हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

नवगीत - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

1-बिटिया

त्रिलोक सिंह ठकुरेला
त्रिलोक सिंह ठकुरेला

बिटिया !
जरा सँभल कर जाना ,
लोग छिपाये रहते खंजर ।
गाँव , नगर
अब नहीं सुरक्षित
दोनों आग उगलते ,
कहीं -कहीं
तेज़ाब बरसता ,
नाग कहीं पर पलते ,
शेष नहीं अब
गंध प्रेम की ,
भावों की माटी है बंजर ।
युवा वृक्ष
काँटे वाले हैं
करते हैं मनभाया ,
ठूँठ हो गए
विटप पुराने
मिले न शीतल छाया ,
बैरिन धूप
जलाती सपने ,
कब सोचा था ऐसा मंजर ।
तोड़ चुकीं दम
कई दामिनी
भरी भीड़ के आगे ,
मुन्नी , गुड़िया
हुईं लापता ,
परिजन हुए अभागे ,
हारी पुलिस
न वे मिल पाईं ,
मिला न अब तक उनका पंजर ।
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2-हरसिंगार रखो

मन के द्वारे पर
खुशियों के
हरसिंगार रखो.
जीवन की ऋतुएँ बदलेंगी,
दिन फिर जाएँगे,
और अचानक आतप वाले
मौसम आएँगे,
सबन्धों की
इस गठरी में
थोडा प्यार रखो.
सरल नहीं जीवन का यह पथ,
मिलकर काटेंगे ,
हम अपना पाथेय और सुख,दुःख
सब बाँटेंगे,
लौटा देना प्यार
फिर कभी,
अभी उधार रखो.
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