हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

निर्वासन - सुदर्शन रत्नाकर

वह दो दिन के बाद घर लौटे ।टीनू और मीकू उनकी टाँगों से आकर लिपट गए ।उन्होंने दोनों को प्यार किया और

सुदर्शन रत्नाकर
सुदर्शन रत्नाकर
फिर अपने कमरे की ओर जाने लगे ,तभी ममता ने कहा, ” बाबूजी, आपका बैड और सामान गैराज में लगा दिया है ।किट्टी कई दिन से कह रही थी कि उसे अलग से कमरा चाहिए, वह नानी के साथ नहीं सोएगी । आप सारा दिन तो बाहर ही रहते हैं,सोना ही तो होता है, वैसे भी बच्चे धमाचौकड़ी मचाते रहते हैं ।रात को आप डिस्टर्ब हो जाते हैं ।गैराज में आप आराम से सो पाएँगे ।कोई असुविधा नहीं होगी ।” कह कर ममता अपने कमरे में चली गई ।
वह थोड़ी देर के लिए वहीं स्तब्ध खड़े रहे ।उनकी समझ में नहीं आया ।यह सब कुछ अचानक कैसे हो गया।विकास कई दिन से उनसे बात करना चाहता था ।शायद यही बात थी,वह कर नहीं पाया और ममता ने यह कार्य कर के ही बता दिया । वह अपना बैग लेकर गैराज में आ गए ।इतने बड़े कमरे का सामान छोटे से गैराज में अटपटे तरीक़े से लगा हुआ था ।उन्होंने बैग एक ओर रख दिया और पलंग पर आँखें मूँदकर लेट गए ।थकावट से बदन टूट रहा था ।रास्ते में उन्हें चाय पीने की इच्छा हुई थी,सोचा घर में सब के साथ पिएँगे ,बाद में खाना खाएँगे । पर इस समय न चाय पीने की इच्छी रही ,न खाना खाने की।किसी समय में इसी गैराज में उनका ड्राइवर रहता था, उसके लिए उन्होंने एक छोटा सा बाथरूम बनवा दिया था ।बैठने भर के लिए टॉयलेट सीट और खड़े होकर जिसमें नहाया जा सकता है ।बेमन से उठ कर वह बाथरूम में फ़्रेश होने के लिए चले गए ।
किट्टी ने आकर कहा,”दादाजी खाना तैयार है,आइए खा लीजिए ।”
“तुम सब खा लो ,मुझे भूख नहीं है।हाँ, मैं सोने जा रहा हूँ,विकास आए तो कहना मुझे जगाएगा नहीं ।” किट्टी ने दुबारा कुछ नहीं कहा ।उसे पता है,दादाजी ने एक बार कह दिया तो फिर वह उस बात पर स्थिर रहते हैं ।खाना नहीं खाने को कहा है तो,अब नहीं खाएँगे इस लिए और कुछ पूछे बिना वह चली गई ।
उन्होंने उठ कर दरवाज़ा बंद करके चिटकनी लगा दी और आकर फिर पलंग पर लेट गए ।कमरे में चारों ओर सूनापन था ।दीवारें ख़ाली और पीले रंग की बोरियत फैली थी ।उनके अपने कमरे में जीवन जैसे लहलहाता रहता था ।पुस्तकें,पेंटिंग्सस,फ़ोटो ,समय समय पर मिलीं स्मारिकाएँ,अवार्ड्ज़,सब के सब ममता ने पता नहीं कहाँ डंप करके रख दिए हैं ।उन्होंने ध्यान लगा कर सोने का प्रयत्न किया ,पर नींद उनसे कोसों दूर थी ।मन डूबने -सा लगा ।उदासी उन्हें घेरने लगी ।रह रहकर एक हूक -सी उनके ह्रदय में उठती ।ऐसी स्थिति उनकी तब हुई थी,जिस दिन उमा उनका साथ छ़ोड़ गई थी ।जीवन के पूरे पचास वसंत-पतझड़ उन्होंने एक साथ देखे थे ।उन्नीस वर्ष की उमा और चौबीस वर्ष के वह थे जब दोनों प्रणय सूत्र में बँधे थे ।दोनों ने अपनी शिक्षा विवाह के पश्चात पूरी की थी और फिर जीवन की गाड़ी जो पटरी पर चली तो चलती ही गई ।कई स्टेशन तो आए पर गाड़ी फिर निर्बाध गति से चलने लगती ।आपसी सामंजस्य के कारण कभी कोई तर्क-वितर्क नहीं ।एक की इच्छा दूसरे ने पूरी की और यदि एक ग़ुस्से में है तो दूसरा शांत रहा ।