हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दीवार - रामगोपाल भावुक

दीवार – रामगोपाल भावुक
मेरे मित्र कहते हैं,–‘यार शब्बीर खान, तेरी किस्मत बहुत बुलन्द है, हमें तो मैहर घास ही नहीं डालती।’
सच तो यह है मेरी कौम की एक मात्र लड़की कॉलेज में पढ़ती है। उसका ध्यान रखना मेरा फर्ज है कि नहीं। मेरी कौम में लोग लड़कियों को पढ़ाने में रुचि ही नहीं लेते।
हर पल मैं ही उसके साये की तरह उससे चिपका रहा। आज के वातावरण में कहीं कोई समस्या न हो जाए और उसका अध्ययन ही न छूट जाए। वैसे वह दब्बू किस्म की लड़की नहीं है। उस दिन ‘नारी मुक्ति’ विषय पर उसने अपने भाषण में सभी को आश्चर्य में डाल दिया था। उसने मुस्लिम समाज में नारी की स्थिति को रेखांकित करने में संकोच नहीं किया था। उसने अपने समाज की पर्दाप्रथा का जमकर विरोध किया था। कहा था–‘जब मैं बुरके में होती हूँ ,तो लगता है किसी क़ैदख़ाने में क़ैद हूँ। इस तरह क़ैदखाने में रहकर हम पुरुषों की बरावरी कैसे कर पाएँगीं? रोशनी और हवा के लिए हमें अपनी खिड़कियाँ खुली रखनी पड़ेगीं कि नहीं! हमारे समाज ने तो इन पर पहरे बैठा रखे हैं। शरीयत के नाम पर हमें क़ैद रखा जा रहा है। हम दुनिया को झरोखे में से देख पा रहे हैं। इस तरह हमारी आधी आबादी फ़रमानों के दायरे में क़ैद करदी गई है। केवल मैं ही नहीं, हमारे समाज की हर औरत मुक्ति के लिए छटपटा रही है। इसका अर्थ यह न लें कि मैं मर्यादा का उल्लंघन करने का पक्ष ले रही हूँ। मैं चाहती हूँ ,हमारा समाज आज की दौड़ में कहीं पिछड़ न जाए।’
उस दिन से मैं सोचता रहा हूँ ,हमारे परम्परावादी समाज में मैहर कैसे जी पायेगी। इस विषय को लेकर मित्रों में बहस छिड़ गई थी कि उसने जो बातें अपने भाषण में कहीं हैं ,वह उसका पालन कर पाएगी कि नहीं! मैंने तो उनसे कह दिया था, ‘आदमी यदि ठान ले तो क्या नहीं कर सकता? वह हमारे समाज में नारी को बदतर स्थिति से उबारने का प्रयास जरूर करेगी।’ किन्तु सोचने लगा था, मैं उसे कहाँ– कैसे सहयोग कर पाऊँगा! मैं जितना उसके पास जाना चाहता हूँ ,वह उतना ही मुझसे दूर होती जाती है।
वह कालेज की हर एक्टिविटी में भाग लेने में पीछे नहीं रही। चाहे खेल का प्रकरण हो चाहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का। नाटक में अभिनय करने में वह किसी श्रेष्ठ कलाकार से कम नहीं है। हू–ब–हू उस पात्र की भूमिका में खरी उतरी है।
वह दिखने में भी बोल्ड दिखती है। लम्बी–तगड़ी, गोरा–चिट्टा एक शानदार व्यक्तित्व उभर कर सामने आता है।
कभी–कभी मैं अपनी तुलना उससे करने लगता हूँ ,तो अपने आप को उससे बहुत पीछे खड़ा पाता हूँ।
निश्चय ही रोशनी के प्रसार में कोई व्यवधान पैदा करना चाहे तो वह अपनी ही छाया बन कर रह जायेगा।
जब हमारा अध्ययन पूर्ण हो गया तो भी उसकी वे कजरारी आँखें मेरा पीछा करती रही हैं। कितनी खूबसूरत हैं उसकी आँखें ! हिरणी की आँखों से उनकी तुलना करता हूँ ,तो वे भी मुझे थकी–थकी सी जान पड़ती हैं।
मैं उनका ऐसा दीवाना बना कि सोते–जागते हर पल हरजगह वह किसी परी सी लगती। कभी–कभी मैं सोते से उठकर बैठ जाता, फिर नींद नहीं आती। सभी बातें भूलकर उन आँखों के बारे में सोचता रहता। कभी उनमें हिमालय पर फैली बर्फ़ की श्वेत चादर पर टिकुली महसूस होती। और कभी सागर में हिलोरें लेते यान का मस्तूल दिखाई पड़ता।
कभी उसकी आँखों की बरौनियाँ उसकी रक्षा में खड़ी दीवार की तरह मुझे उनमें झाँकने से रोकती। संसार के नक्शे पर झील सी आँखें पाने के लिए मैं बेताब हो उठा था।
बहुत सोच विचार के बाद, नहीं–नहीं, अपने मन की बेसब्री को मैं हजार प्रयास करने पर भी रोक नहीं पाया। मजबूर होकर मैंने उससे मिलने का प्रयास किया था।
एकबार हम उसी पार्क में टकरा गए ,जहाँ मैं टहलने जाता था।
मैंने पूछा –‘‘ मैहर जी ,कैसी हो?’’
