हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ग़ज़ल - अशोक अंजुम

एक
डूबती उम्मीद को फिर रौशनाई दे रहा है
वो पिता के हाथ में पहली कमाई दे रहा है

चल पड़ा तो हूँ ग़लत रस्ते पे वैसे बेखुदी में
रोकता था तू मुझे अब तक सुनाई दे रहा है

हौसला फिर से खड़ा है लो अँधेरों के मुक़ाबिल
शुक्रिया मौला उजाला अब दिखाई दे रहा है

एक बूढ़े जिस्म से लाखों दुआएँ झर रही हैं
एक नन्हा हाथ मुसकाकर दवाई दे रहा है

‘याद रक्खूँगा तुझे चाहे चला जाऊँ कहीं भी’
है मुझे मालूम तू क्योंकर सफ़ाई दे रहा है

दो

ये बच्चा क्या ही बच्चा है ख़ुदा का नूर पाया है
जो गुल्लक तोड़कर अपनी दवाई माँ की लाया है

ग़लत करने चले जब भी तभी अन्दर कोई बोला
सदा जिसने भी ये सुन ली क़दम पीछे हटाया है

मिले हैं ख़ूब व्यौपारी, ईमानों के वो सौदागर
मेरी गुरबत ने मुझको हर क़दम पे आजमाया है

अँधेरों ने दिए न्यौते हमें अक्सर बुलन्दी से
नफ़ा-नुकसान कब देखा उजालों से निभाया है

मुसाफिर वो कभी मंज़िल तलक पहुँचें बहुत मुश्किल
ज़रा-सी धूप से जिनका इरादा डगमगाया है

उसूलों की तरफदारी में गुजरी है उमर सारी
हवाओं ने तो की कोशिश दिया बुझने न पाया है

कोई गाता है छुप-छुप के कोई खुलकर सुनाता है
मुहब्बत गीत वो है जिसको सबने गुनगुनाया है

परिन्दे उड़ गये आकाश में ऊँचे, बहुत ऊँचे
शिकारी आज फिर जंगल से खाली लौट आया है

सफ़र में धूप कितनी हो मगर रहती है ठंडक-सी
सफ़र में साथ मेरे माँ के आशीषों का साया है
-0-