एक दूसरे की भावनाओं का दोनों ने सम्मान किया । न उनमें पुरुष होने का अंह था और न ही उमा में कोई त्रिया चरित्र वाली बात थी। परिवार को बाँधकर रखने की उसमें अद्भुत शक्ति थी,तो रिश्तों को कैसे सम्भाल कर रखा जाता है,निभाया जाता है,उसमें कमाल का जादू था ।ससुराल और मायका दोनों को उसने एक समान प्यार और सम्मान दिया ।घर गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाने के बाद उसने यह मकान बनवाया था,बिना किसी प्रकार का रृण लिए और जब वे इस मकान में रहने के लिए आए तो यह एक सुंदर घर बन गया था जहाँ विकास और विभा की किलकारियाँ गूँजती रहती थीं।

वह एक बड़ी कम्पनी में मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर थे ।काम से फ़ुर्सत ही नहीं मिलती थी ।उमा नौकरी करने के बाद भी घर की सारी ज़िम्मेदारियों को पूरा करती ।वह कई बार सोचते थे,सोचते ही नहीं उमा का हाथ बटाने का प्रयत्न भी करते पर वह हमेशा हँसकर मना कर देती ।” आप बाहर के काम देखिए,घर के काम मैं देख लूँगी ।” वह पूछते
“तुम भी तो नौकरी करती हो,इतना समय कैसे निकाल लेती हो ?”
वह कहती,” आपका प्यार और विश्वास का जादू जो है मेरे पास ।आपने कह दिया, आपके मन में यह एहसास है, मेरे लिए यही बहुत है।”
ऐसे ही एक दूसरे के लिए एहसासों के सहारे सब कुछ चलता रहा ।विभा का विवाह हो गया ।दो वर्ष बाद वह अपने पति कमल के साथ विदेश में जाकर बस गई ।पहले वह कम्पनी की ओर से गया था; लेकिन बाद में उसने उस कम्पनी को छोड़कर वहीं की किसी कम्पनी में नौकरी कर ली ।विभा का विदेश में जाकर बसना उमा को कभी भी अच्छा नहीं लगा ।वह हमेशा कहती थी, ” सुनोजी, अपने देश में क्या नहीं ,जो बच्चे चंद सुविधाओं के लिए अपनों को छोड़कर दूर चले जाते हैं ।एक दो वर्ष बाद आना, कुछ दिनों के लिए मिलना,अपनी मिट्टी, अपनी परम्पराओं से, अपनों से दूर रहना भी कोई रहना होता है। भावनाएँ ही मर जाती हैं इनकी ।आप कुछ करें न, जो बच्चे वापिस आ जाएँ ”

वह कहते ,” हमें कुछ नहीं करना उमा ।वे बड़े हैं,अपना भला बुरा जानते हैं, फिर हम कैसे कह सकते हैं ,यह कमल के परिवारवालों को सोचना है,न कि हमें ।हमने विवाह कर दिया है, अब उसका वही परिवार है ।उन्हें कहाँ रहना है यह उनकी अपनी सोच है।विकास का विवाह होगा तो हमारी बहू हमारे पास रहेगी ।वह विभा की कमी को पूरा कर देगी ।असल में बेटी तो वही होगी ।अपनी बेटियाँ तो परायी हो जाती हैं, ससुराल जो चली जाती हैं।”
उमा मोह की भावना में बह जाती थी ;जबकि ऐसी बातें तो वह स्वयं ही बताती रहती थी ।वह जब उसे समझाते तो वह मोह के जाल से बाहर निकल आती ; पर ये बंधन ही ऐसे होते हैं, जो छूटते ही नहीं ।समय के साथ पकड़ और मज़बूत होती जाती है ।विकास जब छोटा था तो वह हर समय विभा के साथ चिपका रहता था ।वह उससे सात वर्ष छोटा था ।विभा उसका ध्यान भी रखती और उसके साथ खेलती भी थी ।पर उसके विवाह के पश्चात वह अकेला रह गया ।अब उसका केन्द्र माँ हो गई थी ।वह उनसे बातें तो कर लेता था पर अपनी माँगें वह माँ के सामने रखता।उनसे कुछ माँगने में वह झिझकता था,डरता भी था,जबकि उन्होंने सदैव ध्यान रखा कि उनका कठोर व्यक्तित्व उनके कार्यक्षेत्र तक ही सीमित रहे, वह उसे घर के वातावरण पर हावी नहीं होने देना चाहते थे ।न कभी उमा को एहसास होने दिया,न ही बच्चों को ही ।फिर विकास के मन में जाने कहाँ से भय बैठ गया था ।उमा ने उसे समझाया भी था,पर वह उस ग्रन्थि को निकाल नहीं पाया ।