वह बोली–‘‘ठीक हूँ’’ फिर कुछ रुक कर मेरे मन के भाव समझ कर बोली–‘‘मैं जिन्दगी अपनी तरह जीना चाहती हूँ। उसमें किसी की दखलन्दाजी पसन्द नहीं करती।”
मैंने कहा–‘आप चिन्ता नहीं करें, हम आपकी जिन्दगी में उतना ही दखल देगें ,जितना आप पसन्द करेंगी। हम तो आपको देख–देख कर जी हरा करते रहेंगे।’
वह बोली–‘हम आपको एक अच्छा दोस्त समझते थे ;किन्तु आपका इस तरह का सोच!’
मैंने एक श्वास में अपनी बात उसकी दहलीज पर रखी–‘मैं आपसे निकाह ………..।’
वह बात काटकर मुझे डाँटते हुए बोली–‘मैंने इस तरह कभी नहीं सोचा।’
उसकी यह बात सुनकर मैं निराश–सा होगया। किन्तु सोचा–मेरे प्रस्ताव पर यह जरूर विचार करेगी। आज डायरेक्ट मना कर देती ,तो मैं क्या कर लेता ? यों मैं उसके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। इसीलिए पार्क में घूमने जाना बन्द नहीं किया।
इसी क्रम में मैंने सोचा–कहीं उसने निकाह और कहीं कर लिया ,तो मैं आत्महत्या कर लूँगा। यह सोचकर तो मैं बाजार से एक जहर की शीशी खरीद लाया।
दो दिन बाद जब मैं पार्क में पहुँचा ,जहाँ उसके मिलने की सम्भावना थी, वह वहाँ नहीं दिखी। मेरी सारी चाह अन्दर ही अन्दर घुमड़कर रह गई। पता चलाना चाहा, उसी समय उसकी एक सहेली पार्क में दिख गई। उसके पास जाकर पूछा–‘आज मैहरजी नहीं दिख रही हैं?’
उसने गम्भीर होकर उत्तर दिया–‘वो तो बीमार हैं। दो दिन से हॉस्पीटल में भर्ती हैं।’
मैंने उत्सुकता से पूछा–‘ क्या हुआ उसे?’
वह गम्भीर बनते हुए बोली–‘समझ नहीं आता उसे क्या हुआ? कल मेरी एक सहेली कह रही थी कि उसे कोई ऐसी बीमारी है ,जिसे वह छिपा रही थी।’
यह सुनकर मैं चुपचाप घर चला आया था। सोचने लगा–उसे क्या बीमारी हो सकती हैं? क्या पता उसे कोई गुप्त बीमारी हो गई हो।
आजकल ऐसी–ऐसी बीमारी चलीं हैं कि पति–पत्नी की तरह घनिष्ट सम्पर्क में आने से भी लग जाती हैं। किसी दूसरे मरीज की दूषित सुई लगने से भी हो जाती हैं। सम्भव है ऐसे ही कोई बीमारी उसे लग गई हो।
मैं कैसा हूँ जो उसके चरित्र पर सन्देह कर रहा हूँ। वह ऐसी हो ही नहीं सकती।
यदि ऐसी बातों पर सन्देह न करूँ, तो क्या करुँ? बीमारी भी कोई छिपाने की बात है। वह कोई नेता तो है नहीं, जो अपनी बीमारी को सार्वजनिक न करना चाहते हों।
किसी की बीमारी उसकी निजी त्रासदी होती है। जिसे बीमारी है ,वही उसे झेलता है। उसके शुभ चिन्तक उससे सहानुभूति दर्शा सकते हैं। उसके लिये दुआ करते हैं।
यही सब सोचते हुये मैं दूसरे दिन सुबह ही हॉस्पिटल पहुँच गया। मुझे उसे खोजने में देर नहीं लगी। मैंने उसे देखकर अनजान बनने का नाटक करते हुए कहा–‘ अरे आप यहाँ!’
