हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

पानी और पुल - डॉ.महीप सिंह

24_11_2015-dr-maheep-singh गाड़ी ने लाहौर का स्टेशन छोड़ा तो एकबारगी मेरा मन काँप उठा। अब हम लोग उस ओर जा रहे थे ,जहाँ चौदह साल पहले आग लगी थी। जिसमें लाखों जल गए थे, और लाखों पर जलने के निशान आज तक बने हुए थे। मुझे लगा हमारी गाड़ी किसी गहरी, लम्बी अन्धकारमय गुफा में घुस रही है। और हम अपना सब-कुछ इस अन्धकार को सौंप दे रहे हैं।
हम सब लगभग तीन सौ यात्री थे। स्त्रियों और बच्चों की भी संख्या काफी थी। लाहौर में हमने सभी गुरुद्वारों के दर्शन किये। वहाँ हमें जैसा स्वागत मिला,उससे आगे अब पंजासाहिब की यात्रा में किसी प्रकार का अनिष्ट घट सकता है, ऐसी सम्भावना तो नहीं थी, परन्तु मनुष्य के अन्दर का पशु कब जागकर सभी सम्भावनाओं को डकार जाएगा, कौन जानता है?
यही सब सोचते-सोचते मैंने माँ की ओर देखा, हथेली पर मुँह टिकाये, कोहनी को खिड़की का सहारा दिये वे निरन्तर बाहर की ओर देख रही थीं। खेत कट चुके थे। दूर-दूर तक सपाट धरती दिखाई दे रही थी। मुझे लगा, माँ की आँखों में से उतरकर यह सपाटता मन में पूरी तरह छा गई है। फिर मैंने अपने डिब्बे के दूसरे यात्रियों की तरफ देखा। उन पर भी गहरी उदासी छा गई थी। समझ में नहीं आ रहा था कि एकाएक ऐसी उदासी सब पर क्यों छा गई है?
‘तुम्हें तो रास्ता अच्छी तरह याद होगा’ मैंने माँ का ध्यान तोड़ते हुए पूछा, ‘सैकड़ों बार आना-जाना हुआ होगा तुम्हारा?’
माँ मेरी ओर देखकर मुसकराई। वह मुस्कराहट सब-कुछ खोकर पाई हुई मुसकराहट थी। बोलीं, ‘मुझे तो रास्ते का एक-एक स्टेशन तक याद है। पर आज यह इलाका कितना बेगाना-बेगाना-सा लग रहा है। आज चौदह साल बाद इधर से जा रही हूँ । पहले भी ऐसी ही जाती थी। लाहौर पार करते ही अजीब-सी उमंग नस-नस में दौड़ी जाती थी।’ सराई : हमारा गाँव : जैसे-जैसे निकट आता जाता, वहाँ की एक-एक शक्ल मेरे सामने दौड़ जाती, स्टेशन पर कितने लोग आये होते…
माँ की आँखों में चौदह साल पहले की याद तरल हो आई थी। पिताजी ने अपना रोजगार उत्तर प्रदेश में ही जमा लिया था। हम सब भाई-बहनों का जन्म पंजाब के बाहर ही हुआ था। मुझे याद है, पिताजी तो शायद साल में एकाध बार ही पंजाब आते हों, पर माँ के दो-तीन चक्कर जरूर लग जाते थे। हममें जो छोटा होता ,वह माँ के साथ जाता, और जबसे मुझे याद है मेरी छोटी बहन ही उनके साथ जाएा करती थी। उन दिनों, पंजाब का विभाजन घोषित हो चुका था, पंजाब की पाँचों नदियों का जल उन्माद की तीखी शराब बन चुका था, माँ ने फिर पंजाब जाने का फैसला किया था। सभी ने ऐसे विरोध किया जैसे वे जलती आग में कूदने जा रही हों। और वह सचमुच आग में कूदने जैसा ही तो था। परन्तु पिताजी सहित हम सब जानते थे कि माँ को अपने निश्चय से डिगाना कोई आसान बात नहीं। उन्होंने सबकी बातों को हँसकर टाल दिया। बीस-बाइस दिनों में वह वापस आ गयीं। गाँव के घर का बहुत-सा सामान वे बुक करा आई थीं। अपने साथ वे अपना पुराना चरखा और दही मथने की मथनी ले आई थीं।
फिर सारे पंजाब में आग लग गई। घर-के-घर, गाँव-के-गाँव और शहर-के-शहर उस आग में जलने लगा। आग रुकी तो लगा इधर तक सपाट फैली हुई जमीन अमृतसर और लाहौर के बीच से फट गई है और उस पार का फटा हुआ हिस्सा बीच में गहरी खाई छोड़कर न जाने कितना उधर खिसक गया है। हम सब भूल-से गये कि उस गहरी खाई के उस पार हमारा अपना गाँव था, पक्की सड़क के किनारे पीछे की ओर एक नहर थी, और पास की झेलम नदी, अल्हड़ लड़की की तरह उछलती-कूदती बहती थी !