ममता से उसका विवाह उन्होंने बड़े चाव से किया था ।उमा
कुछ अधिक ही उत्साहित थी ।हर माँ की बेटों के विवाह की ऐसी ही कुछ कामनाएँ, भावनाएँ होती हैं ।विभा भी विवाह में शामिल होने के लिए आई थी,दो मास तक रही ।ममता से वह अच्छी तरह से घुलमिल गई थी ।उसके जाने से पहले ही ममता ने कहा था कि वह अपनी मम्मी को अपने साथ रखना चाहती है ; क्योंकि उसके सिवाय उनका और कोई नहीं ।वह बीमार भी रहती हैं।वह उनकी देखभाल भी कर लेगी और हम सब के बीच रह कर उनका मन भी लगा रहेगा ।
इस बात को लेकर उन चारों के बीच मंत्रणा हुई थी । विकास कुछ नहीं बोला था । हाँ, उन्होंने दबी आवाज़ में विरोध अवश्य किया था ।घर के वातावरण में परिवर्तन आ जाएगा,प्राइवेसी नहीं रहेगी । दो अलग अलग परिवारों से आए लोगों के विचारों में अंतर होता है । ममता तो अब उनके परिवार की हिस्सा थी । प्रत्येक लड़की ससुराल में आकर उस परिवार के अनुसार ढलती है । हर अच्छी-बुरी बात तथा रिश्तों को स्वीकारती है । कुछ अपनी कहती है ,कुछ दूसरों की सुनती है । बड़ी होते ही स्वाभाविक रूप से वह सोचने लगती है । विवाह के पश्चात उसे ससुराल नए घर में अर्थात् अपने घर में जाना है । यही सोच,पति का प्यार,ससुराल के सदस्यों का स्नेह, सहयोग उसे नए घर में सामंजस्य बिठाने में सहयोग देते हैं । लेकिन ममता की मम्मी यह सब नहीं कर पाएँगी । उन्हें स्वयं ही झिझक रहे गी ।उनकी ओर से छोटी- सी ग़लती भी उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचा सकती है,उनके स्वाभिमान को चोट लग सकती है ।

उमा ने इन सारी बातों को नकार दिया था । “कुछ नहीं होगा जी,सब कुछ ठीक ही रहेगा । मैं उनका ध्यान रखूँगी।विकास और ममता अपने में ही मस्त रहेंगे । आप अपने कामों में व्यस्त रहते है । अच्छा है मुझे उनका साथ मिल जाएगा ,तो समय भी अच्छा कट जाएगा ।इतना बड़ा घर है,जगह की भी कोई कमी नहीं ।वह विभा के कमरे में रह लेंगी ।वह अब जाएगी तो एक वर्ष से पहले क्या आएगी ।जब फिर आएगी तो देख लेंगे ।गेस्टरूम है न ।उन दिनों विमला जी वहाँ रह लेंगी ।कुछ दिन सीढ़ियाँ चढ़ना ही होगा।”

उमा ने दिल खोल कर उदारता दिखाई थी ,दिखाई ही नहीं उसने अपनी बात को पूरा कर के दिखाया था ।ममता से अधिक वह उसकी मम्मी का ध्यान रखती थी । उनसे बहनों ,सखियों जैसा व्यवहार करती ।घर में उसे कभी परायपन का एहसास नहीं होने दिया ।सभी के काम पर चले जाने के बाद वे सारा दिन एक साथ बितातीं ।शाम के समय पार्क में चली जातीं। उमा बाज़ार भी उनको साथ ले जाती ।कुछ ही मास के बाद वह पहले से स्वस्थ हो गई थीं ।ममता तो जैसे अपनी माँ की ज़िम्मेवारियों से मुक्त हो गई थी ।
