हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

धर्म शास्त्र - कृष्णा वर्मा

“माँ जल्दी से खाना लगाओ बहुत भूख लगी है” कॉलेज से लौटी बेटी ने आवाज़ लगाई।

“खाना तैयार है बेटा, जा जाकर हाथ मुँह दो ले तब तक मैं खाना परोसती हूँ।”

मुँह में कौर डालते हुए माँ की ओर ताकती हुई, “ तुम्हारी प्लेट कहाँ है, आज खाना नहीं खाना है क्या? आज फिर कोई उपवास तो नहीं रख लिया।”

बेटी की ओर पानी का गिलास बढ़ाते हुए, “सही समझी तू, आज मेरा अहोई माता का व्रत है।”

“अभी कुछ दिन पहले ही तो पापा की लम्बी आयु के लिए तुम्हारा करवाचौथ का व्रत था। अब यह व्रत किसके लिए है?”

“तुम्हारे भाई के लिए।”

बेटी उलाहना देते हुए, “क्यों माँ सारे व्रत पापा और भैया की सलामती के लिए ही करती हो।

क्या मेरी सलामती नहीं चाहिए तुम्हें? मेरे लिए तो तुमने कभी कोई व्रत नहीं किया।”

“क्या करूँ बिटिया, समाज के ठेकेदारों ने ऐसा कोई विधान ही नहीं बनाया बेटियों के लिए।”

खिन्न होते हुए बेटी बोली, “ मैं तो कभी किसी धर्म शास्त्र को नहीं मानने वाली माँ

और ना ही कभी किसी के लिए कोई करवाचौथ या अहोई का व्रत करने वाली हूँ।”

माँ नाराज़गी भरी आवाज़ में, “यह क्या अपशकुनी की बातें कर रही है।”

और जिन्होंने हमारी अपशकुनी की, उनका क्या?

विधान बनाने वालों ने कब सोचा कि बेटियों के बिना तो वह भी नहीं जन्म सकते थे इस संसार में।

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