हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

तुम कहते तो - सुदर्शन रत्नाकर

अयन प्रकाशन   से  प्रकाशित ‘तुम कहते तो…’ प्रगति गुप्ता का कविता संग्रह है  जिसमें 102 लघु कविताएँ हैं, जिनमें भावनाएँ हैं, बस भावनाएँ। लगता है भावनाओं की नदी बह रही है। कवयित्री के शब्दों में-“लेखन का सुख मुझे विविध भावों को महसूस करा कर, मुझे स्वयं में पूर्णता देता है।” भावों को जीते -जीते भावों से ही सुख की अनुभूति हुई, भावों को लिख लिख कर , परम आनन्द महसूस होकर ,मेरे संग संग चला,हृदय भी लिखने के बाद ही शांत ,अभिभूत हुआ।”

भावनाओं का संग्रह की पहली कविता में देखिए-

-तुम कहते तो/काश तुम्हारी, उस अनकही पीडा तक मैं पहुँच पाती,/ तुम  कहते तो,/मैं मरहम बन उन छिपे घावों को सहला जाती/,तुम कहते तो/आना हमेशा,स्पर्श बन कर/अहसासों की स्मृतियाँ बन कर/जीवन की लय बन कर/और रहना मेरे साथ,उस यात्रा पर/जिसकी शुरुआत जीवन के पहले होती है/विदा लूँगा तुमसे ही, क्योंकि/कुछ अपनी तरह मिले हो, सिर्फ तुम/हर रिश्ते का कोई नाम नहीं/क्योंकि स्पर्श, स्मृति व अहसासों के नाम नहीं होते

रेगिस्तान से सूखे जीवन में जहाँ हर कोई अपनी अपनी जिंदगी जी रहा है। नीरसता  भरे इस आपाधापी के वातावरण में शीतल हवा के झोंकों का अहसास कराती कविताएँ , जिनमें रिश्तों के फूल हैं, स्वयं के जीने की कोशिश है। बीते पलों की स्मृतियाँ हैं   । बेफ़िक़्र  बचपन,बेफ़िक्र लड़कपन।

ना मनाने की चिंता/न किसी के रूठने का डर/जाने कैसा है जुड़ाव/दूर हैं हम मगर/करते अनुभव साथ साथ/याद करते स्मृतियों को/कितना सुंदर था/वो अपना/अतीत का पड़ाव रहता था जहाँ मेरा/बचपन साकार/मेरा बचपन साकार।

व्यस्तताओं में जीवन कब खिसकता गया पता ही नहीं चला। थोड़ा जीवन को खुले में जिया होता तो वह इन्द्रधनुषी रंगों से भरा होता। सूची कविता में कवयित्री ने बड़े सुंदर ढंग से उकेरा है-

पर इसी कश्मकश में ,कब खोती गई जिंदगी,/ये पता न चला/कब गुज़रा बचपन ,कब जवानी गुज़र गई ,बुढ़ापे तक पहुँचते -पहुँचते/सिर्फ अफ़सोस रह गया/जीवन में प्राथमिकताओं की सूची को/अगर उल्टा  कर देते तो जिंदगी/कुछ और ही रंग भरती/मस्ती में झूमता बचपन होता/जवानी भी हँस कर गुज़र जाती/बहुत कुछ होता सहेजने को/बुढ़ापे में/और जिंदगी मायने बदल जाती और जिंदगी

संवेदनशील कवयित्री माँ -बेटी के रिश्तों को लेकर जीती है   ।(बहुत खला माँ) माँ की मृत्य के बाद घर का खालीपन कचोटता है।

तेरे रहते बेफ़िक्र  रहना चाहती थी,तेरे जाते ही,/तेरे थामे हुए रिश्तों को/मुझे भी साधना पड़ा माँ/तेरा यूँ  अचानक चले जाना,/मुझे बहुत खला माँ।।

माँ बेटी को बडा होते देखती है लेकिन उसके मन में एक कसक है कि बेटी कल दूसरे घर चली जाएगी(तेरा मेरा रिश्ता) बेटी का माँ होना कवयित्री अपना सौभाग्य समझती है ।(यथार्थ कविता में मृत्यु के समय उसका मन माँ,बचपन की स्मृतियों के लिए तड़पता है।जीवन में माँ के  होने का सुख और बेटी का स्वयं माँ होने का अहसास कवयित्री हृदय की गहराइयों से महसूसती है वह इस अहसास के हर पल को जीना चाहती है  ।यह सुख,यह अनुभूति अवर्णनीय है ।