विभा आती- जाती रही ।विमलजी उसी कमरे में रहीं ।विभा गेस्टरूम में सोती । कभी वह वहाँ चले जाते और विभा उनके कमरे में माँ के साथ रहती ।इसी तरह बरसों बीत गए ।इस बीच किट्टी का जन्म हुआ ।उसके पाँच वर्ष बाद टीनू और फिर मीकू का ।अभी तक किट्टी -टीनू नानी के साथ सोते थे ।मीकू मम्मी-पापा के साथ ।कई महीनों से टीनू और मीकू गेस्टरूम में सोने लगे थे ।किट्टी अभी भी नानीके साथ उनके कमरे में सोती थी ।वह अलग सोना चाहती थी ।किट्टी ,टीनू के साथ नहीं ।उसे अलग रूम चाहिए ।वह जब भी कहती ,बात आई गई हो जाती ।

उस दिन उनके विवाह की पचासवीं वर्ष गाँठ थी ।दोनों घर से दूर कहीं एकांत स्थान पर खुशी के इन क्षणों को बिताना चाहते थे ।जैसे विवाह के पहले कुछ वर्ष वे सालगिरह मनाते थे ।वह दिन केवल उनका अपना दिन होता था ।पर बच्चों ने चुपके -चुपके अपना ही प्रोग्राम बना लिया था और उन्हें भनक तक नहीं लगने दी ।यहाँ तक कि निमंत्रण पत्र भी बाँट दिए।होटल में पार्टी का आयोजन भी कर दिया ।वे दोनों तो शायद चले भी गए होते ,यदि विभा अचानक न आई होती तो ।कोई पूर्व सूचना नहीं दी उसने ।विकास उसे एयरपोर्ट से घर लेकर पहुँचा तो वे अचम्भित हो गए ।उन्होंने अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया ।विभा उस बार कई वर्षों के बाद आई थी ।अपनी घर गृहस्थी, नौकरी की चक्की में पिसती वह हर बार न आने के कई कारण वह माँ को फ़ोन पर बताती और उमा मन मसोसकर रह जाती ।वह उनसे शिकायत करती,” देखते हो न,तभी मैं कहती थी,विदेश में सेटल न हो ।आप ने भी नहीं समझाया ।सूरत देखने को भी तरस जाती हूँ ।यहाँ रहती तो दो चार दिन के लिए ही आ जाती ।”
माँ की ममता थी ।वह क्या कहते ।मुस्करा कर देखते और फिर किसी बहाने से काम में लग जाते ;क्योंकि भीतर से कहीं विभा का दूर जाना उन्हें भी खटकता था मिलने को मन छटपटाता था ।
विभा के आने से सारा घर महक उठा था ।सालगिरह के दिन उन्होंने हवन करवाया ।शाम के समय विभा ने माँ को स्वयं तैयार किया और कहा कि आज खाना खाने बाहर जाएँगे। होटल में पहुँच कर उन्हें कार्यक्रम का पता चला था ।विवाहोत्सव की तरह ही मंच सजा हुआ था जहाँ दोनों ने एक दूसरे को जयमाला पहनाई थी ।कुछ विचित्र तो लग रहा था पर सबसे मिल कर खुशी भी हो रही थी ।सिल्वर जुबली जब मनाई थी वह समय और था ।यह सब उसके पच्चीस वर्ष के बाद हो रहा था ।उम्र की इस दहलीज़ पर वर- वधू की तरह का व्यवहार ,पर उमा ख़ुश थी और यह खुशी उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी ।
रात देर तक पार्टी चलती रही।घर पहुँचते पहुँचते एक बज गया था । सब सोने चले गए ।बहुत दिनों के बाद अपने परिवार तथा मित्रों-सम्बंधियों के साथ उन्होंने यह दिन मनाया था ।बस यही कुछ क्षण जीवन की धरोहर बन जाते हैं ।हमारी स्मृतियों में बने रहते हैं,ताज़ा रहते हैं।सच ही कहा जाता है,वर्तमान ही अपना होता है अतीत दुख दे तो भूल जा ।भविष्य के लिए वर्तमान को मत न्योछावर करो ।जो क्षण सामने है ,उसमें जियो ।उन्हें भी अच्छा लगा था ।शायद बाहर जाकर वह इतना प्रसन्न नहीं होते ।वह पचास वर्ष पीछे लौट गए थे ।कितनी ही स्मृतियों की गाँठें खोली उन्होंने ।जीभर कर उमा से बातें कीं ।