हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दोहे - डॉ.गोपालबाबू शर्मा

डॉ.गोपालबाबू शर्मा

1

अँधियारा गहरा हुआ,फैला कहाँ उजास।

नहीं मौन को स्वर मिला,नहीं रुदन को हास ॥

2

सच सौ आँसू रो रहा,झूठ मनाता मोद ।

सौदागर ईमान का, बैठा सुख की गोद ॥

3

पहन रही हैं आजकल,रातरानियाँ ताज ।

आँगन की तुलसी मुई, हुई उपेक्षित आज॥

4

द्वार बँटे,आँगन बँटे,बँटा हृदय का प्रेम।

चूर –चूर दर्पन हुआ,सिर्फ़ रह गया फ़्रेम ॥

5

जिनके मन में खोट है,वे ही बने कहार ।

रह पाए महफ़ूज़ क्यों, डोली आख़िरकार ॥

6

कहने को अपने बनें,दिखा प्यार, विश्वास ।

किसको है लेकिन यहाँ, दर्दों का अहसास ॥

7

लिप्सा करती है बड़े,जीवन में उत्पात।

मरता मन, भरता नहीं,कैसी अद्भुत बात॥

8

माँ के सब गहने बिके,मिलना बन्द उधार ।

लिये डिग्रियाँ हाथ में, घूम रहे बेकार ॥

9

कहाँ दिलों में प्यार वह, हुई भावना सर्द।

बस आँगन ही जानते, बँटवारे का दर्द ॥

10

यह भी कैसी ज़िन्दगी, हों अपने भी गैर्।

लगें डुबाने कूल जब, किससे माँगें खैर्॥

11

सूरज आँखें लाल कर,दिखा रहा निज रूप ।

रौब सभी पर गाँठती,ऐंठी-ऐंठी धूप ॥

12

मधुर दूधिया चाँदनी,देकर तम को चाँद।

सेमल की फुनगी टँगा, आसमान से फाँद ॥

13

पवन बजाए बाँसुरी,बादल गाएँ गीत ।

हरियाये परिवेश में,पर्वत मन के मीत ॥

14

मन में तपती दुपहरी,आँखों में बरसात ।

जाने क्या-क्या दे गई, जाड़े की वह रात ॥

15

बहती गंगा में भला,कौन पखारे हाथ ।

गंगाजल मैला हुआ,मिल मैले के साथ ॥

16

जंगल हैं जग के लिए,कुदरत का वरदान ।

सदा बाँटते सम्पदा,उन्नति के सोपान ।

17

जीव-जन्तुओं को सदा, जंगल देते छाँव ।

जाएँगे जंगल बिना,बेचारे किस ठाँव ॥

18

यह सच्चाई जान लें,पेड़ों में भी जान ।

दुख-सुख में रोएँ-हँसें,ज्यों कोई इंसान ॥

19

दुखी न वृक्षों को करें,काटें कभी न भूल।

खिलने दें, तोड़ें नहीं,कभी डाल से फूल ॥

20

पर्वत झूठे मान के,सम्बोधन बेकार ।

राई भी पर्वत लगे,पाकर सच्चा प्यार ॥

21

सहज नेह को लोग जब,समझ बैठते और ।

तब मर जाने को कहीं,नहीं दीखता ठौर ॥

22

उगे, बढ़े चुपचाप ही,प्रेम अनूठा बीज ।

भाषा, परिभाषा नहीं,बस अनुभव की चीज ॥

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46, गोपाल विहार,देवरी रोड ,आगरा-282001