आज मैं माँ के साथ खाई पर राजकीय औपचारिकता के बाँधे हुए पुल से गुजरकर उसी ओर जा रहा था जो कल कितना अपना था, आज कितना पराया है!
मैं एक पुस्तक के पन्ने उलट रहा था, माँ ने पूछा, ‘यह गाड़ी सराई स्टेशन पर रुकेगी?’
मैंने कुछ सोचा फिर कहा, हाँ रुकेगी शायद। पर पहुँचेगी रात के एक-दो बजे। हम लोग गहरी नींद में सो रहे होंगे। स्टेशन कब आकर निकल जाएगा, पता भी नहीं लगेगा। और अब अपना रखा ही क्या है वहाँ?
माँ के चेहरे पर खिसियाहट-सी दौड़ गई। बोलीं, ‘तुम्हारे लिए पहले भी वहाँ क्या रखा था?’
मेरी बात से माँ को चोट पहुँची थी। बिना और कुछ बोले मैं सिर झुकाकर अपनी पुस्तक के पन्नों में उलझ गया।
धीरे-धीरे अँधेरा छाने लगा। माँ ने पोटली खोलकर खाने के लिए कुछ निकाला। मेरे एक दूर के मामाजी हमारे साथ थे। तीनों ने मिलकर कुछ खाया और सोने की तैयारी करने लगे। मामाजी तो दस मिनट में ही खर्राटे भरने लगे। मैं भी एक ओर लुढ़क गया। माँ वैसी ही बैठी रहीं।
कुछ देर बाद एकाएक मेरी आँख खुली, देखा माँ , वैसे ही बाहर फैले हुए अँधेरे की ओर निष्पलक देखती हुई बैठी हैं। घड़ी देखी, साढ़े दस बज गये थे। मैंने कहा, ‘माँ तुम भी लेट जाओ न!’
‘अच्छा!’ उनके मुँह से निकला और वे अधलेटी-सी हो गई।
उस अधनींदी अवस्था में मैंने कोई स्वप्न देखा, ऐसा तो मुझे याद नहीं आता, पर उस नींद में भी कुछ घबराहट अवश्य होती रही थी। शायद किसी अस्पष्ट स्वप्न की ही घबराहट हो। कोई लाल-सी तरल चीज मुझे अपने चारों ओर फिरती अनुभव होती थी और मुझे लग रहा था उस लाल-लाल गाढ़ी-सी चीज पर मेरे पैर फच-फच पड़ रहे हैं। फिर एकाएक मैं हड़बड़ा कर उठा। माँ मुझे झकझोर रही थीं और अजीब-सी घबराहट और उत्तेजना से उनके हाथ काँप रहे थे।
‘क्या है?’
‘देखो यह बाहर शोर कैसा है?’
मैंने बाहर झाँककर देखा। हमारी गाड़ी छोटे-से स्टेशन पर खड़ी थी। प्लेटफॉर्म पर लैम्प पोस्टों की हलकी-हलकी रोशनी थी और अजीब-सा कोलाहल वहाँ छाया हुआ था। एकबारगी मेरा रोयाँ-रोयाँ काँप उठा। चौदह साल पहले की अनेक सुनी-सुनाई घटनाएँ बिजली बनकर कौंध गई, जब दंगाइयों ने कितनी गाडियों को जहाँ-तहाँ रोककर लोगों को गाजर-मूली की तरह काट डाला था। मामाजी जागकर मेरा कन्धा हिला रहे थे।
‘अरे क्या बात है?’
