हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दोहे - अनिता मण्डा

परिचय

जन्म:-20 जुलाई,1980, सुजानगढ़, राजस्थान।

शिक्षा:- स्नातकोत्तर -हिन्दी, इतिहास। बी.एड।

लेखन: विभिन्न विधाओं  में  सर्जन

अनिता मण्डा-1दोहे:

1

आसमान को छू लिया, रही संग में डोर।

बंधन टूटा डोर का,चली धरा की ओर।।

2

एक बला की सादगी, दूजे चंचल नैन।

दोनों मिलकर लूटते, कर देते बेचैन।।

3

प्रीत निभाओ सांवरा, सुन लो करुण पुकार।

हाथ थामकर अब करो, भव सागर से पार।।

4

बरसाती अल्हड़ नदी, सिंधु  धीर गम्भीर।

बहती आई दूर से, लेकर मीठा नीर।।

5

पहली बारिश में बहे,  झूठ-मूठ के रंग ।

जब ग़म का दरिया चढ़ा, रहे न अपने संग।।

6

शिकवा क्या है ग़ैर का, अपने करते चोट।

ओढ़ आवरण स्वर्ण का, भीतर मन में खोट।।

7

कहाँ ग़ैर को  वक़्त था, थे अपनों के  कर्म।

तोड़े है दिल तो वही, जाने अपने मर्म।।

8

आये हैं ऋतुराज जी,  सुरभित हुई बयार।

मस्ती छाई फाग की,  झूम रहा संसार।।

7

राधे बैठी उन्मनी, जमना जी के तीर।

साँस साँस कान्हा रटे, बहे नैन से नीर।।

8

हाय! फूल चुनते चुभे, इन हाथों में शूल।

रह-रह कर है टीसती, जैसे कोई भूल।।

9

सहकर काँटों की चुभन, खिलते सुर्ख गुलाब।

महके उनकी छुअन से, ये जीवन के ख़्वाब ।।

10

 महकें सदा गुलाब से, रंग न  होएँ ज़र्द।

आँसू की शबनम बना, छिपा रखें सब दर्द।।

11

मन पंछी है उड़ चला, खोले अपने पंख।

कल-कल से झरनें बहें, वात बजाये शंख।।

12

घोल दिए हैं साँझ ने, सरिता में जो रंग 

देखी ये कारीगरी, रह जाते हम दंग।।

13

मेरा साया रख लिया, देकर अपनी छाँव।

इससे तो तब थे भले, जलते थे जब पाँव।।

14

आँसू निकले आँख से, चले गए घर छोड़।

जीवन में  आते रहे, ऐसे कितने मोड़।।

15

दुख का दरिया तैरकर, करना हमको पार।

अनुभव के मोती लिये, बहती इसकी धार।।

16

ममता के आँचल तले, मिलती सुख की छाँव।

इस जग में कोई नहीं, इसके जैसा ठाँव।।

17

इठलाती गाती धरा, पहन पीत परिधान।

जन-जन के मुख पर मधुर, खेल रही मुस्कान।।

18

चाहे तुम पैदा करो, अफ़जल और कसाब।

मुरझा सकता है नहीं, भारत देश -गुलाब।।

19

बीच सफ़र में हो गई, जीवन में यूँ रात।

कहनी थी उनसे हमें, अपने मन की बात।।

20

चंदा तेरी चाँदनी, रखती कैसी आग।

तन पर तो दिखते नहीं, मन पर पड़ते दाग।।

21

नियति जिंदगी की रही, संग फूल के खार।

दामन छलनी हो गया, जिसने चाहा प्यार।।

22

यूँ ही भटकाती रही, जीवन भर तो आस।

सागर है जल से भरा, बुझे कहाँ है प्यास।।

23

भाप बना दे सिंधु को, सूरज की औकात।

डूबे उसमें साँझ को, भूले अपनी जात।।

24

हर डाली पर शूल हैं, फिर भी खिलते फूल।

कहते हमसे महक़ कर, हँसना कभी न भूल।।

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