हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

परमात्मारूपी हंस - अनिल विद्यालंकार

सहस्राह्ण्यं विततौ अस्य पक्षौ हरे : हंसस्य पतत : स्वर्गम्।
स देवान् सर्वान् उरस्युपपद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा॥ अथर्व. 13-2-38,
स्वर्ग की ओर जाते हुए परमात्मारूपी हंस के पंख हज़ारों दिन तक अर्थात् अनंत काल तक फैले हुए हैं। वह परमात्मा सभी देवताओं को अपने हृदय में धारण किए हुए है और सारे लोक-लोकान्तरों को देखता जा रहा है।
भारतीय परंपरा में परमात्मा को अनेक बार हंस का रूपक दिया गया है। श्वेत हंस पवित्रता का प्रतीक है। जल में तैरते हुए भी वह जल से गीला नहीं होता। उसकी गति बहुत संयत होती है जिसमें कोई हड़बड़ाहट नहीं होती। और जब वह उड़ता है तब भी नीले आकाश में सर्वथा निस्संग होने का भाव जगाते हुए जाता है। इस मंत्र में परमात्मा की हंस के रूप में गति करते हुए कल्पना की गई है। उसके पंख अनंत काल तक फैले हुए हैं अर्थात् परमात्मारूपी हंस की गति से ही मानो काल का निर्माण हो रहा है। हमने पहले देखा है कि परमात्मा का गतिशील रूप ऋत है। जब तक परमात्मा ऋत के रूप में प्रकट है तभी तक संसार में काल है। परमात्मा जब गति समाप्त कर सत्य के रूप में आ जाता है तब संसार की सभी गतियाँ समाप्त हो जाती हैं और काल रुक जाता है।
इस मंत्र में भी परमात्मा और देवताओं के संबंध को स्पष्ट किया गया है। देवताओं की स्वतंत्र सत्ता नहीं है। सभी देवता मानो परमात्मा के हृदय में अर्थात् उसके अंदर ही विद्यमान हैं। देवता परमात्मा के ही अंग हैं और जो कुछ भी वे करते हैं वह परमात्मा की ही ओर से होता है।
इस मंत्र में परमात्मा रूपी हंस को स्वर्ग की ओर उड़ते हुए कहा गया है। स्वर्ग पृथ्वी से कहीं अलग स्थान नहीं है। स्वर्ग चेतना की वह दशा है जहाँ किसी प्रकार का भय या दु:ख नहीं रहता और जहाँ सभी प्रकार का आनंद ही आनंद है। जो लोग परमात्मा रूपी हंस के साथ गति करना सीख लेते हैं, वे अनायास स्वर्ग की आनंदमय दशा की ओर प्रगति करने लगते हैं। वेद का संदेश आशावाद का संदेश है । जीवन में बहुत दु:ख हैं ;लेकिन वे तभी तक हैं जब तक हम परमात्मा से अलग हैं। एक बार परमात्मा की शरण में जाने पर हमारे सभी दु:ख दूर हो जाते हैं और हम स्वर्गिक आनंद का अनुभव करने लगते हैं।
स्वर्गं पततः – स्वर्ग की ओर जाते हुए, अस्य हरे: हंसस्य – इस परमात्मारूपी हंस के, पक्षौ – पंख, सहस्राह्ण्यं – हज़ार दिन तक, अर्थात् अनन्त काल तक, विततौ – फैले हुए हैं। सः – वह परमात्मा, सर्वान् देवान् – सभी देवताओं को, उरसि उपपद्य – अपने हृदय में धारण कर और, भुवनानि पश्यन् – सारे लोकों को देखता हुआ, याति – गति कर रहा है।
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