तभी मेरे कानों में आवाज पड़ी। उस भीड़ में से कोई चिल्ला रहा था-‘अरे इस गाड़ी में कोई सराई का है?’
‘यह कौन-सा स्टेशन है?’ मैंने माँ से पूछा।
माँ ने कहा, ‘सराई-अपने गाँव का स्टेशन।‘
बाहर से फिर आवाज आई, अरे इस गाड़ी में कोई सराई का है?
मैंने माँ की ओर देखा। उनके चेहरे पर पूर्ण आश्वस्तता थी।
‘पूछो इनसे, क्या बात है?’
मैंने खिड़की से गरदन निकाली। बहुत-से लोग घूमते हुए पुकार रहे थे, ‘अरे कोई सराई का है?’
पास से जाते हुए एक आदमी को बुलाकर मैंने पूछा, ‘क्या बात है जी?’
‘आपमें कोई इस गाँव का है?’
‘हाँ, हम हैं इस गाँव के…’ माँ आगे आकर बोली।
‘तुम सराई की हो?’ उस आदमी ने जोर देकर पूछा।
‘हाँ, जी।’
माँ के इतना कहते ही स्टेशन पर चारों ओर शोर मच गया। इधर-उधर घूमते हुए बहुत-से आदमी हमारे डिब्बे के सामने जमा हो गये। फिर कई आवाजें एक-साथ आईँ।
‘हम सराई के ही हैं…’ माँ ने जोर देकर कहा, ‘इसी गाँव के?’
उपस्थित जनसमुदाय में एक कोलाहल-सा हुआ। किसी की आवाज आई, ‘तुम किसके घर से हो?’
माँ ने मेरी ओर देखा। मैंने कहा, ‘मेरे पिताजी का नाम सरदार मूलासिंह है। ये मेरी माँ हैं!’
‘तुम मूलासिंह के बेटे हो?’ कई लोग एक-साथ चिल्लाए, ‘तुम मूलासिंह की बीवी हो…रवेलसिंह की भाभी? कैसे हैं सब लोग…?’ कहते-कहते कितने ही हाथ हमारी ओर बढ़ने लगे। लोग हमारे सम्बन्धियों में सबकी कुशल-क्षेम पूछते हुए अपने हाथ की पोटलियाँ मुझे और माँ को थमाते जा रहे थे। मैं और माँ गुमसुम से उन्हें ले-लेकर अपनी सीट पर रखते जा रहे थे। देखते-देखते हमारी बर्थ कपडों की छोटी-छोटी पोटलियों से भर गई।
मैं हक्का-बक्का-सा यह देख रहा था। माँ अपने सिर का कपड़ा बार-बार सँभालती हुई हाथ जोड़ रही थीं। खुशी से उनके होंठ फड़फड़ा रहे थे। मुंह से निकल कुछ भी न रहा था और लगता था आँखें अभी चू पड़ेंगी।
वहीं खड़े गार्ड ने हरी लालटेन ऊपर उठाई और कोट की जेब से सीटी निकाली। मैंने देखा तीन-चार आदमियों ने उसे पकड़-सा लिया।
‘अरे बाबू, दो-चार मिनट और खड़ी रहने दे गाड़ी को। देखता नहीं, ये बीवी इसी गाँव की हैं…!’ और एक ने उसका लालटेन वाला हाथ पकड़कर नीचे कर दिया।
‘भरजाई, सरदारजी कैसे हैं? उन्हें क्यों नहीं लाई, पंजे साहब के दरशन कराने?’ एक बूढ़ा-सा मुसलमान पूछ रहा था।
माँ ने दोनों हाथों से सिर का कपड़ा और आगे कर लिया, उनके मुँह से धीरे से निकला, ‘सरदारजी नहीं रहे…!’