आकाश में सोन पक्षी की आवाज़ सुनाई दी तो वह सोए।अभी थोड़ी ही देर आँख लगे हुए हुई थी कि उन्हें उमा के कराहने की आवाज़ सुनाई दी ।उसका एक हाथ वक्ष पर था ।शायद वह डर गई थी, उन्होंने उसका हाथ हटा दिया ।वह ठंडा था ।उमा के कराहने की आवाज़ अब भी आ रही थी ।उन्होंने उसे झकझोरा,आवाज़ दी पर उसने कोई उत्तर नहीं दिया ।उन्होंने फ़ोन कर के विभा और विकास के बुला लिया ।सभी घबरा कर उनके कमरे में आ गए ।विकास ने फ़ोन कर डाक्टर को बुला लिया लेकिन जब वह पहुँचा उमा ने अंतिम साँस पहले ही ले ली थी ।न उसने आँखें खोलीं न मुँह से कुछ कहा । बस अपने भरे -पूरे परिवार से विदा हो गई और उन्हें शेष बची उम्र के लिए अकेला छोड़ गई ।ऐसे भी भला कोई अचानक चला जाता है ।जीवन भर उसने उन्हें हर तरह का सुख दिया,स्वयं दुख सहे लेकिन उन दुखों की हवा को भी उसने छूने नहीं दिया ।वह स्वयं कहती थी ।आदमी चला जाए तो औरत परिवार को सम्भाल कर, जैसे भी हो जीवन जी लेती है लेकिन औरत के बिना आदमी अधूरा हो जाता है ।औरत की निर्भरता उसे पंगु बना देती है ।

बस उमा भी उन्हे पंगु बना कर चली गई ।अपने कार्यकाल में ऑफ़िस में वह कठोर अनुशासन के लिए जाने जाते थे ।इतनी बड़ी कम्पनी तो वह सम्भालते रहे लेकिन उनसे अपना घर नहीं सम्भल पाया ।वह अनुशासन अपने तक ही सीमित होकर रह गया ।वह अकेले न पड़ जाएँ ,विभा वापिस नहीं गई ।वह दो सप्ताह के लिए आई थी लेकिन दो मास बाद लौटी ।इस बीच उसने उनका पूरा ध्यान रखा ताकि उन्हें उमा की कमी अधिक न खले ।पर वह भी कितना समय रुक सकती थी,उसे भी अपने घर जाना था ।कल तक जो स्वयं बच्ची थी ,उन्हें बच्चों की तरह समझाती रही ,” पापा खाना समय पर खा लेना।मेड से अपना कमरा साफ़ करवाते रहना,घूमने जाना ।ममता के कामों में हस्तक्षेप मत करना ।” पता नहीं कितनी हिदायतें देकर चली गई ।उन्हें घर और भी ख़ाली ख़ाली सा लगने लगा ।कई दिन तक वह सम्भल नहीं पाए ।
उमा घर को सुचारू रूप से चलाती थी ।सारे घर को बाँध कर रखा हुआ था उसने ।ममता भी उसके कहे अनुसार चलती थी ।उसकी मम्मी भी खुले तौर पर कोई हस्ताक्षेप नहीं करती थी ।उमा के बाद कुछ समय तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा ।विकास और ममता नज़र की शर्म रखते थे जैसा वह कहते,वैसा ही करते ।कोई भी काम करना होता उनसे पूछ लेते थे ।लेकिन धीरे धीरे उन्हें लगने लगा कि रिश्तों में सेंध लगनी शुरु हो गई है

उनकी आरम्भ से ही दिनचर्या रही थी कि वह साँझ में ही खाना खा लेते थे । ममता ने पहले तो इस बात का ध्यान रखा ;लेकिन धीरे धीरे समय बढ़ता गया ।रात के नौ -दस बजे जब सब खाना खाने बैठते, विकास या किट्टी उन्हें बुलाने आते ।खाने की वस्तुओं में भी परिवर्तन आ गया था अब उनकी पसंद की चीज़ें टेबल पर कम आने लगीं । मेड भी सारे घर का काम निबटाकर उनके कमरे की ओर रुख़ करती।बस ऐसे ही छोटी छोटी बातों से उन्हें एहसास होने लगा था कि वह एक अनचाही वस्तु की तरह होते जा रहे हैं ।विभा उन्हें समझा गई थी ;इसलिए वह कुछ नहीं कहते थे ।पर सब से बड़ी बात जो उन्होंने अनुभव की,वह थी विमलाजी का अपने कमरे से निकल कर पूरे घर में छा जाना ।