वह बोली–‘और सुबह–सुबह आप इधर कैसे?…..आप यहाँ भी!’
मैंने कहा–‘इधर एक मित्र भरती हैं, उन्हें देखने चला आया। आपको क्या हुआ? हमें ही सूचना भेज देतीं।’
वह बोली–‘ मुझे तो बड़ा डर लग रहा था। कहीं टी0बी0 न हो गई हो। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। सर्दी–झुकाम के साथ मलेरिया है।’
इसी समय उसके अब्बूजान वहाँ आ गए। मुझे बातें करते देख, पूछ बैठे–‘बेटी ये कौन हैं?
उसने सहज ढंग से उत्तर दिया–‘ऐसे ही एक परिचित हैं। कालेज में साथ पढ़ते थे। अपने समाज से हैं।’
उसके अब्बूजान ने मुझ से पूछा–‘बरखुरदार ,आपकी बल्दियत?’
मैंने संक्षेप में उत्तर दिया–‘मेरे बालिद जनाब रमजान खान है।’
वे झट से बोले–‘अरे! तुम रमजान खान के बेटे हो। वे तो आला दर्जे के इन्सान है। अब तो तुम घर आते रहा करो।’
मुझे उनकी बात अच्छी लगी, किन्तु सोचा– मैहर ने तो मेरा परिचय टालना चाहा। यह तो उनसे जबरदस्ती का परिचय हुआ। मैंने चलने से पहले व्यवहारिकता में पूछा–‘कोई काम हो, तो कहें ?’
इस प्रश्न के उत्तर में मैहर चुप रह गई थी।
घर आकर सोच के चक्रव्यूह में फँस गया और मन ने निर्णय लिया यदि ये निकाह की मना करेगी ,तो मैं आत्महत्या कर लूँगा। फिर कुछ रुककर मैंने सोचा–मैंनें ये गलत निर्णय ले लिया। हमें उतावलेपन में कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। यह सोच कर तो मैंने वह जहर की शीशी नाली में उड़ेल दी। …और बिस्तर पर आराम से लेट गया।
दूसरे दिन न चाहते हुए हॉस्पिटल पहुँच गया। संयोग से उस समय भी उसके पास कोई नहीं था। मैंने पूछा–‘कैसी हो?’
वह बोली –‘फाइन, आज छुट्टी हो जाएगी। ’
मैंने पूछा–‘ आपने मेरी बात का उत्तर नहीं दिया?’
वह बोली–‘ मैं उस दिन सस्पेंन्स में थी। मैं जिसे चाहती हूँ–वह मेरे इर्द–गिर्द चक्कर तो लगा रहा है ,किन्तु वह कह कुछ भी नहीं पा रहा है। समझ नहीं आता क्या करूँ?’
मैंने कहा–‘ आपका मन जिससे लग गया है, उसे आप हासिल करके ही मानेंगीं; किन्तु उसमें ऐसा क्या है कि आप जैसी लड़की उस पर फिदा है?’