‘क्या…? मूलासिंह गुजर गये? क्या हुआ था उन्हें?’
माँ चुप रहीं, मैंने जवाब दिया, ‘उनसे पेट में रसोली हो गई थी। एक दिन वह फूट गई और दूसरे दिन पूरे हो गए।’
‘ओह, बड़े ही नेक बन्दे थे, खुदा उन्हें अपनी दरगाह में जगह दे।’ उनमें से एक ने अफसोस प्रकट करते हुए कहा। कुछ क्षण के लिए सबमें खामोशी छा गई।
‘भरजाई, तेरे बच्चे कैसे हैं?’
‘वाहे गुरु जी की किरपा है, सब अच्छे हैं।’ माँ ने धीरे से कहा।
‘अल्लाह, उनकी उम्र दराज करे।’ कई आवाज एक-साथ आईं।
‘भरजाई तुम अपने बच्चों को लेकर यहाँ आ जाओ।’ किसी एक ने कहा, और कितनों ने दुहराया, ‘भरजाई, तुम लोग वापस आ जाओ…वापस आ जाओ।’ प्लेटफॉर्म पर खड़ी कितनी आवाजें कह रही थीं :
‘वापस आ जाओ!’
‘वापस आ जाओ!’
मैंने सुना, मेरे पीछे खड़े मामाजी कुढ़ते हुए कह रहे थे, ‘हूँ…बदमाश कहीं के! पहले तो मार-मारकर यहाँ से निकाल दिया, अब कहते हैं वापस आ जाओ। लुच्चे!’
पर प्लेटफॉर्म पर खड़े लोगों ने उनकी बात नहीं सुनी थी। वे कहे जा रहे थे-
‘भरजाई, तुम अपने बच्चों को लेकर वापस आ जाओ! बोलो भरजाई, कब आओगी। अपना गाँव तो तुम्हें याद आता है? भरजाई वापस आ जाओ…’
माँ के मुँह से कुछ नहीं निकल रहा था। वे सिर का कपड़ा सँभालते हुए हाथ जोड़े जा रही थीं।
दूर खड़ा गार्ड हरी लालटेन दिखाता हुआ सीटी बजा रहा था।
इंजन ने सीटी दी। गाड़ी फकफक करती हुई चल दी। भीड़-की-भीड़ हमारे डिब्बे के साथ चल दी।
‘अच्छा, भरजाई सलाम…अच्छा बेटे सलाम…रवेलसिंह को मेरा सलाम देना…सबको हमारा सलाम देना…’
माँ के हाथ जुड़े हुए थे और मुँह से गद्गद स्वर में धीरे-धीरे कुछ निकल रहा था। धीरे-धीरे गाड़ी कुछ तेज हो गई। हम दोनों खिड़की से सिर निकाले हाथ जोड़े रहे। भीड़ के लोग वहीं खड़े हाथ ऊपर उठाए चिल्लाते रहे।
गाड़ी स्टेशन के बाहर निकल आई तो मैंने बर्थ से पोटलियाँ हटाकर एक ओर कीं और माँ से कुछ कहने के लिए उनकी ओर देखा।
माँ की आँखों से आँसुओं की अविरल धार बह रही थी, बहे जा रही थी। वे बार-बार दुपट्टे से आँखें पोंछे जा रही थीं, पर टूटे हुए बाँध का पानी बहता ही जा रहा था।
हमारी गाड़ी जेहलम के पुल पर आ गई थी। रात्रि की उस नीरवता में खडर…खडर….खडर…की आवाज आ रही थी। मैं खिड़की से झांककर जेहलम का पुल देखने लगा। मैंने सुना था जेहलम का पुल बहुत मजबूत है। पत्थर और लोहे के बने उस मजबूत पुल को अँधेरे में मैं देख रहा था। मेरी दृष्टि और नीचे की ओर जा रही थी, वहाँ घुप्प अँधेरा था, पर मैं जानता था वहाँ पानी है, जेहलम नदी का कल-कल करता हुआ स्वच्छ और निर्मल पानी, जो उस पत्थर और लोहे के बने हुए पुल के नीचे से बह रहा था।
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