हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

नवगीत - डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

1-अरे बाँस के झुरमुट !

dr. jyotsna sharmaचिड़ियों की बस्ती है तुझमें
रचता मेरा घर
अरे बाँस के झुरमुट आया
कितने गुन लेकर ।

झूम-झूम के तुझे खिलाए
पवन झकोरे खूब
संगी-साथी आम , नीम सब
और नन्ही -सी दूब
सबके संग हिल-मिलके गाता
गीत बड़े सुखकर !

बचपन की नर्मी है तुझमें
होता कभी कठोर
जन्म झुलाए , मरण ले चले
तू मरघट की ओर
औरों के हित झुकता-मुड़ता
रहा कभी तनकर !

डलिया,कुर्सी ,मेज़ ,चटाई
रूप कई धरता
कान्हा के अधरों पर सजता
मधुर-मधुर बजता
बिन तेरे कच्ची है कुटिया
और पोला छप्पर !

अरे बाँस के झुरमुट आया
कितने गुन लेकर !
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2-बेला खिला-खिला !

उजला तन-मन ,ठसक ,सभी को
लगता बहुत भला
झाँक रहा खिड़की से मेरी
बेला खिला-खिला !

सजता है शृंगार अलक्तक
बिंदी और कजरा
गूँथा था वेणी में फिर क्यों
बिखर गया गजरा
कच्चे थे, धागे क्या जुड़ते
करता रहा गिला
झाँक रहा खिड़की से मेरी
बेला खिला-खिला !

हरे-हरे पत्तों में कितनी
उमग खिली कलियाँ
मोह-मोह कर महकाती हैं
मन ,आँगन ,गलियाँ
चढ़ीं ईश के शीश , चरण से
कभी गया मसला
झाँक रहा खिड़की से मेरी
बेला खिला-खिला !
स्नेह सींच कर यूँ माली ने
नाजों से पाला
पर बेचारा कब तक रहता
बनकर रखवाला
पाया रूप अनूप यही क्या
उसका दोष भला
झाँक रहा खिड़की से मेरी
बेला खिला-खिला !
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