उमा के रहते वह स्वयं को एक सीमित दायरे में रखती थीं पर इधर उन्होंने देखा वह पंख फैला कर उड़ने लगी हैं ।ममता,बच्चों यहाँ तक कि विकास पर भी उसका प्रभाव पड़ रहा है ।घर की मालकिन ममता न होकर वह अधिक दिखाई देने लगीं ।शुरू में उन्होंने सोचा,जो काम उमा करती थी,वह कर रही हैं ।बच्चों के सिर पर बड़ों का साया रहे, अच्छी बात है । विकास की माँ न सही ममता की मम्मी घर सम्भालने में सहायता कर रही हैं ।पर उन्होंने देखा ममता गौण होती जा रही है ।घर पर विमल जी का अनुशासन चलने लगा था और उनका अपना अस्तित्व तो कहीं विलीन ही होता जा रहा था ।सभी अपनी मनमानी करने लगे थे ।बच्चे भी पहले जैसे नहीं रहे ।उनके रहन-सहन और आदतों में परिवर्तन आ रहा था उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगता था ।एक दो बार उन्होंने टोका भी ;लेकिन विमला जी ने बच्चों का पक्ष लेकर उन्हें मनमानी करने की शय दे दी ।विकास भी उनसे नज़रें चुराने लगा था । घर में शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखने के उन्होंने छोटी छोटी बातों को नज़र अंदाज़ करना शुरु कर दिया और अपने कामों में व्यस्त रहने लगे ।उन्होंने अपनी दिनचर्या बदल दी और उनका अधिकतर समय बाहर ही व्यतीत होने लगा था ।
उन्होंने देखा बारह बज गए थे ।यादों में ऐसे खोए कि समय का आभास ही नहीं हुआ ।उनका मन विचलित हो रहा था ।अभी नींद भी नहीं आ रही थी ।आ भी कैसे सकती थी ।वह राजा से एकदम रंक हो गए थे ।उनके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँची थी ।विकास या ममता उनसे बात करते तो शायद इसका कोई समाधान निकाल भी लेते ।लेकिन उन्होंने तो बिन बताये,बिन पूछे ही उन्हें कमरे से निकाल कर गैराज में पहुँचा दिया । बड़े कमरे से किसी छोटे कमरे में शिफ़्ट करते तो शायद वह परिस्थिति से समझौता भी कर लेते ।उन्हें उमा की बहुत याद आने लगी ।वह होती तो ऐेसी स्थिति आती ही नहीं ।उनके मानस -पटल पर कई कई स्मृतियाँ उभर आईं और वह उन्हीं में खोए सो गए।
सुबह वह प्रतिदिन की भाँति उठे ।वह बैड टी लेते थे ;लेकिन आज नहीं ले पाए ।बरसों के बाद उनका यह रूटीन टूटा था ।सुबह की चाय वह स्वयं बनाते थे और उमा को भी पिलाते थे ।उसे उनका चाय बनाना अच्छा नहीं लगता था ,पर वह कहते थे यह कहाँ लिखा है कि केवल पत्नी ही किचन में काम करे ।उन्हें उमा के काम करना सदैव ही अच्छा लगता था और सुबह चाय बना कर पिलाने से दिन भर वह आत्मसंतोष से भरे रहते थे ।वह आज चाय पिए बिना ही पार्क में चले गए ।सैर की ,मित्रों से मिले ।वापिस आकर नहाए-धोए ।तैयार होकर वह भीतर गए ।सभी उठ गए
थेऔर अपने अपने काम में लगे हुए थे उन्होंने अख़बार पढ़ते पढ़ते ममता को नाश्ता लगाने के आवाज़ लगाई,विकास कमरे से बाहर आ रहा था पर उसने उनसे नज़रें नहीं मिलाईं ।जाते -जाते गुडमार्निंग कहकर दूसरी ओर चला गया ; लेकिन उन्होंने अपने व्यवहार से किसी को यह आभास नहीं होने दिया कि उनकी आत्मा कितनी छलनी हो गई है ।सदैव की तरह उन्होंने बच्चों से बात की नाश्ता लिया और बाहर चले गए ।जाते हुए वह कह गए कि वह देर से लौटेंगे और खाना नहीं खाएँगे ।किसी ने भी उनसे कारण नहीं पूछा ।
