हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दोहे - हरेराम समीप

हरेराम समीप
हर औरत की जिन्दगी एक बड़ा कोलाज
इसमें सब मिल जाएंगे हम तुम देश समाज

करती दुख, अपमान से, जीवन का आग़ाज़
औरत के सपने यहाँ, टूटें बेआवाज

कब तक समझौते करें, कब तक धारें धीर
बद से बदतर हो गयी, औरत की तकदीर

जाने कैसी चाह ये, जाने कैसी खोज
एक छाँव की आस में ,चलूँ धूप में रोज

मैं कब तक उससे मिलूँ, अपनेपन के साथ
अपनेपन की खाल में, जो करता आघात

पता नहीं कैसे रहे, हम जीवन भर साथ
मैंने अपनी बात की, तूने अपनी बात

अश्क गिरे, होते रहे, माटी में तहलील
धीरे धीरे यूँ मरी, आशाओं की झील

यूँ तो वह सब कुछ दिया जो था उसे पसंद
लेकिन पिंजरे में रखा करके उसको बन्द

तुम तो कह कर सो गये, रात नशे में बात
मेरी आँखों में जगे, झूठे इल्ज़ामात

मैं पीड़ा से करवटें, बदलूँ सारी रात
वहीं पड़े पतिदेव जी, खर्राटों के साथ

किसे सुनाती फिर रही, अपने दर्द, कराह
नहीं रही जिसको कभी, तेरी कुछ परवाह

मैंने रोका भी बहुत, दीं कसमें भी लाख
लेकिन वो कर ही गया, मेरा जीवन राख

इतना प्यार जताएगा, तुझको वो मग़रूर
तुम्हें खुदकुशी के लिए, कर देगा मजबूर

सम्बंधों के बीच में, किसने किया प्रवेश
कहने सुनने को नहीं, छोड़ा कुछ भी शेष

चलो एक चिट्ठी लिखें, आज वक्त के नाम
पूछें दुख का सिलसिला, होगा कहाँ तमाम

आखिर हमसे हो गयी, ऐसी कैसी चूक
बता वक्त! तू क्यों करे, इतना बुरा सलूक

दाँत पीसते यूँ मुझे, घूर रहा है वक्त!
जैसे मुझको मार कर, पी जाएगा रक्त

बड़ा विसंगत वक्त यह, सोच हृदय से हीन
हँसते हुए फ़रेब हैं, रोते हुए यक़ीन

सदियों से होता रहा, हम पर अत्याचार
वक्त तमाशाई रहा, आदत के अनुसार

अब धीरज की आँच पर, खौल रहा है रक्त
क्रांति टालने वास्ते, नहीं बचा है वक्त

सहज, सरल होते नहीं, जीवन के अंदाज़
ठीक रहा जब साज़ तो, बैठ गई आवाज़
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