विदाई एक बेटी की, बिटिया,, माँ का चले जाना,बेटी की माँ ,

विडम्बना कविता में हाशिये पर जीते लोगों , बेबस, विवश,कीड़ों की तरह रेंगते जीवन जीते लोगों का वर्णन मन को द्रवित कर जाता है ।पता नहीं वे कब गटर में गिर जाएँ,कब कुचलें जाएँ ।

गिरा अचानक वो/ अर्द्ध विक्षिप्त -सा/वस्त्रों के अभाव में/शीत लहर के आग़ोश में बँधा सा/हम तुम द्रष्टा थेउसके गिरते समय,मिली लाश उसीकी/सुबह नज़दीकी नाले से/हम तुम ही तो वक़्ता थे, जिन्होंने संज्ञा दे डाली,अपने अपने भाग्य की

यह ग़रीब लोगों के भाग्य की बात नहीं ।अपितु  सामाजिक राजनैतिक व्यव्स्था पर प्रश्न उठाती है यह कविता।आपसी   विचारों में भिन्नता के कारण  अलगाव,तलाक़ का होना आजके समाज की त्रासदी है लेकिन बच्चों के बालमन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है यह कोई नहीं सोचता।आज की भटकन,तलाक़,विवाह विच्छेद

एकटक देखती थी मुनिया/कहना चाहती थी कुछ कि/अम्मा के पास रहेगी/या बाबा के पास/पर किसने टटोला उसका मन/शापित तो माँ बाप थे/फिर क्यों भोगता/अनकही सी पीडा/मुनिया का नन्हा -सा मन।मुनिया—-

लिखावट कविता में    कवयित्री इस बात का दुख प्रकट करती है कि सोशल साइट पर पत्र लिखने में वे भावनाएँ नहीं आतीं जो हाथ से लिखे पत्रों में होती थी,शब्दों के होने का अहसास नहीं होता। सोशल साइट पर दिल की बातें नहीं होतीं केवल औपचारिकता निभाई जाती है।

न दिल की बातें हैं,न दिल का-सा जुड़ाव ,/नेट बंद होते,होता टाइम पास का व्यापार।मोबाइल की बत्ती गुल होते/ही,रिश्तों की भी बत्ती गुल होजाती है/ज़रूरत पड़ने पर रिश्तों की हक़ीक़त सामने आ जाती है।कितनी सच और सटीक बात है यह।

फ़ितरत कविता में कवयित्री का यह कहना हैकि आदमी की यह फ़ितरत है कि वह स्वयं को श्रेष्ठ समझता है। वह नारी के गुणों को नहीं देखता अपितु अपना अक्ष उसमें देखना चाहता है   ।   (   वह तो इश्क़ , ख़ुद से ही करता था,तभी तो वो,मुझमें,ख़ुद जैसी को ही ढूँढता था ।लेकिन (बस यूँ भी तो में )नारी के स्वाभिमान को उजागर किया है।वह स्वाभिमान से जीना चाहती है-

बग़ैर आडम्बर/कुछ तुम मेर करो,कुछ मैं तुम्हारा/और जो कुछ भी,साँझा हो हमारा/बग़ैर जताये झूठा प्रेम,बस निभायें/बस निभायें ,शरीर से बँधे कर्मों को/जो थोथे रीति रिवाजों और/आडम्बरों से परे हो/कुछ इस तरह/मैं तुम्हारे स्वाभिमान को निभा पाऊँ/और कुछ मैं/स्वयं का स्वाभिमान जी पाऊँ

प्रेम की शक्ति अपार है । उसके आगे बड़ों बड़ों को झुकते देखा ।ओहदे,मोहब्बतें झुका देती हैं

मुहब्बत बोझ तो नहीं, फिर भी झुका देती है/जब छुआ हो रूह को रूह ने ,तब निभाने के जज़्बे को/ख़ुद बख़ुद जगा देती है।

रिश्तों को पाने की खुशी होती है पर अनुबंधों से रिश्तों में सरसता  नहीं होती, प्यार अनुबंधों से नहीं,अपनेपन से पनपता है। ऐसा प्यार पाने के लिए कवयित्री के मन में अकुलाहट है।हक़ीक़तें कुछ और हैं,इन्तहा  प्यार की।