एक सप्ताह ऐसे ही निकल गया ।वह सुबह जाते और रात को आकर खाना खाते और गैराज़ में चले जाते ।सब कुछ पूर्ववत् चलने लगा था । पर अब उनके बीच संवाद कम हो गया था,न ही उन्होंने विकास से कुछ कहा था और न ही विकास या ममता के चेहरे पर उन्होंने पश्चात्ताप की भावना देखी ।हाँ ,विमलाजी की आवाज़ पहले से ऊँचीं हो गई थी । बच्चे भी उनके पास मँडराते दिखते ।उनसे तो अब वह औपचारिकता भर निभाते थे ।जबकि यही बच्चे उनके और उमा से अलग नहीं होते थे ।उन्होंने अपने किसी भी व्यवहार में नाराज़गी नहीं दिखाई । उनके हृदय में एक टीस -सी उठती थी निर्वासन की पीड़ा को उनसे अधिक और कौन जान सकता था पर वह अपनी भावनाओं पर क़ाबू पा लेते थे ।
दूसरा सप्ताह भी इसी प्रकार इसी प्रकार बीत गया ।बच्चों की चार दिन की छुट्टियाँ एक साथ पड़ गईं ।सबने कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बना लिया ।औपचारिकता वश विकास ने उन्हें साथ चलने के कहा ;पर उन्होंने मना कर दिया ।कहा,”मुझे कुछ काम है,तुम लोग जाओ ।” विमलाजी उनके साथ गईं ।
उनके जाने के पश्चात पहले दिन उन्होंने अपने कमरे में जीभर कर आराम किया ।किट्टी ने उसे अपनी पसंद से सजा लिया था ।उनका सामान तो कमरे से निकाल दिया गया था ;पर उमा और उनकी यादों को वहाँ से नहीं निकाल सके।चालीस वर्ष उन्होंने उमा के साथ इसी कमरे में बिताये थे।उसकी हँसी,उसकी बातें अभी भी इस कमरे में गूँजती हैं ।उसके जाने के बाद के नितांत अकेले बिताये पल भी उनके सामने से गुज़र गये । विभा,विकास की किलकारियाँ ,उमा द्वारा गायी गईं लोरियाँ भी उन्हें सुनाई देती रहीं ।माँ की गोद की तरह इस कमरे ने उन्हें अपनी गोद में सुलाया था ।वह भावुक होकर रोने लगे ।दो सप्ताह से दबा दर्द का लावा भीतर से फूट पड़ा था ।उन्होंने जी भर कर स्वयं को रो लेने दिया ।फिर उन्हें एहसास हुआ, कोई उनके सिर को छू रहा है ,सहला रहा है ।यह स्पर्श उमा के हाथों का था ।वह जैसे कह रही हो, “सुनो जी,आप इतने कमज़ोर तो नहीं थे जो इस तरह निराश हो रहे हो और अपने अधिकार को छोड़ रहे हो ।यह घर हमारा है, परिवार हमारा है ।बच्चे ही तो हैं ,गलत रास्ते पर चलें ,तो उन्हें आपको ही तो सम्भालना है ।”उनके परेशान होने पर उमा ऐसे ही तो उन्हें सांत्वना देती थी । वह कुछ सम्भल गए ।उठ कर वाशरूम में गए ।उसके बाद शांत चित्त सो गए ।
दूसरे दिन सुबह उठे तो स्वयं को बहुत हल्का महसूस कर रहे थे ।उन्होंने खिड़की से पर्दा हटा दिया सूर्य की किरणों से कमरा उजास से भर गया ।ऐसा ही उजास उनके मन में भरा था ।यह सुबह उनके लिए नया संदेश लेकर आई थी ।उमा का वह अनछुआ जादुई स्पर्श वह अब भी अनुभव कर रहे थे । कई दिनों के बाद किचन में जाकर उन्होंने चाय बनाई ।अपने घर के छोटे से लॉन में जाकर बैठ गये जैसे वह उमा के साथ बैठा करते थे ।समाचार पत्र पढ़ कर वह कार से बाहर चले गए