उसी समय रूपेश वहाँ आ खड़ा हुआ। उसे आया हुआ देख मेरी बात जहाँ की तहाँ पगडण्डी -सी ठहर गई। उसे देखकर सोचने लगा–रूपेश आर्य, एक ऐसा व्यक्तित्व ,जिसका लोहा कालेज के प्रोफेसर भी मानते थे। जब वह बोलने खड़ा होता तो वह अपने तर्को से सभी का मुँह बन्द कर देता था। कहीं यह लड़की इसी के झाँसे मैं तो नहीं आ गई।
मुझे देखकर उसने अन्दाज लगा लिया होगा कि कालेज छूटे इतने दिनों बाद भी उसे देखने मैं हॉस्पिटल आया हूँ; इसीलिए उसने मुझसे कहा–‘आप लोग कैसे हैं कि अपनी कौम की ऐसी बहादुर लड़की का घ्यान ही नहीं रख पा रहे हैं।’
मेरे मुँह से व्यंग्य में निकल गया–‘ इनका ध्यान रखने वाले आप जैसे लोग तो हैं ना, इन्हें हमारी जरूरत ही नहीं हैं।’
वह बोला–‘यह तो मैहरजी का आपके साथ अन्याय है। हम ठहरे दूसरी कौम के लोग। हम आपके रीति–रिवाजों से अनजान हैं। किन्तु हम जो जानते नहीं, उसमें टाँग भी नहीं अड़ाते । और जो सत्य लगता है, उसे स्वीकार करने में संकोच भी नहीं करते।’
मैं उसकी बातें चुपचाप सुनकर रह गया। मुझे लगा– अब मुझे यहाँ से चलना चाहिए। यह सोचकर मैंने कहा–‘ अच्छा मैं चलता हूँ।’ और मैं वहाँ से चला आया था। मैहर ने भी मुझे रोकने की कोशिश नहीं की। सोचती होगी, अच्छा हुआ, चला गया, संकट टला।
निश्चय ही, यह इसीसे फँस गई है। लगता है इसकी विद्वत्ता पर लट्टू हो गई है वह। रूपेश बहुत ही उस्ताद है, वह अपना मुँह क्यों खोले? मैडम, तुम्हें ही अपनी बात उससे कहना पड़ेगी। हाय! मैं अब क्या करूँ? इसे आगे बढ़ने से कैसे रोकूँ?’ इसके पेरेन्ट्स से जाकर कह दूँ। यह तो हमारी कौम का अपमान हो रहा है।
किन्तु मेरा यह आचरण सच्चे प्यार की निशानी नहीं है। हम हिन्दुस्तान में अल्पसंख्यक हैं; किन्तु यदि हिन्दुओं की लड़की हमारी कौम में आकर निकाह कर लेती है ,तो हम कितने खुश होते हैं। गर्व करते हैं और शान में इतराते हैं। हमारी पड़ोसन शीला ने गुलाम खान से जब निकाह करना चाहा, तो मैंने उनकी सब तरह से मदद की थी। मैहर रूपेश से ब्याह करना चाहती है तो हमारा क्या फ़र्ज है कि हम उसमें रोड़े अटकाएँ! यही कि हमारा अपमान हो रहा है। हिन्दू हमें दबा रहे हैं। ऐसे में मैं क्या करूँ? एक ओर कौम है, दूसरी ओर है उन दोनों का सच्चा प्यार।
रातभर सोच के सागर में गोते लगाता रहा। उस दिन की बात याद आती है, जब नारी- विमर्श को लेकर रूपेश ने अपने भाषण में कहा था–‘मुस्लिम संस्कृति अल्लाह पुरुष के इर्द–गिर्द विकसित संस्कृति है। इस संस्कृति में मातृपक्ष के साथ न्याय नहीं किया गया है। उसे पर्दे में ढककर रखने की परम्परा विकसित की गई है। नारी को फर्ज गिनाए जाते हैं। हमारे देश में नारी की बदतर स्थिति है ,तो ज्यादातर हमारे समाज में ही।’
उसकी इस बात पर मैंने उस समय रूपेश का खुलकर विरोध किया था। इसीसे उससे मेरी दूरी बनी हुई है। मैहर ने उसके इस भाषण पर उसे बधाई दी थी। मेरा माथा तो उसी दिन ठनका था। मुझे क्या पता था कि बात इतनी बढ़ जाएगी! अब तो पानी सिर से निकल गया है। मैहर ने जो निश्चित कर लिया है, वह उसे करके मानेगी, चाहे उसे इसके बदले कितने ही कष्ट सहने पड़ें।
दूसरे दिन दिनचढ़े मैं मैहर के घर की तरफ से निकला। मैहर के अब्बूजान दरवाज़े के सामने चबूतरे पर कुर्सी डाले बैठे थे। मुझे देखते ही झट से बोले–‘अरे! शब्बीर बेटे ,बहुत दिनों से मैं तुम्हारी ही राह देख रहा था।’
मैं समझ गया वे मैहर के बारे में कोई बात करना चाहते होंगे। मैं उनके पीछे–पीछे चलकर उनकी बैठक में पहुँच गया। वे मुझे सोफे पर अपने पास बैठाते हुए मैहर को सुनाकर बोले–‘ मुझे पता है, तुम मैहर से निकाह करना चाहते हो।’
‘जी, किन्तु आप तो जानते ही होंगे कि मैहर तो….।’
‘वे सन्तुलित होते हुए मेरी बात काटकर बोले–‘ तुम इसे समझाने का प्रयास तो करो। यह सारे समाज के सामने मेरी नाक कटवाने पर तुली है। यदि यह नहीं मानी तो मैं इसका कत्ल कर दूँगा, या फिर रेल के नीचे जाकर अपने को हलाक कर लूँगा।’
मैहर तनकर खड़ी होते हुए बोली–‘रूपेश हमारे समाज का नहीं है इसलिए! अरे! हम भी वही हैं ,जो वह है। ’
उसकी यह बात सुनकर अब्बू दहाड़े–‘हम जहाँ हैं ,पूरे समर्पण से हैं। हमें अपने ईमान और मज़हब पर पूरा यकीन है।’
मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया–‘मैंने शीला और गुलाम खान का निकाह कराया कि नहीं? उन दोनों का सच्चा प्यार देखा तो मैंने खुलकर उनका साथ दिया। देखो,अब्बूजान मैं मैहर का इरादा अच्छी तरह समझ गया हूँ। हमें इनकी शादी का विरोध नहीं करना चाहिए।’
यह सुनकर वे तुनककर बोले–‘ तुम मैहर से निकाह करना चाहते हो। अब तुम्हीं यह कह रहे हो!’
