हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

नवगीत - इन्दिरा मोहन

1-ऊबी हवाएँ

ऊबी हवाएँ
पूर्णता का राग ,
छेड़ें हैं दिशाएँ
बेसुरे संगीत से ,
ऊबी हवाएँ ।

शांत है जल , शांत है थल ,
शांत नभ की नील धारा,
टिमटिमाते उदय उत्सुक,
सौर-मंडल सजग सारा,
नव भूमिकाएँ ।

मुखर हो विभु कल्पना के ,
सूत्र सुलझे छाँटते हैं ,
चित्र -पट भू को बनाए ,
इन्द्रधनु को टाँकते हैं ,
बाँचते हैं वन – विहग
जातक कथाएँ ।

मन्दिरों के कलश स्वर्णिम ,
दूधिया किरने सजाती
गंध कर्पूरी सुवासित
घंटियां पल-पल बजातीं ,
चाहती संस्पर्श शुभ –
शापित शिलाएँ ।
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2-सागर पीड़ा

सागर रहता मौन ,
बूँद का अहं सँभाले कौन ?

दाएँ -बाएँ देख न पाए ,
निराधार की भी क्या भाषा,
पल- पल बनना और बिगड़ना
बादल की भी क्या अभिलाषा ,
सागर बहता मौन ,
प्यार से गोद उठा ले कौन ?

लहरों का उन्माद अनोखा
केवल जल है उनका जीवन
तरल , सरल , निर्मल , लयमयता-
धारा- धारा एक समर्पण ,
सागर रहता मौन
नियति का भेद उघाड़े कौन?

एक बूँद की सुमति यही है
खाली को बस भरते जाना ,
खुद मिटने का होश नहीं पर –
प्यासे घट- घट गिरते जाना
सागर रहता मौन
उड्गगन को गले लगाए कौन ?
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इंदिरा मोहन १२ लखनऊ रोड -दिल्ली -५४