हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दोहे - डॉ.रामनिवास मानव

दोहे
1

रामनिवास मानव
रामनिवास मानव

चाहे घर में दो जने, चाहे हों दस–पाँच।
रिश्तों में दिखती नहीं, पहले जैसी आँच।।
2
हर रिश्ते की नींव की, दरकी आज ज़मीन।
पति–पत्नी भी अब लगें, जैसे भारत–चीन।।
3
न ही युद्ध की घोषणा, और न युद्ध–विराम।
शीत–युद्ध के दौर–से, रिश्ते हुए तमाम।।
4
रिश्तों में है रिक्तता, साँसों में सन्त्रास।
घर में भी अब भोगते, लोग यहाँ वनवास।।
5
अब ऐसे कुछ हो गये, शहरों में परिवार।
बाबूजी चाकर हुए, अम्मा चौकीदार।।
6
माँ मूरत थी नेह की, बापू आशीर्वाद।
बातें ये इतिहास की, नहीं किसी को याद।।
7
समकालिक सन्दर्भ में, मुख्य हुआ बाज़ार।
स्वार्थपरता बनी तभी, रिश्तों का आधार।।
8
क्यों रिश्ते पत्थर हुए, गया कहाँ सब ताप।
पूछ रही संवेदना, आज आप से आप।।
9
कुंठित है सब चेतना, लक्ष्यहीन संधान।
टेक बने हैं देश की, अब बौने प्रतिमान।।
10
आहत–अपहृत रोशनी, अंधकार की क़ैद।
खड़ी घेरकर आँधियाँ पहरे पर मुस्तैद।।
11
अभयारण्य आज बना, सारा भारत देश।
संरक्षित शैतान हैं, संकट में दरवेश।।
12
झूठ करे अठखेलियां, सत्य फिरे लाचार।
पड़ी धर्म के बेडि़याँ, गले पाप के हार।।
13
कोकिल साधे मौन है, काक बहुत वाचाल।
गिद्ध–चील गिद्धा करें, बगुले देते ताल।।
14
वट–पीपल के देश में, पूजित आज कनेर।
बूढ़ा बरगद मौन है, देख समय का फेर।।
15
कृतकृत्य हम हुए सदा, लेकर जिसका नाम।
रोम–रोम में वह रमा, समझ उसी को राम।।
16
कौन बजाये बाँसुरी, कौन सुनाए तान।
गोकुल में कान्हा नहीं, मथुरा में रसखान।।
17
गोबर अब शहरी हुआ, भूला सब घर–गाँव।
होरी–धनिया को मगर, कहाँ दूसरा ठाँव।।
18
जिसके मन में वेदना, जिसका उर नि:स्वार्थ।
वही देवाधिदेव है, और वही सिद्धार्थ।।
19
तुलसी का बिरवा नहीं, नहीं नीम की छाँव।
ऐसे अगड़े शहर से, अच्छा पिछड़ा गाँव।।
20
मधुर कुंज, छाया घनी, और दृश्य अभिराम।
मगर समय का ‘पाहुना’, कब करता विश्राम।।
21
छूट गई अमराइयाँ, हुई छाँव भी दूर।
चलते–चलते आ गए, हम ये कहाँ हुजूर।।
22
दौड़–दौड़कर तन थका, मन भी हुआ उदास।
बुझे तो कैसे मृग की, मरीचिका से प्यास।।
23
धीरे–धीरे सब गया, सुविधा का सामान।
जीवन बनकर रह गया, जलता हुआ मकान।।
24
कंचे, पन्नी, गुड्डियाँ,हँसी, खुशी, मुस्कान।
वक्त़ छीनकर ले गया, कितना कुछ सामान।।
25
एक–एक कर सब गये, क्या दुश्मन, क्या मीत।
अब तो केवल शेष हैं, कुछ यादें, कुछ गीत।।
26
कैसा वाद–विवाद अब, कैसा अब परिवाद।
अब तो जीवन में बचा, है केवल अवसाद।।
27
गया, देखते सब गया, हास–लास–उल्लास।
कल तक हम भूगोल थे, आज बने इतिहास।।
28
सीता–सी संवेदना, व्याकुल और उदास।
मन वैरागी राम–सा, जीवन है वनवास।।
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