हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दो कविताएँ - डॉ.ऋतु त्यागी

1-जानती हो ?

जानती हो ?
तुम दुनिया की बेहद ख़ूबसूरत स्त्री हो
जो अपनी आज़ादी का परचम ख़ुद लहराती है ।
अपनी सादगी से गढ़ती है जो इतिहास
अपने अंदाज के अर्थशास्त्र में
बिखेर देती है सिक्कों की मुस्कुराहट ।

मैं जानती हूँ तुम्हें पसंद नहीं है
रसोई के बरतनों में उलझना
और यह भी
कि तुम रसोई में छिपी स्त्री नहीं हो
और न तुम गपशप की आँच में तपती धूप ।

तुम दिमाग के गणित से गुणा भाग करती
एक ख़ूबसूरत स्त्री हो
जो भीतर से छटपटाती है मछली की तरह ।

जो ढूँढती है अपना आकाश
जहाँ वो उड़ सके
परिंदे की तरह न सही
भले ही एक पतंग की तरह।

ज़िंदा रहने के मायने
“मैं हमेशा जीना चाहती हूँ
या इस कोशिश में मरना
कि ज़िंदा रहने के मायने
किसी भी हर उस चीज़ से बड़े हैं
जो हर एक आदमी के सामने
एक शत्रु की तरह आकर खड़े हो जाते हैं।”

किसी ने एक दिन मुझसे मायूसी से कहा
“मेरे इस संसार में न होना
परिस्थितियों की उमड़ती घटाओं में
पानी की बूँद की तरह उलझी ज़िंदगी में से
किसी एक का सूख जाना ही तो होगा” ?

मैंने उस दिन बड़े ध्यान से
ज़िंदगी की बारिश को देखकर सोचा था
बारिश की हर एक बूँद उतनी ही कीमती है
जितनी सूरज के माथे पर रखी रोशनी
जो तपती है फिर निखरकर
पूरे संसार को रोशनी से भर देती है।

-0-

शिक्षा-बी.एस.सी,एम.ए(हिन्दी,इतिहास),नेट(हिन्दी,इतिहास),पी.एच.डी

काव्य संग्रह-कुछ लापता ख्वाबों की वापसी

सम्प्रति-पी.जी.टी हिंदी केंद्रीय विद्यालय सिख लाइंस मेरठ

पता-45,ग्रेटर गंगा, गंगानगर, मेरठ

मो.9411904088