हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

नव वर्ष की आप सभी को शुभकामनाएँ ! - श्याम त्रिपाठी (प्रमुख सम्पादक)

सर्व प्रथम नव वर्ष की आप सभी को शुभकामनाएँ ! आओ मिल जुलकर हिन्दी चेतना को एक अच्छी ,साफ़ – सुथरी पत्रिका Shaim Tripathi-Newबनाएँ ।2016 का यह अंक नव वर्ष का पहला पुष्प है ।हमारी मंजिल बहुत दूर है ; किन्तु हमारे साथ अनेक कर्मयोगी , मँजे हुए साहित्य -प्रेमी एवं अनुभवी लेखक हैं; जिनका मार्ग-दर्शन और नि:स्वार्थ सहयोग हमें प्राप्त है । सर्व प्रथम मैं इस अंक में उन सभी महान साहित्यकारों के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ ,जिनकी कालजयी कृतियाँ इस पत्रिका की शोभा बढ़ा रही हैं ।इस अंक को पढकर एक बात से हर्ष एवं गर्व भी होगा कि पत्रिका में कुछ ऐसे हस्ताक्षरों की भी साझेदारी हो रही है ,जिन्हें समय ने ओझल कर दिया था ;किन्तु उनके हितैषियों एवं स्नेहियों ने उन्हें अपने स्मृति पटल से विस्मृत नहीं होने दिया ।उनके हिन्दी साहित्य पर बहुत से अहसान हैं ,जिन्हें हम याद करके अभिभूत हो सकते हैं ।हिन्दी चेतना इन महान व्यक्तिव व कृतित्व वाले मनीषियों के प्रति हृदय से आभारी है ।हम इन महान विभूतियों का सदा उल्लेख करते रहेंगे । इनका वरद हस्त हमारे लिए सौभाग्य की बात है । यहाँ हम महीप सिंह, रामकुमार कृषक , हिमांशु जोशी एवं कैनेडा से पंजाबी कहानीकार बलबीर सिंह मोमी से यह यात्रा प्रारम्भ करते हैं ।
हमारा प्रयास रहेगा कि इस पत्रिका के माध्यम से अतीत और वर्तमान दोनों का प्रतिबिम्ब दे पाएँ तथा हिन्दी की सभी प्रचलित विधाओं की समुचित जानकारी अपने लेखकों एवं पाठकों तक पहुँचाने में समर्थ हो सकें ।इसके स्तर को ध्यान में रखते हुए भाषा की गरिमा एवं संवेदनशीलता से न डगमगाएँ ।इस पत्रिका का उद्देश्य हिन्दी भाषा की नि:स्वार्थ सेवा एवं प्रवासी साहित्य को विश्व पटल पर पहुँचाना और साथ ही सभी के साथ मैत्री और सद्भावना का प्रसार करना ।
हिन्दी चेतना एक प्रवासी पत्रिका है, जिसका जन्म कैनेडा की धरती पर 18 वर्ष पहले हुए था और कैनेडा के ही समर्पित साहित्यकारों ने ही इसका लालन – पोषण किया था ।धीरे – धीरे इसने अतंर्राष्ट्रीय रूप ले लिया ।तदुपरांत अनेकों प्रभावशाली, कुशल साहित्यकारों के सहयोग से इसे विश्व की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में स्थान मिला; जिसके लिए हम उन सभी के हृदय से आभारी है ।
यह पत्रिका कैनेडा के साहित्यकारों का एक स्वप्न है और हम उनके इस स्वप्न को साकार करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे ।
आपसे निवेदन है कि आप इस पत्रिका की सदस्यता उदारतापूर्वक स्वीकार करें ! यह पत्रिका केवल आप सभी के सहयोग से इतनी लम्बी यात्रा पूरी कर पायी है । हिन्दी प्रचारिणी सभा इसकी जननी है ,जो एक अलाभकारी संस्था है ।
जो भी इसे दान देता है उसे टैक्स की रसीद प्राप्त होती है ।हमारा उद्देश्य हिन्दी की सेवा करना है । हम इससे कोई आर्थिक लाभ नहीं उठाना चाहते हैं । हमें ऐसे लेखक और साहित्य प्रेमी चाहिए,जो हिन्दी के लिए समर्पित हों अपनी भावनाओं को खुलकर सकारात्मक रूप से अभिव्यक्त करें ।
आज विश्व के सामने अनेकों कठिन प्रश्न हैं। आतंकवाद तो विश्व की सबसे बड़ी समस्या है- मानवता के दुश्मन धर्म के नाम पर जहाँ देखो मासूमों की जान ले लेते हैं ।अनेकों देश इन अत्याचारियों को शरण देते हैं , उनको पैसा देकर , उनके पास नये -नये हथियार दिलवाकर अवसर पाते ही अपने दुष्कर्मों से किसी भी देश की शान्ति भंगकर देते हैं । दुनिया को भयभीत त्रस्त किया हुआ है। कोई भी कहीं भी सुरक्षित नहीं है ।चारो ओर त्राहि- त्राहि मची हुई है ।भारत तो हर दिन अपनी सीमा पर अनेक अवरोधों का रोज प्रतिकार करता है। 2011 में मुम्बई में पाकिस्तान के आतंकियों ने सैकड़ों लोगों को गोलियों से उड़ा दिया । अभी – नवम्बर में पैरिस में जो आतंकवाद का तांडव देखा गया , दुनिया थर्रा गई ।नये वर्ष के प्रारम्भ में ही पठानकोट जो वायु रक्षा स्थल पर पाकिस्तान के आतंकवादियों ने जो किया, वह अमानवीयता और निर्लज्जता की पराकाष्ठा है ,मित्रता के नाम पर कलंक है ।आज हमें ऐसे साहित्य की आवश्यकता है कि जो इस समस्या का समाधान कर सके ।
शायद हमारे देश में हमारी मौलिक परम्पराएँ टूट रही हैं ।हम अपने अतीत से दूर भाग रहे हैं ।हमने पाश्चात्य संस्कृति को इतना ओढ़ लिया है कि हमें कुछ भी दिखाई नहीं देता है ।भौतिकता और नई- नई खोजों ने इंसान को एक बेजान मशीन की तरह बना दिया है ।उसमें सहनशीलता, सवेदनशीलता और मानवता विलीन होती जा रही है ।स्वार्थ,दम्भ, आत्म प्रशंसा व अपनी ख्याति ने सब कुछ पीछे धकेल दिया है । हमें आज एक ऐसे साहित्य की आवश्यकता है, जिससे देश में मैत्री और स्नेह और भाई-चारे की भावना जाग्रत हो ।
नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित
श्याम त्रिपाठी प्रमुख सम्पादक