर ,मेरे बच्चे

सब से विमुख होती जा रही थी

ख़ुद का जीना भूल रही थी!

उम्र के इस ढलान पर

जब सब साथ छोड़ जाते हैं

न तुमने हाथ छुड़ाया

न तुम ज़िन्दगी से गए

तुमने ही दूरी पार की

जब लगा कि

इस दूरी से मैं खंडहर बन जाऊँगी!

तुमने मेरे जज़्बात को

ज़मीन दी

और उड़ने का हौसला दिया

देखो मैं उड़ रही हूँ

जी रही हूँ!

तुम पास रहो

या दूर रहो

साथ-साथ रहना

मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना

मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना!

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