हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

द्रौपदी अब भी रोती है - डॉ.कविता भट्ट

 डॉ०कविता भट्ट
डॉ०कविता भट्ट

बाल पकड़कर मुझे घसीटा आज कहाँ रनिवास गया
सम्मान गया, विश्वास गया, आशा का प्रश्वास गया

रक्त बिन्दुओं की धारा- सा, हाय! ये सिंदूर धधकता है
जो कंगन तुमने पहनाया, वही उपहास तुम्हारा करता है

हे आर्य! अर्धांगिनी तुम्हारी विवश विलाप ये करती है
एक नारी पर कौरव शत्रु सभा आज प्रलाप ये करती है

सिंहासन सत्ता के मद का इतिहास कलुषित रोता है
किन्नर है वह स्त्री कलुषक उसमे पौरुष नहीं होता है

लाज मेरी नही, गई तुम्हारी, क्यों बैठे हो मौन धरे
चीर नही जब बचा पाए तो, फिर तुम मेरे कौन अरे !

कोई महल की वस्तु समझकर, नारी पर दाँव लगाते हो
शत्रु नहीं दोषी तुम हो, पौरुष दंभ में गोते खाते हो

धर्मराज धिक्कार पाँचों पर, जुआरियों का धर्म निभाया
स्त्री का मान सामान बना, पुरुषों ने कीच में कर्म डुबाया

भरतवंश, नारीपूजन ग्रन्थ का पन्ना काला करने वालों
चीखती द्रुपदसुता आज भी , सभ्यता का दम भरने वालो।

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