मैंने कहा–‘कालेज लाइफ से ही मैं मैहर के इरादों को समझ गया हूँ। वह समझौता करने वाली नहीं है। जब हमें किसी दूसरे समाज की लड़की लेने में हिचक नहीं है, तो उन्हें देने में क्यों। अब बेहतर तो यही है कि इन्हें शादी करने दें, अब्बूजान जरा ठण्डे दिमाग़ से सोचें।।’ यह कह कर मैं वहाँ से चला आया था।
कुछ दिनों बाद मैं सुबह के समय टहलने के बहाने रूपेश के घर की तरफ से निकला। मेरे कदम न चाहते हुए उसके दर की ओर मुड़ गए। मैंने उसका दरवाजा खटखटाया–‘खट…खट…खट…।
रुपेश दरवाजा खेालते हुये बोला– ‘अरे! शब्बीर खान आप इधर! मुझे इसी की सम्भावना थी। आइये, अन्दर चलकर बैठते हैं। इन दिनों घर में अकेला हूँ। घर के सभी लोग मामाजी के यहाँ उनके लड़के के ब्याह में गये हैं।’
हम दोनों उनकी बैठक में जाकर बैठ गये। बैठक में महर्षि दयानन्द सरस्वती की फोटो लगी थी। मुझे पहले से ही ज्ञात था कि रूपेश का परिवार आर्य समाजी है। आर्य समाजी लोग मुस्लिम लड़की को अपना तो लेते हैं, किन्तु शादी वैदिक पद्धति से करना चाहते हैं।
रूपेश ने अपनी बात रखी–‘ आश्चर्य! आपको तो मैहर के अब्बू के घर जाना चाहिए ; किन्तु आप इधर?’
मैंने उत्तर दिया–‘शीला का निकाह गुलाम खान से कराने को लेकर एवं उस दिन आपके भाषण का विरोध करने खड़ा हो गया था ,शायद इसीलिए आपकी मेरे बारे में धारणा ठीक नहीं है। मैंने मैहर और आपको अच्छी तरह समझा है ,तभी आज आपके यहाँ आया हूँ।’
वह बोला– ‘आदेश करें?’
मैंने पूछा–‘आप निकाह कब कर रहे हैं?’
उसने कहा–‘निकाह करने वालों को चार बार निकाह करने की छूट है। मैं एक पत्नीव्रत को मानने वाला इन्सान हूँ। इसलिये हम दोनों कोर्ट मेरिज करेंगे। जिसमें धर्म परिवर्तन करने की भी आवश्यकता नहीं रहेगी।’
उसकी यह बात सुनकर मेरे मन में एक प्रश्न उभरा और पूछ बैठा–‘क्या आप दोनों अपने–अपने मज़हब को मानते रहेंगे?’
रूपेश ने उत्तर दिया–‘जी हाँ ,मानते ही रहेंगे ।’
मैंने पूछा–‘फिर आपकी संताने किस मजहब को मानेंगीं।’
वह बोला–‘मैंने इस प्रश्न का उत्तर मैहर से पूछा था।’
मैंने उत्सुकता में पुन: प्रश्न किया–‘ उसने क्या उत्तर दिया?’
वह बोला –‘उसने कहा है– वे जो मानें ;किन्तु घर के आँगन में दीवार उठाने वाले न हो।
यह सुनकर तो मैं चलने के लिए खड़ा हो गया ।
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