हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

नई कलम - रेनू कुमारी

1.श्रद्धांजलि

 सच्चे लोग चले जाते हैं,

रेनू कुमारी
रेनू कुमारी

कदमों के निशाँ नहीं मिलते।

उनकी धड़कन में बसे हुए,

यादों के जहाँ नहीं मिलते।

     कितना सुन्दर सपना था वो,

     अक्सर जो देखा करते थे।

     कितना सक्षम भव्य भारत था,

     वे हरदम सोचा करते थे।

सुख व  शांति के अनमोल बीज,

जहाँ-तहाँ वे उगाकर गए।

प्रेम मार्ग सदा अपनाना,

ये सीख हमें बता कर गए।

     घृणा,द्वेष सब कुछ दूर हो,

     ऐसा जतन किया करते थे।

     क्षमादान ह़ी महादान है,

     वे यह सीख दिया करते थे।

अनेक सुनहरी पुस्तकों में,

उनके नाम दोहराए जाएँगें।

जिनकी महान गाथा सुनकर,

हम अपना शीश झुकाएँगे।

     स्वर्णिम वक़्त गुजर गया है,

     पर आगे नया जमाना है।

     दफ़न पड़े सपनों को,

     हमें अब जी कर दिखाना है

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2.तुम बहती हुई नदी बनो

तुम बहती हुई नदी बनो

ठहरा हुआ पोखर नहीं,

तुम बहती हुई नदी बनो।

मन के मलवे को बहाए,

खुद से खुद को जो मिलाए,

हकीकत को दर्प दिखाए,

सच्चाई भरी बदी बनो।

ठहरा हुआ पोखर नहीं,

तुम बहती हुई नदी बनो।

बदल जाये ज़माने का ढंग,

एक सा हो सभी का रंग,

उठे कदम,कदमो के संग,

हो अमर ऐसी सदी बनो।

ठहरा हुआ पोखर नहीं,

तुम बहती हुई नदी बनो…..

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3.ठहराव

गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव ज़रूरी है,

युग बदलेगें लेकिन खुद में बदलाव ज़रूरी है।

तरक्की का परचम लहरा रहा है आसमान में,

चाँद को भी छू रहा है आज इंसान ये।

पर अपनी धरती से भी जुड़ाव ज़रूरी है,

गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव ज़रूरी है।

मॉडर्न सोच का माहौल यूँ छा रहा है,

ये विज्ञानं वरदान नए मौके ला रहा है।

पर अपनी संस्कृति से भी लगाव ज़रूरी है,

गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव ज़रूरी है।

इंसानियत खो गयी है इस दौड़ में कहीं,

दिल से तो अब कोई सोचता ही नहीं।

इस बदलती सोच से अपना बचाव ज़रूरी है,

गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव जरुरी है

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