हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दो नवगीत - रमेश गौतम

1

शब्द की

तूलिका से बनाए गए

गीत अनुभूतियों के सजल चित्र हैं

जब उदासी गहन

चीरती है हृदय

देह से खींचता

प्राण निर्मम समय

तब अनायास

संजीवनी की तरह

गीत ही सिद्ध होते परममित्र हैं

आँसुओं के सदा ही

कथानक हुए

हर गली पाँव

संवेदना के छुए

आचरण अक्षरों का

सुवासित हुआ

गीत करुणा- कलित नैन का इत्र हैं

ओढ़कर आवरण

सब गले से लगे

चार रिश्ते नहीं

ढूँढ पाए सगे

पारदर्शी कथा

कागजों पर लिये

नेह की व्यंजना

गीत ही तो यहाँ राम–सौमित्र हैं

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2

गौरैया भी

एक घोंसला रखले

इतनी जगह छोड़ना

महानगर।

खड़े किए लोहे के पिंजरे

हत्या कर

हरियाली की,

इतने निर्मम हुए कि

गर्दन काटी

फिर खुशहाली की;

पहले प्यास बुझे

हिरनों की

तब अरण्य से नदी मोड़ना

महानगर।

माटी के आभूषण सारे

बेच रहे हैं सौदागर

गर्भवती

सरसों बेचारी

भटक  रही है अब दर–दर

गेहूँ–धान

कहीं बस जाएँ तो

खेतों की मेड़ तोड़ना

महानगर।

फसलों पर

बुलडोजर

डोले

सपने हुए हताहत सब

मूँग दले छाती पर

चढ़कर

बहुमंजिली इमारत अब

फुरसत मिले कभी तो

अपने पाप–पुण्य का

गणित जोड़ना

महानगर।

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