हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

नवगीत - डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

1- चिट्ठियाँ

अब नहीं आता गली में डाकिया
अब नहीं आतीं कहीं से
गंध भीगी
नेह के रस में पगीं
वैसी गुलाबी चिट्ठियाँ

चिट्ठियाँ ऐसी कि जिनको खोलते ही
जुगनुओं जैसे चमकते शब्द
उड़कर नाचते थे
और उनकी टिमटिमाती रोशनी में
बैठकर हम
भाग्य अपना बाँचते थे।
शब्द थे या कवि हृदय के
सहज छंद प्रबन्ध थे
हर जनम में साथ रहने के
प्रबल अनुबंध थे
उन्हीं अनुबन्धों को हर पल
ओढ़ते थे
और बिछाते थे
बैठ कर उनकी सुनहरी छाँव में
रेत के कितने घरौंदे
हम बनाते थे,

अब नहीं बनते घरौंदे
रेत के
अब न कोई बीनता है
शंख, कौड़ी, सीपियाँ।

और भी रंगों कीआती थीं
गली में चिट्ठियाँ
बोलने लगते थे आँगन
जागती थीं खिड़कियाँ।

आ गई चिट्ठी बहू के मायके से
पिता के उपदेश
अम्मा  की असीसें
विदा को कल आ रहे हैं
मझले भइया
दो दिनों के बाद हैं
सावन की तीजें

टपकता है फिर
नया छप्पर छवाना है
तेरे भैया को नए कपड़े
सिलाना है ,
अभी तीरथ को गए है
दादा  दादी
हो गई पक्की
तेरी बहिना की शादी।

ऐसे ही न जाने कितने
रंग होते थे
कुछ ग़मों के कुछ ख़ुशी के
संग होते थे,
चिट्ठियों में गाँव घर
चौपाल  होते थे।
चिट्ठियों में जगत भर के
हाल  होते थे।

चिट्ठियाँ तपती जमीं में
सर्द झोंका थीं
सारी दुनिया साफ दिखती
वो झरोखा थीं

नेट पर दिन रात बैठी
चैट करती पीढ़ियाँ
व्हाट्सएप पर
हर घड़ी संदेश करती पीढ़ियाँ
क्या समझ पायेंगी,
छुप के
चिट्ठी पढ़ने का मज़ा
पढ़ते पढ़ते  रोते जाना
रो के  हँसने का मजा

क्या बतायें हम उन्हें ऐ दोस्तो
क्यों सहेजे हम रखे हैं
अब तलक
पीले पड़ते कागजों की
कुछ पुरानी चिट्ठियाँ।
-0-

2. अम्मा

अम्मा सपने में आई थी

उनके पीछे

उड़ती-उड़ती

रंग-बिरंगे पंखों वाली

लिये हाथ में

जादू की छड़ियाँ

ढेरों परियाँ भी आई थीं ।

अम्मा बैठ गईं खटिया पर
मेरा सर गोदी में रख कर
अम्मा किस्से लगीं बाँचने
और उसी क्षण मेरे सर पर
घुमाघुमा जादू की छड़ियाँ
परियाँ सारी लगीं नाचने
घड़ी उम्र की उल्टी चल दी
मैं बन गया जरा सा बच्चा
भोलासा मासूम बहुत ही
बिलकुल सीधा बिलकुल सच्चा
अम्मा मुझको रहीं देखतीं
फिर होंठों होंठों में बोलीं
मुन्ना  क्या चिंता है तुझको
देह हुई क्यों पीली पीली
चेहरा ऐसा कुम्हलाया  है
जैसे सूखी हुई निबौली

नज़र लगी है तुझको शायद
या कुछ टोना किया गया है
किसी बुरी साया ने आकर
तेरा सारा खून पिया है
ठहर अभी बस पल भर में ही
सारा टोना झाडूंगी मैं
तेरी नजर उतारूँगी मैं
अला बला सब टालूँगी मैं
कहते कहते अम्मा ने झट
खोल लिया आँचल का कोना,
आँचल के खूँटे में अम्मा
राई – नोन बाँध लाईं थीं।

पीड़ाओं का घना हिमालय
जमा हुआ बरसों से दिल  मे
नेह ताप अम्मा का पाकर
लगा अचानक आज पिघलने
बन धारा गंगा जमुना की
नयनो में से लगा उतरने
मैं रोया जी भर कर रोया
गला रुंधा हिचकी भी आई
अम्मा ने थोड़ा दुलराया
फिर मीठी  सी डांट लगाईं
अम्मा बोलीं
सुन रे मुन्ना ,
जब भी समय बुरा आता है
गैरों की  क्या बात
स्वयम का साया साथ छोड़ जाता है
रोने धोने से  ओ बेटा
प्रश्न न कोई हल होता है ,
संघर्षो के मारग में तो
धीरज ही संबल होता है
चाहे कितनी कठिन डगर हो
तुम बस आगे बढ़ते जाना
छाले पाँवों में असंख्य हों
आँखों में आँसू मत लाना।

बहुत हो गया रोना धोना
चल बेटा मैं तुझे सुलाऊं
तेरे सर पर चम्पी कर दूँ ,
नई लोरियाँ तुझे सुनाऊँ
अम्मा लोरी लगीं सुनाने,
परियाँ जादू लगीं दिखाने
मीठे सपनों में मैं खोया
गहरी नींद बहुत मैं सोया,
बाद मुद्दतों के मुझको
इतनी भली नींद आई थी।
-0-

जन्म-19 जनवरी 1955, झाँसी

डॉ.शिवजी श्रीवास्तव
डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

शिक्षा-एम.ए.(हिन्दी),पी-एच.डी.
सृजन-1. कहानी,कविता,लेख,संस्मरण,नवगीत,हाइकु,समीक्षा,नाटक,रेडियो नाटक,टैली फ़िल्म इत्यादि अनेक विधाओं में लेखन.
2-वर्तमान साहित्य द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिताओं में वर्ष 1988,1989एवं19990 में क्रमशः जाल,मांद एवं अजगर कहानियों पर पुरस्कार।
3-ऑल इण्डिया रेडियो द्वारा आयोजित अखिल भारतीय सर्वभाषा रेडियो नाट्य लेखन प्रतियोगिता के हिंदी वर्ग में 1992 में ‘ऐसे तो घर नही बनता मम्मी’ को सर्वोच्च स्थान ।
4-हिंदी की प्रतिष्ठित लघु पत्रिका -“निष्कर्ष” में सहायक संपादक।मैनपुरी से प्रकाशित समाचार पत्रो–साप्ताहिक बलिदान एवम् रिपोर्टर टाइम्स का लम्बे समय तक सम्पादन।
5,एक कहानी संग्रह–“यक्ष -प्रश्न-“किताबघर दिल्ली से प्रकाशित।हिंदी की अनेक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में लेखन।
सम्प्रति—प्राचार्य,श्री चित्रगुप्त , पी.जी.कॉलेज ,मैनपुरी(उ.प्र.)
सम्पर्क–2,विवेक विहार मैनपुरी-205001