सारी उम्र चुप कर गुज़ार दी मैंने/तुम इसे मेरी खुशी समझते हो /तो बेहद खुश हूँ मैं/न तुमसे कोई शिकायत/न गिला न शिकवा/न चाहना कोई/जानती हूँ तुम्हें/सुकून देती है मेरी ये चुप्पी/शायद यही है/इन्तहा मेरे प्यार की

मनुष्य ने अपनी इच्छाओं को बढ़ा लिया है। बड़े बड़े घरों की कामना तो करते हैंलेकिन उन बड़े घरों की दीवारों के पीछे रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं,दूरियाँ बढ जाती हैं।(दीवारें)

कैसे भूल जाते हैं/बड़े बड़े मकानों में/दीवारें बहुत होती हैं/बहुत नज़दीक होते हुए भी/सब बहुत दूर होते हैं/जाने क्यों/फिर भी अपनों में रहते हुए भी/अपनी अपनी दुनिया बसाते हैं/पास रहते हुए भी/बहत दूर हो जाते हैं    बहुत।

क़र्ज़ , कन्या भ्रूण हत्या कविताओं में कवयित्री का आक्रोश दिखाई देता है।कन्या को बोझ समझा जाता है,कन्या होने में उसीका दोष माना जाता है। कैसी त्रासदी है यह इक्कीसवीं शताब्दी में जबकि दुनियाँ कहाँ से कहाँ पहुँच रही है, नारी आज भी अपने अधिकारों से वंचित है। मत बेचो मुझे कविता में एक बालिका की करुण पुकार सुनिए-

मुझे बेचने में तुमको मिल जाएगी/चार दिन और रोटी ज़रूर/मगर अम्मा सारी उम्र तेरे प्यार की भूखी रह जाऊँगी ।विवश कविता की बेबस नारी की विवशता देखिए/चिकोटी काटी,छुआ उसे और भाग गया/लोग सिर्फ तमाशायी बने/अपनी अपनी राह हो लिए/लज्जा से सिमटी/पुन:समेटने की कोशिश करती,आज भी कितनी विवश है/सबल है, शिक्षित है/पर सुरक्षित नहीं।।

प्रदूषण की समस्या आज बहुत बडी समस्या है।कवयित्री इस समस्या को लेकर चिंतित है तभी तो कहती है-

गुम होने लगी है,सब ताल तलैया,पोखर/इन बढ़ते ईंटों के दलदल में,कतराते हैं अब,/अरविंद भी मुस्करा कर खिलने में।।

माता-पिता को अपनी इच्छाओं का  बोझ अपने बच्चों पर नहीं डालना चाहिए।उन्हें आत्मनिर्भर बनने दें।उनकी अपनी उड़ान भले ही छोटी रही हो लेकिन संतान की ऊँची उड़ान में बाधा नहीं बनना अपितु अपने जीवन में भी रंग भरें।(उड़ान, घर ख़ाली हो तो हो)

खुश होऊँ भी बेशक ,तुम्हें उड़ता देखकर/पर ये भी जानती हूँ, मैं बहुत अच्छे से कहीं,/उड़ाने कभी लौटने नहीं देतीं ।पर तुम हमेशा रहोगे मेरे पास

भाषा सरल, सहज है। कहीं कठिन शब्दों का बोझ नहीं। छंद मुक्त होने पर भी लयात्मकता है। कविताएँ छोटी हैं लेकिन भावाभिव्यक्ति से परिपूर्ण।कुछ कविताओं में अंतिम पंक्ति की आवृत्ति अखरती है।मंच प्रस्तुति के समय पंक्ति के दोहराने से प्रभाव पड़ता है लेकिन लिखने में बोझिलता आ जाती है।।यह  मेरा मत है। आवश्यक नहीं कि कवयित्री  या अन्य मेरे विचार से सहमत हों।

मिली जुली भावनाओं से सजी प्रगति गुप्ता की इन छोटी छोटी कविताओं की सुगंध पाठकों को आकर्षित करके उनके हृदयों को अवश्य छुएँगीं ऐसी मैं आशा करती हूँ। अशेष शुभकामनाओं सहित।

[पुस्तक : तुम कहते तो… (काव्य-संग्रह),कवयित्री : प्रगति गुप्ता,मूल्य : 250 रुपये,प्रकाशक : अयन प्रकाशन ,1/20 महरौली, नई दिल्ली-110030]