हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दो पंजाबी कविताएँ– - शालू कौर

भाषान्तर

(अनुवाद : सुभाष नीरव)

1-स्पेस

शालू कौर किसी स्पेस में से आया मनुष्य

खोजता है धरती पर

स्पेस को भरने के साधन

और तलाशता है दुनियावी सुख।

 

बादलों के पीछे भागता

उपवनों में विचरता

प्रगति की सीढि़याँ चढ़ता

दुनिया पे राज करता

मनुष्य जीतता है जिन्दगी की हर रेस

पर फिर भी दिल के किसी कोने में

रह जाता है एक स्पेस ।

 

स्पेस को भरने के लिए

वह करता है प्रेम

कभी प्रीतम के साथ

कभी कला के संग

कभी संगीत के साथ

कभी आध्यात्म के संग

फूट पड़ता है मन के अंदर का सोता

होती है भावनाओं की भरमार

धीरे धीरे यह नशा भी उतरता है

वह जिम्मेदारियों की तरफ लौटता है

अकेली राह पर चलता है

और माँगता है अपने प्यार का स्पेस।

 

जब घुटन बन जाता है रिश्ता

तब महबूब के चेहरे पर

वह नूर नहीं दिखता।

हर रिश्ते की जंजीर को तोड़

भागता है मनुष्य

फिर खुले मैदानों की ओर

साँस लेने के वास्ते

स्पेस के लिए।

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2-रिश्ते

 

तेरी पहले जैसी नज़र–ए–इनायत

क्यों नहीं होती ?

मेरे दिल को पहले जैसी तसल्ली

क्यों नहीं होती ?

छोटी–छोटी बातों पर लड़ा करता था

अब मेरी किसी बात पर शिकायत

क्यों नहीं होती ?

लगता है, तुझे दूसरा दर मिल गया है

इसलिए मेरे घर आने की फुरसत नहीं होती।

तेरा मिलना एक ख्वाब था

यही सोच तुझे भुला दिया

दिल में जो लौ जलती थी

उसको अपने हाथों बुझा दिया

हादसों के शहर में

घर है मेरा

इस डर से भागकर कहाँ जाती ?

अगर न बनाया होता कब्रिस्तान

अपने ही अंदर

तो ये प्यार के रिश्ते दफनाने

कहाँ जाती ?

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ई मेल : shellykaur2@gmail.com