थोड़ी देर में वह एक मज़दूर को साथ लेकर आए ।दो घंटे में ही उन्होंने घर का नक़्शा बदल दिया ।अपना सारा सामान गैराज़ से उठवा कर उन्होंने अपने कमरे में रखवा दिया साथ में टीनू ,मंकी का सामान भी गेस्टरूम से उठवाकर वहीं रखवा दिया ।विमलजी का सामान गेस्टरूम में और किट्टी का सामान विमलजी के कमरे में ।यह सारी अदला- बदली कुछ सोचकर ही उन्होंने की ।टीनू- मंकी उनके साथ रहेंगे तो उनका दिल लगा रहेगा ।बच्चे तो सारे ग़म भुला देते हैं ।किट्टी को भी अपनी पसंद का कमरा मिल जाएगा ।पहले भी तो नानी के साथ इसी कमरे में रहती थी ।हाँ, सबसे अधिक कठिनाई तो विमलजी को होने वाली थी क्योंकि गेस्टरूम ऊपर था पर कुछ सोचकर ही उन्होंने ऐसा किया था ।सभी बच्चे उनकी नज़रों के सामने रहेंगे और विमलजी बार बार सीढ़ियाँ उतर कर नीचे नहीं आ
पाएँगी ।इस प्रकार उनकी दख़लअंदाज़ी भी कम हो जाएगी ।बच्चों का सारा सामान तो उन्होंने इधर उधर कर दिया लेकिन विमलजी की अल्मारी का सामान उन्होंने नहीं रखवाया,वह स्वयं ही रख लेंगी ।
दोपहर तक सारी सेटिंग हो गई मज़दूर से थोड़ा बहुत और काम करवा कर उसकी छुट्टी कर दी और स्वयं नहा धोकर,खाना खाकर वह निश्चिन्त होकर सो गए ।कई दिन से अवसाद के बादल जैसे छँट गए थे।
दो दिन बाद सब लौट आए ।उससे पहले उन्होंने बाई से सारे घर की सफ़ाई करवा दी ।खाना भी बनवाकर रख दिया ।बच्चों के लिए उनकी पसंद की बहुत सारी चीज़ें ले आए थे दोपहर से पहले ही वे सब घर पहुँच गए थे । थकावट के बावजूद सबके चेहरे चहकते नज़र आए ।प्रतिदिन की दिनचर्या से हटकर घूमने में अपना ही आनन्द होता है।
सबको भूख लगी थी,खाना तो तैयार ही था ।उन्होंने ममता से मेज़ पर खाना लगाने के लिए कहा ।विमलजी बोलीं,”ममता तुम रहने दो मैं लगाती हूँ।”ममता के कुछ कहने से पहले ही वह बोले,”नहीं विमलजी आप बैठिए खाना ममता लगाएगी ” उनकी आवाज़ में दृढ़ता थी ।विमलजी वहीं चुपचाप बैठ गईं । वह भी अपनी चेयर पर आकर बैठ गए ।कई दिनों के बाद उन्होंने एक साथ बैठकर खाना खाया । खाना खाते हुए वह बच्चों से उनकी यात्रा के बारे पूछते रहे ।विकास भी बताता रहा ।उसका भी जैसे बचपन लौट आया था ।
खाना खाकर विमलजी अपनी अटैची उठाकर कमरे में जाने लगीं, तो उन्होंने कहा,”विमलजी आप आज से गेस्टरूम में रहेंगी,किट्टी इस कमरे में रहेगी ।अब वह बड़ी हो गई है ऊपर अकेले सोना ठीक नहीं ।”
” और दादू हम कहाँ रहेंगे ।” टीनू ने बेसब्री से कहा
” आप और मंकी मेरे साथ मेरे कमरे में रहोगे ।”
वह दोनो उनकी टाँगों से लिपट गए ।” वाऊ ,दादू मज़ा आ गया ।आप हमें रोज़ कहानी सुनाएँगे न ।ऊपर तो अकेले डर लगता था ।”
” अब डरने की कोई बात नहीं ।हम सब साथ साथ रहेंगे।”
विकास विमलजी के हाथ से अटैची लेकर ऊपर जाने लगा तो ममता ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि वह बोले ,” ममता उन्हें जाने दो,उनके लिए ऊपर ठीक है ।वहाँ निश्चित होकर रह पाएँगी।” उनकी आवाज़ में दृढ़ता ममता कुछ नहीं कह पाई ।विकास ने उनकी अटैची ऊपर रख दी।
टीनू- मंकी अभी भी उनकी टाँगों से लिपट कर खड़े थे ।किट्टी अपने कमरे में चली गई ।ममता मेज़ पर से बर्तन समेटने लगी ।वह टीनू -मंकी को लेकर अपने कमरे में आ गए । उनका निर्वासन टल गया था
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